उत्तर प्रदेश चुनाव: भाजपा में चल रहा था 'केपीएम बनाम एसपीएम', अति पिछड़ों के बड़े नेताओं के बीच थी अंदरूनी लड़ाई!
जानकारों का मानना है कि स्वामी प्रसाद मौर्य अपने उस तमगे और ओहदे को अपने साथ रखना चाहते हैं जो कभी बसपा में उनको मिला हुआ था। लेकिन भाजपा के साथ जाकर उनकी पकड़ और धमक न सिर्फ धीमी हुई बल्कि बहुत लंबे समय तक ऐसे ही हालातों में बने रहने पर उनकी अपनी जमीनी पकड़ भी कमजोर हो सकती थी...
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उत्तर प्रदेश सरकार में कैबिनेट मंत्री स्वामी प्रसाद मौर्य के मंत्रिपरिषद से अचानक इस्तीफा देने के पीछे की कहानी चंद मिनटों की नहीं है। जानकारों का मानना है इस्तीफा देने की पटकथा में तब लिखी गई थी जब समाजवादी पार्टी के साथ मिलकर ओमप्रकाश राजभर एक जाति विशेष समुदाय की राजनीति को हवा देने के लिए समाजवादी पार्टी के साथ मिलकर गठबंधन कर चुके थे। राजनीतिक गलियारों में चर्चा उसी वक्त आम हो गई थी कि आज नहीं तो कल स्वामी प्रसाद मौर्य समेत कुछ अन्य अति पिछड़े नेता भाजपा का दामन छोड़ ही देंगे। दरअसल मंत्रिमंडल में स्वामी प्रसाद मौर्य और उपमुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य के बीच अति पिछड़ा वर्ग के बड़े नेता होने का अंदरूनी द्वंद शुरुआत से ही चलता रहा है।
मौर्य नेताओं के वर्चस्व की लड़ाई!
उत्तर प्रदेश में राजनीति के जानकार बताते हैं कि कभी प्रदेश में कभी बहुजन समाज पार्टी में अति और पिछड़ों के सबसे बड़े नेता रहे स्वामी प्रसाद मौर्य के वर्चस्व को तोड़ने के लिए भाजपा ने केशव प्रसाद मौर्य पर दांव लगाकर उन्हें पिछड़ों के बड़े नेता के तौर पर तैयार किया था। यह संयोग ही था कि 2017 में जब भाजपा की सरकार बनी तो दोनों "मौर्य नेता" एक ही पार्टी में आकर मंत्रिपरिषद में शामिल हुए। केशव प्रसाद मौर्य (केपीएम) और स्वामी प्रसाद मौर्य (एसपीएम) में वर्चस्व की लड़ाई तो तभी से शुरू हो गई थी लेकिन यह बात अलग है कि जैसे तैसे स्वामी प्रसाद मौर्य खुद को भाजपा में एडजस्ट करते रहे। इस बात का खुलासा तो खुद स्वामी प्रसाद मौर्य ने मंत्रिमंडल से इस्तीफा देने के बाद किया।
वरिष्ठ राजनीतिक विश्लेषक एचआर शुक्ला कहते हैं कि अब जब 2022 के चुनाव हो रहे हैं और स्वामी प्रसाद मौर्य ने भाजपा को छोड़कर नए रास्ते पर अपना कदम बढ़ाया है, तो निश्चित तौर पर पिछड़ों के एक बड़े नेता का यह कदम उनकी जाति बिरादरी के लिए अहम होगा ही। वह कहते हैं कि अति पिछड़ों के नेता होने के चलते वह जिस पार्टी में शामिल होंगे, वहां उनके कद के मुताबिक बढ़त दर्ज कराएंगे। हालांकि भारतीय जनता पार्टी उसको सिरे से नकार रही है, लेकिन हकीकत से भारतीय जनता पार्टी समेत समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी इस बात से वाकिफ हैं।
हवा का रुख देखकर पाला बदलते हैं स्वामी प्रसाद!
