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Farm Laws: सिर्फ यूपी और पंजाब में सियासी नुकसान का ही डर नहीं था, भाजपा सांसदों-विधायकों को साफ दिख रहा था किसानों का गुस्सा

Sat, 20 Nov 2021 01:38 PM IST
Pratibha Jyoti प्रतिभा ज्योति
Updated Sat, 20 Nov 2021 01:38 PM IST
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सार
किसान आंदोलन सीधे तौर पर पश्चिमी यूपी के 100 से ज्यादा सीटों और पंजाब की सियासत पर असर डाल रहा था, लेकिन भाजपा के कुछ सांसदों-विधायकों की चिंता उससे कहीं ज्यादा थी। जैसे-जैसे चुनाव करीब आ रहे हैं,  वैसे-वैसे उनका धैर्य जवाब दे रहा था। 
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up election 2022 farm laws There was no fear of political loss only in up and punjab and loss of seats only in western up, the anger of the people was clearly visible to the bjp mps and mlas
farmers protest up, किसान आंदोलन - फोटो : farmers protest up, किसान आंदोलन

विस्तार

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने शुक्रवार को तीन विवादास्पद कृषि कानूनों को वापस लेने की घोषणा की तो न केवल किसान खुश हुए बल्कि भारतीय जनता पार्टी से जुड़े उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड और पंजाब के कई सांसदों और विधायकों ने भी राहत की सांस ली है। क्योंकि अगले साल होने वाले पांच राज्यों में विधानसभा चुनाव में किसान आंदोलन एक बड़ा मुद्दा बनने जा रहा था, जिसमें पार्टी को एक बड़े नुकसान की आहट साफ सुनाई दे रही थी। लेकिन भारतीय जनता पार्टी के शीर्ष नेतृत्व ने समय रहते इस खतरे को भांप लिया और तीनों कृषि कानूनों को वापस लेने की घोषणा कर दी गई। 





पार्टी नेताओं को उम्मीद है कि पीएम के इस घोषणा के बाद विपक्ष के हमले की धार अब कम होगी जो बीते कुछ महीनों से काफी तेज हो गई थी। इन पांच चुनावों में से कम से कम दो राज्यों उत्तर प्रदेश और पंजाब में  किसान आंदोलन एक ज्वलंत मुद्दा था। कई भाजपा नेताओं ने नाम नहीं लिखे जाने की शर्त पर कहा समझ ही नहीं आ रहा था कि जो नुकसान होने जा रहा है, उसका हल क्या निकालें? 

लखनऊ से एक भाजपा नेता ने बताया ‘जमीनी रिपोर्ट तो हर राज्य से मिल रही थी कि किसान आंदोलन हमारे खिलाफ विपक्ष को एक मजबूत हथियार दे रहा है लेकिन हिमाचल प्रदेश में हाल के उपचुनावों के नतीजों ने खतरे की घंटी बजा दी। उससे पहले लखीमपुर खीरी में हुई हिंसा ने तो हमें और डरा दिया था, क्योंकि इसने भाजपा के खिलाफ माहौल खराब करने में बड़ी भूमिका निभाई। लेकिन पार्टी के कुछ नेताओं ने माना कि भाजपा को उम्मीद है कि तीनों कृषि कानूनों को वापस लेने से उसे पश्चिमी यूपी में खोई हुई जमीन और पूरे प्रदेश में किसानों का भरोसा वापस पाने में मदद मिलेगी। 

