फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   India News ›   UP Assembly Election 2022: Will women change the fate of Congress, what is the reason for Priyanka Gandhi decision to give ticket to 40% women

यूपी चुनाव: क्या महिलाएं बदलेंगी कांग्रेस की तकदीर, 40 फीसदी को टिकट देने के प्रियंका के फैसले की वजह क्या

Tue, 19 Oct 2021 06:40 PM IST
Pratibha Jyoti प्रतिभा ज्योति
Updated Tue, 19 Oct 2021 06:40 PM IST
विज्ञापन
सार
प्रियंका गांधी ने यूपी चुनाव में 'लड़की हूं, लड़ सकती हूं' का नारा देकर बड़ा दांव चल दिया है। उन्होंने 40 फीसदी महिलाओं को टिकट देने का फैसला किया है। कहा जा रहा है कि आगामी उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनावों से पहले, प्रियंका गांधी ने महिलाओं के लिए पार्टी के 40% टिकट आरक्षित करके राज्य में महिला सशक्तिकरण की दिशा में एक बड़ा कदम उठाया है।

 
loader
UP Assembly Election 2022: Will women change the fate of Congress, what is the reason for Priyanka Gandhi decision to give ticket to 40% women
प्रियंका गांधी - फोटो : amar ujala

विस्तार

अगले साल उत्तर प्रदेश में होने वाले विधानसभा चुनाव के मद्देनजर प्रिंयका गांधी महिला वोटर्स का दिल जीतने के लिए 40 फीसदी महिलाओं को चुनाव में उतारेंगी। उन्होंने मंगलवार को लखनऊ में एलान किया कि कांग्रेस चुनाव में 40 फीसदी महिलाओं को टिकट देगी। प्रियंका गांधी का यह एलान यूपी चुनाव के लिए उनका एक और मास्टर स्ट्रोक माना जा रहा है। इस फैसले का यूपी में कांग्रेस के भविष्य पर कितना असर पड़ेगा यह तो चुनाव के बाद ही पता चलेगा, लेकिन प्रियंका के इस फैसले के बाद कांग्रेस ने इस मामले में दूसरी राजनीतिक पार्टियों से बढ़त ले ली है। उस पार्टी से भी ज्यादा जिसकी कमान एक महिला अध्यक्ष के हाथों में है।



राजनीतिक विश्लेषक यह बताते हैं कि प्रियंका गांधी को यह फैसला इसलिए लेना पड़ा है कि वे जानती हैं कि महिला मतदाता हर चुनाव में अपने स्वयं के हितों के लिए एक स्वतंत्र वोट बैंक के रूप में उभर रही हैं, जिसे नजरअंदाज करना किसी भी पार्टी के हित में नहीं है। इसलिए महिलाओं को टिकट देना या राजनीति में ज्यादा से ज्यादा महिलाओं को भागीदारी देना अब हर पार्टी की मजबूरी है ताकि वे महिला प्रत्याशियों के जरिए वे मतदाताओं को अपनी ओर खींच सकें।






प्रियंका का फैसला ऐतिहासिक
अखिल भारतीय महिला कांग्रेस की राष्ट्रीय महासचिव शमीना शफीक कहती हैं कि पहले राजीव गांधी ने पंचायती राज में महिलाओं का आरक्षण दिया, फिर उसके बाद सोनिया गांधी ने महिला आरक्षण विधेयक राज्यसभा में पारित किया और अब प्रियंका गांधी ने यह फैसला किया है जो ऐतिहासिक है। जब तक हम राजनीति में महिलाओं को भागीदारी नहीं देंगे तब तक उनका सशक्तिकरण नहीं हो सकता है। पंचायती राज इसका उदाहरण हैं जहां महिलाओं को मौके मिले तो उन्होंने विकास की नई इबारत लिख दी है।

शफीक मानती हैं कि हो सकता है कि पहली बार चुनाव लड़ने वाली महिलाएं राजनीतिक तौर पर उतनी परिपक्व नहीं हों लेकिन जब तक एक बार चुनाव लड़ लेती हैं, तो उनमें वह परिवपक्वता आ ही जाती है। पार्टी के इस फैसले से महिलाओं का मनोबल बढ़ा है। 