स्वामी प्रसाद मौर्य के बारे में कहा जाता है कि यूपी में उनके जैसे कुछ इक्का-दुक्का नेता हैं जो राजनैतिक हवाओं का रुख भांप कर पाला बदल लेते हैं। राजनीतिक विश्लेषक शुक्ल के मुताबिक स्वामी प्रसाद मौर्य कभी प्रदेश में जनता दल का चेहरा होते थे, लेकिन पार्टी के हालात बदलते देख उन्होंने राजनीतिक पाला भी बदल लिया बहुजन समाज पार्टी का दामन थाम लिया। बसपा के दौर में स्वामी प्रसाद मौर्य बहुत ताकतवर नेता बनकर उभरे। बसपा की सरकारों में वह न सिर्फ कैबिनेट मंत्री रहे, बल्कि प्रदेश अध्यक्ष जैसी अहम जिम्मेदारी भी निभाई।
स्वामी प्रसाद मौर्य के एक बहुत करीबी जानकार बताते हैं कि जब मौर्य भाजपा में शामिल हुए तो उनके कद के हिसाब से बहुत कुछ भाजपा पार्टी आलाकमान ने तय किया था। लेकिन जब वह मंत्री बनाए गए तो न तो मंत्रिमंडल में उनके कद के मुताबिक मंत्रालय दिया गया और न उनकी पार्टी में ज्यादा चली। राजनीतिक जानकार तो यह तक बताते हैं कि वह सरकार बनने के कुछ समय बाद से ही पार्टी के अंदर अपने सबसे बड़े प्रतिद्वंदी केशव प्रसाद मौर्य से छत्तीस का आंकड़ा रखते थे। दरअसल एक जाति विशेष समुदाय में स्वामी प्रसाद मौर्य का वर्चस्व उस वक्त से था, जब मायावती ने सोशल इंजीनियरिंग के माध्यम से पहले दलित और अतिपिछड़ों को एकजुट करके न सिर्फ अपनी सरकारी बनाई थी बल्कि उत्तर प्रदेश की राजनीति में बड़ा फेरबदल भी किया था।
मौर्य को लाने में राजभर की भूमिका अहम
मंत्रिमंडल से इस्तीफा देने से पहले दरअसल स्वामी प्रसाद मौर्या को इस बात का अंदाजा हो गया था कि किस तरीके से ओमप्रकाश राजभर भाजपा का दामन छोड़कर समाजवादी पार्टी से समझौता कर अपना कद बड़ा कर रहे हैं। दरअसल अति पिछड़ों को साधने के लिए अखिलेश यादव ने भी फील्डिंग सजानी शुरू कर दी थी। जानकारों का मानना है कि स्वामी प्रसाद मौर्य अपने उस तमगे और ओहदे को अपने साथ रखना चाहते हैं जो कभी बसपा में उनको मिला हुआ था। लेकिन भाजपा के साथ जाकर उनकी पकड़ और धमक न सिर्फ धीमी हुई बल्कि बहुत लंबे समय तक ऐसे ही हालातों में बने रहने पर उनकी अपनी जमीनी पकड़ भी कमजोर हो सकती थी। सूत्रों का तो यह तक कहना है कि स्वामी प्रसाद मौर्य को भारतीय जनता पार्टी से तोड़ने में ओमप्रकाश राजभर की भी बड़ी भूमिका रही। ओमप्रकाश राजभर और स्वामी प्रसाद मौर्य की बीते कुछ दिनों में कई मुलाकातें भी हुईं हैं।
राजनीतिक विशेषज्ञों का कहना है कि भाजपा फिलहाल कुछ भी कहे, लेकिन स्वामी प्रसाद मौर्य का मंत्रिमंडल से इस्तीफा देकर पार्टी से दूर जाना अति पिछड़ा वर्ग के लिए एक बेहतर संदेश नहीं है। उत्तर प्रदेश में लंबे समय से राजनीति कवर कर रहे एक वरिष्ठ पत्रकार का कहना है कि भाजपा में जब स्वामी प्रसाद मौर्य शामिल हुए थे, तो इसी बात को लेकर के सबसे ज्यादा प्रचारित किया गया था कि भाजपा अति पिछड़ों को कितना अपने करीब रखती है। अब जब स्वामी प्रसाद मौर्य ने भाजपा से अपना दामन छुड़ा लिया है तो यह संदेश निश्चित तौर पर फिर से जाएगा कि ऐसी क्या वजह रही जो स्वामी प्रसाद मौर्य पार्टी में एडजस्ट नहीं हो सके। लेकिन स्वामी प्रसाद मौर्य की दलबदलू की पहचान उनकी छवि पर जरूर असर डाल सकती है।