किसान महापंचायत मुजफ्फरनगर
किसान महापंचायत मुजफ्फरनगर - फोटो : अमर उजाला

सेंटर फॉर द स्टडी ऑफ डेवलपिंग सोसाइटीज (सीएसडीएस) के निदेशक संजय कुमार बताते हैं किसान आंदोलन का सबसे ज्यादा असर उत्तर प्रदेश और पंजाब में देखा जा रहा था। खासतौर पर पश्चिम उत्तर प्रदेश में, जहां 100 और 120 के बीच सीटों की एक बड़ी संख्या पर किसान वोट का प्रभाव है। विपक्ष इस कानूनों और किसान आंदोलन को लेकर उत्तर प्रदेश खासकर पश्चिमी यूपी की सियासत गरमाए हुए था। चुनाव में इस मुद्दे को जोर-शोर से उठाने की  तैयारी थी। बड़ी संख्या में जाट यहां भाजपा से नाराज दिख रहे थे। पार्टी इतने बड़े वोट बैंक को नाराज करने का जोखिम नहीं उठा सकती थी। 

पश्चिमी यूपी में जनाधार खिसकने का डर था
किसान आंदोलन शुरू होते ही पश्चिमी उत्तर प्रदेश के किसान भी इसमें शामिल होने लगे। देखते-देखते इसका असर पूरे पश्चिमी उत्तर प्रदेश में देखा जाने लगा। भाजपा के लिए यहां स्थितियां तेजी से तब बदली जब पांच सितंबर को मुजफ्फनगर में 'किसान महापंचायत' का आयोजन किया गया। इस महापंचायत में किसान नेताओं ने खुलकर भाजपा के खिलाफ मोर्चा खोल दिया था। अनुमान है कि इस महापंचायत में कम से चार-पांच लाख किसानों ने हिस्सा लिया था और यह पिछले 25-30 सालों में हुई सबसे बड़ी किसानों की सभा मानी गई। महापंचायत के बाद भाजपा की चिंता की वाजिब वजह भी समझ में आती है। ये महापंचायत उस क्षेत्र में हुई जिसकी बदौलत भाजपा ने पिछले तीन चुनावों में उम्दा प्रदर्शन किया था।

साल 2012 के विधानसभा चुनाव में भाजपा ने पश्चिमी उत्तर प्रदेश की कुल 38 सीटें जीतीं, जबकि यहां राष्ट्रीय लोकदल का प्रभाव था। लेकिन 2013 में हुए मुजफ्फरनगर दंगों के बाद राजनीतिक माहौल बदला और 2014 के लोकसभा चुनाव में भाजपा को यहां जबरदस्त जनसमर्थन मिला। इसके बाद साल 2017 में हुए विधानसभा चुनाव में भी भाजपा को यहां 88 सीटों पर जीत हासिल मिली।

रेल रोको आंदोलन, किसान आंदोलन, रेलवे ट्रेक पर बैठे किसान (फाइल फोटो)
रेल रोको आंदोलन, किसान आंदोलन, रेलवे ट्रेक पर बैठे किसान (फाइल फोटो) - फोटो : अमर उजाला

कुछ नेता यह भी कह रहे हैं कि कोरोना,  बढ़ती महंगाई, बेरोजगारी तो मुद्दे थे ही, किसान आंदोलन उस जले पर नमक छिड़कने जैसा था। इन सब मुद्दों को लेकर सरकार के प्रदर्शन को मापा जा रहा था। यदि यह आंदोलन को खत्म करने का रास्ता नहीं निकाला जाता तो चुनाव में हम बड़ा जोखिम लेते। अब उम्मीद है कि स्थिति में सुधार हो। 
 
पश्चिमी यूपी के एक सांसद ने तो यहां तक कहा कि “ किसान आंदोलन की वजह से सार्वजनिक कार्यक्रमों में भाग लेना हमारे लिए मुश्किल होता जा रहा था, हमें किसानों और लोगों का गुस्सा साफ हमें साफ दिख रहा था। बात बिगड़ सकती थी। उन्होंने कहा  2017 और 2019 के चुनाव में हमारी पार्टी को जाट समुदाय का समर्थन मिला, लेकिन इस बार वे हमसे नाराज नजर आ रहे थे। उम्मीद है कि अब लोगों का गुस्सा ठंडा होगा।

