उत्तर प्रदेश चुनाव विश्लेषण: छोटे दलों ने यूपी में ऐसे रचा सबसे बड़ा इतिहास, ऐसे समझिए क्या हैं इसके मायने?
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विस्तार
उत्तर प्रदेश की राजनैतिक जमीन कितनी उर्वरा है इस बात का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि यहां पर तमाम छोटे-छोटे दलों की राजनैतिक फसल 2022 के विधानसभा चुनावों में लहलहाने लगी है। राजनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि जिस तरीके से इस बार विधानसभा के चुनावों में छोटे-छोटे राजनीतिक दलों को बड़ा फलक मिला है वह आने वाले दिनों में राजनीति की नई दशा और दिशा भी तय करने वाले हैं।
2022 में आए विधानसभा चुनाव के नतीजे बताते हैं कि उत्तर प्रदेश में भारतीय जनता पार्टी और समाजवादी पार्टी के बाद तीसरा सबसे बड़ा दल अपना दल (सोनेलाल) है। गुरुवार को आए विधानसभा के नतीजों में अपना दल ने 12 सीटें जीती है। अपना दल का यह आंकड़ा 2017 के विधानसभा चुनावों से बड़ा है। कहने को तो राष्ट्रीय लोक दल ने समाजवादी पार्टी के साथ मिलकर चुनाव लड़ा था लेकिन आठ विधायकों के साथ राष्ट्रीय लोक दल उत्तर प्रदेश में चौथे नंबर की बड़ी पार्टी बनकर उभरी है। इसी तरीके से पिछले चुनावों में पहली बार कई सालों के संघर्ष के बाद ओमप्रकाश राजभर की सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी ने भी अच्छा प्रदर्शन किया था और चार सीटें पाई थीं।
लेकिन 2022 के विधानसभा चुनावों में सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी ने छह सीटें पाकर पांचवे नंबर पर अपनी उपस्थिति दर्ज कराई है। इन सबसे ज्यादा चौंकाने वाली पार्टी 2022 के विधानसभा चुनावों में निषाद पार्टी उभर कर आई है। निषाद पार्टी को इस बार उत्तर प्रदेश में छह विधानसभा सीटें मिली हैं। इसके अलावा उत्तर प्रदेश में पहली बार राजनीतिक पार्टी बनाकर चुनाव लड़ने वाले कुंडा के रघुराज प्रताप सिंह राजा भैया की जनसत्ता दल लोकतांत्रिक को भी दो सीटें मिली हैं।
नौ फीसदी सीटें छोटे-छोटे राजनीतिक दलों को
उत्तर प्रदेश की 403 विधानसभा सीटों वाले राज्य में तकरीबन नौ फीसदी सीटें छोटे-छोटे राजनीतिक दलों को मिली हैं जो उत्तर प्रदेश में अपने न सिर्फ पांव पसार रहे हैं बल्कि आने वाले चुनावों में प्रदेश और आसपास की सीमाओं से लगने वाले अन्य राज्यों में भी अपनी उपस्थिति दर्ज कराने के लिए तैयार बैठे हैं। निर्बल इंडियन शोषित हमारा आम दल (निषाद पार्टी) के नेता 2022 विधानसभा के परिणामों से इतना उत्साहित हैं कि वह कहते हैं जनता ने खासतौर से उनके समाज ने एक बड़ा जनादेश देखकर सिर्फ उत्तर प्रदेश ही नहीं बल्कि देश के उन सभी समुद्री तटों वाले राज्य और नदियों के किनारे बसने वाली जातियों और जनजातियों के लोगों की उम्मीद बनकर उनकी निषाद पार्टी खड़ी हो रही है।
निषाद पार्टी के संजय निषाद कहते हैं कि अपनी जाति विशेष समुदाय के लोगों को न्याय दिलाने के लिए सिर्फ उत्तर प्रदेश ही नहीं बल्कि उन सभी राज्यों में एक मुहिम और आंदोलन शुरू करेंगे, जो समुद्री तटों पर और नदियों के किनारे बसते तो जरूर हैं लेकिन उनके लिए सरकारें उतनी व्यवस्थाएं नहीं करती हैं। निषाद पार्टी के नेताओं का कहना है कि उत्तर प्रदेश के चुनाव में मिले जनादेश से स्पष्ट है कि उनकी जातियों के लोगों को अब न्याय भी मिलेगा और सम्मान भी मिलेगा। इसके लिए निषाद पार्टी अब प्रदेश ही नहीं बल्कि राष्ट्रीय स्तर पर अपना विस्तार भी करेगी। इसी तरीके से छह सीटें पाने वाली सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी के नेताओं का कहना है कि उनकी पार्टी को जो जनादेश उत्तर प्रदेश से मिला है वह सिर्फ उत्तर प्रदेश ही नहीं बल्कि आसपास के और सीमावर्ती राज्यों में भी मिलने वाला है। पार्टी लगातार विस्तार की दिशा में है।
कांग्रेस-बसपा के घटते जनाधार से फायदा
राजनीतिक विश्लेषक और सेंटर फॉर पॉलिटिकल स्टडीज के पूर्व संयोजक एके चक्रधर कहते हैं कि छोटी-छोटी राजनीतिक पार्टियों का उत्थान तभी होना शुरू होता है जब बड़ी राजनीतिक पार्टियों से लोगों का विश्वास उठना शुरू होता है। वह कहते हैं कि उत्तर प्रदेश में जिस तरीके से 2022 के विधानसभा चुनावों में छोटी-छोटी पार्टियों को खूब सीटें मिली हैं वह कांग्रेस और बहुजन समाज पार्टी के खत्म हो रहे जनाधार की वजह से ही हैं। उनका कहना है राजनीति के लिहाज से यह बेहतर है कि हर समाज की नुमाइंदगी करने वाले नेता हों, जिससे उनके समाज की बात लोकतंत्र में मुखर तरीके से उठाई जा सके।
चक्रधर का कहना है कि पहले जब बड़ी राजनैतिक पार्टियां गिनी चुनी होती थीं तो सभी जाति समुदाय के लोग इन्हीं एक दो पार्टियों के साथ ही जुड़े होते थे, लेकिन अब हालात पूरी तरीके से बदल रहे हैं। उनका कहना है जिस तरीके से छोटे-छोटे दलों से ज्यादा से ज्यादा जनप्रतिनिधि विधानसभा और लोकसभा में प्रतिनिधित्व करते रहेंगे उतना ही बड़ी राजनीतिक पार्टियों के लिए चैलेंज भी होता रहेगा। उनका कहना है यह किसी बड़ी पार्टी विशेष के लिए हो सकता है यह बात अखरने वाली हो, लेकिन लोकतंत्र को मजबूत करने के लिहाज से समाज के हर तबके को अपनी नुमाइंदगी करने वाला तो चाहिए ही होता है। उनकी नुमाइंदगी करने के लिए कोई बड़ा दल भी हो सकता है और छोटा दल भी।
छोटे दलों के पास बड़ा वोट बैंक
कहने को तो उत्तर प्रदेश में काफी लंबे समय से तमाम छोटे-छोटे राजनीतिक दल न सिर्फ चुनाव लड़ते हैं, बल्कि कहीं-कहीं अपनी उपस्थिति भी दर्ज कराते आए हैं। लेकिन 2017 के विधानसभा चुनावों के बाद जिस तरीके से उनको जगह मिलनी शुरू हुई वह 2022 में अच्छी खासी लहलहाती हुई फसल के तौर पर उग कर सामने आई है। राजनीतिक विश्लेषकों के मुताबिक भाजपा, सपा, और बसपा का वोट प्रतिशत उत्तर प्रदेश में तकरीबन 87 फीसदी के करीब रहा है। जिसमें भाजपा तकरीबन 42 फ़ीसदी वोट शेयर के साथ सबसे बड़ी पार्टी उभरकर सामने आई है। जबकि सपा 32 फ़ीसदी वोटों के साथ दूसरे नंबर की सबसे बड़ी पार्टी रही है और बसपा 13 फ़ीसदी वोटों के साथ तीसरे नंबर की वोट प्रतिशत में सबसे बड़ी पार्टी रही है।
राजनीतिक जानकार और पॉलिटिकल डाटा एनालिस्ट अनूप चंद्र कहते हैं कि बसपा 13 फ़ीसदी वोटों के साथ महज एक सीट पाती है और महज तीन फ़ीसदी वोट पाने वाली कांग्रेस दो सीटों के साथ अपने निचले पायदान पर ही बनी हुई है। अनूप कहते हैं यह आंकड़े बताते हैं कि छोटी-छोटी पॉकेट में किस तरीके से छोटे-छोटे राजनीतिक दल अपना बड़ा साम्राज्य खड़ा कर रहे हैं। यह बात दीगर है कि उनका वोट प्रतिशत शायद उतना ज्यादा नहीं है, लेकिन जहां पर उनकी सीटें निकल रही हैं वहां पर उनका बड़ा वर्चस्व है। वह कहते हैं 2022 के विधानसभा चुनावों के नतीजे और ट्रेंड इस बात का इशारा करते हैं कि आने वाले दिनों में उत्तर प्रदेश एक ऐसा राज्य होगा जहां पर छोटे-छोटे दल एक बड़े वोट बैंक के साथ ज्यादा से ज्यादा सीटें निकालने वाले राजनीतिक दलों वाला प्रदेश होगा। राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं कि इन छोटे-छोटे दलों का प्रभाव 2024 में होने वाले लोकसभा चुनावों में भी जबरदस्त तरीके से देखने वाला है।