लंबे समय तक कृषि मामलों पर लिखने वाली वरिष्ठ पत्रकार गार्गी परसाईं बताती हैं कि राकेश टिकैत ने जिस तरह कहना शुरू किया कि वे किसानों से कहेंगे किसी को भी वोट दें, भाजपा को नहीं, इससे भाजपा के खिलाफ माहौल बनने लगा। चूंकि खेती-किसानी तो हर राज्य में होती है इसलिए आगामी पांच राज्यों में होने वाले विधानसभा चुनाव में यह बड़ा मुद्दा बनने जा रहा था, लिहाजा सरकार तीनों कृषि कानून वापस लेने पर बाध्य हुई। 

पंजाब के पटियाला में अलाव तापते आंदोलनकारी किसान (फाइल फोटो)
पंजाब के पटियाला में अलाव तापते आंदोलनकारी किसान (फाइल फोटो) - फोटो : pti

पंजाब का क्या? 
पंजाब में किसान आंदोलन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भाजपा विरोधी भावना का आधार बन गया था। कई मीडिया रिपोर्ट्स में कहा गया कि प्रदर्शनकारी किसान भाजपा नेताओं के घरों को निशाना बना रहे थे। सूत्र बताते हैं कि चूंकि पंजाब की राजनीति किसानों की राजनीति मानी जाती है इसलिए अपना जनाधार खिसकने के डर से कई नेताओं ने किसान आंदोलन को अपना समर्थन दिया। भाजपा के कई सांसदों और विधायकों ने पार्टी के शीर्ष नेतृत्व से इस मामले को जल्द सुलझाने की अपील की थी।  

नाम न छापने की शर्त पर बोलने वाले पार्टी के एक नेता ने कहा हम पंजाब में इस उबाल को समझ रहे थे, इसलिए पार्टी नेतृत्व को लगातार फीडबैक दिया जा रहा था कि किसानों का गुस्सा कम करना जरूरी है, वरना इसका नतीजा केवल आगामी चुनाव में ही नहीं बल्कि 2024 के चुनाव पर भी पड़ता। 

वे कहते हैं इस घोषणा से पंजाब में भाजपा का राजनीतिक भाग्य कुछ ज्यादा बदलने वाला नहीं है, क्योंकि पार्टी के पास एक मजबूत कैडर और नेतृत्व की कमी है, हां लेकिन कुछ महत्वपूर्ण बदलाव जरूर हो सकते हैं, जैसे अमरिंदर सिंह...इतना कहकर वे चुप हो जाते हैं। 
 

अमित शाह के साथ कैंप्टन अमरिंदर सिंह (फाइल फोटो)
अमित शाह के साथ कैंप्टन अमरिंदर सिंह (फाइल फोटो) - फोटो : PTI (File Photo)

पंजाब की राजनीति को समझने वाले एक वरिष्ठ पत्रकार कहते हैं ‘पंजाब में भाजपा के खोने के लिए कुछ भी नहीं था। अब जो है वो पाने की बात है। वैसे भी पंजाब में भाजपा अकाली दल के सहारे ही यहां अपना अस्तित्व बनाए हुए थी, लेकिन अकाली दल के दूर होने के बाद भाजपा लड़ाई से बिल्कुल बाहर थी। फिर इन कानूनों को लेकर सबसे ज्यादा विरोध पंजाब के किसान ही कर रहे थे और वे भाजपा के खिलाफ जबरदस्त लामबंद हो रहे थे, लेकिन अब गेम पलट सकता है। 
 
माना जा रहा है कि पूर्व मुख्यमंत्री अमरिंदर सिंह के भाजपा के साथ हाथ मिलाने की बड़ी संभावना है। उन्होंने इस बारे में मीडिया में खुलकर बात की है कि पंजाब में सत्ता में आने के लिए साथ काम करें। पंजाब कांग्रेस के भीतर की उथल-पुथल से भाजपा को यहां काफी मदद मिल सकती है। दूसरी संभावना यह है कि पार्टी पंजाब में अकालियों के साथ अपने बिगड़े हुए समीकरण को सुधार सकती है।

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