पूरा राजनीतिक परिदृश्य बदल दिया
एक वरिष्ठ पत्रकार बताते हैं कि यूपी में धर्म और जातियों का राजनीति में प्रभाव बना हुआ है, लेकिन प्रियंका ने पूरे राजनीतिक परिदृश्य को बदल दिया है। यूपी के चुनाव में यह सवाल महत्वपूर्ण हो गया है कि क्या आपकी पार्टी 40 फीसदी महिलाओं को टिकट दे रही है। कांग्रेस के लिए 40 फीसदी महिलाओं को टिकट देना आसान है, क्योंकि अभी उसकी सात सीटों को छोड़कर सारी खाली है, लेकिन भाजपा के लिए यह मुश्किल है कि 325 सीटों पर अपने मौजूदा विधायकों में से कितने के  टिकट काटकर महिलाओं को देगी। 

ममता बनर्जी
ममता बनर्जी - फोटो : पीटीआई
प्रियंका ने एजेंडा सेट कर दिया
सीएसडीएस के निदेशक संजय कुमार कहते हैं कि पिछले कुछ चुनावों में जिस तरह से महिला मतदाताओं की भागीदारी बढ़ी है उसे देखते हुए उन्हें लुभाने की एक स्पष्ट कवायद है। लेकिन इसका फायदा पार्टी को इस तरह नहीं मिलेगा कि जिस पार्टी का जनाधार ही महज छह-सात फीसदी है वो एकदम से इतना बढ़ जाए कि चमत्कार लगने लगे। लेकिन हां इतना जरूर है कि प्रियंका गांधी जो कर रही हैं उससे उन्होंने दूसरे राजनीतिक दलों के लिए एजेंडा सेट कर दिया है। वे लीड ले रही हैं। इस वजह से अब सभी पार्टियों को इस पर प्रतिक्रिया देनी होगी। बेशक दूसरी पार्टियां ज्यादा से ज्यादा महिलाओं को टिकट दे या नहीं दे, लेकिन कोई इसका विरोध नहीं करेगा।

ममता से लेकर नीतीश तक की जीत में महिलाओं का योगदान
इस साल हुए विधानसभा चुनाव में पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी की जीत हो या केरल में पिनाराई विजयन की,  टिप्पणीकारों ने तृणमूल कांग्रेस और वाम लोकतांत्रिक मोर्चे की जीत का श्रेय महिला मतदाताओं को दिया गया। विश्लेषकों का कहना है कि राजनीतिक दलों में महिला शक्ति को लेकर राजनीतिक मान्यताएं साफ थीं, इसलिए  ज्यादतर दलों ने भी उनके लिए सामाजिक कल्याण के कई कार्यक्रम चलाए और उनके लिए कई चुनावी वादे किए। ऐसे चुनावी वादों की सफलता असम में भी देखी गई है। 

इससे पहले बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की जीत हो या 2019 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की जीत की बात। इन सबक जीत के पीछे महिला मतदाताओं के भरपूर समर्थन और सहयोग का योगदान रहा है। इसलिए महिलाओं के वोट बैंक हासिल करने के लिए इन राजनेताओं ने लड़कियों के लिए छात्रवृत्ति, सरकारी नौकरियों में महिलाओं के लिए आरक्षण, बेहतर सुरक्षा, रियायती पानी और बिजली, पंचायती राज में आरक्षण, शराब की बिक्री पर प्रतिबंध और मुफ्त बस की सवारी जैसे वादे किए और उसे निभाए भी हैं। ज्यादा से ज्यादा महिला उम्मीदवारों को चुनाव में उतारना भी इसकी एक नई कड़ी है।

 

पहला लोकसभा चुनाव
पहला लोकसभा चुनाव - फोटो : Amar Ujala
आजादी के बाद मतदान में भागीदारी सीमित थी
1952 में हुए स्वतंत्र भारत के पहले आम चुनाव में पहले महिलाएं मतदाता सूची में किसी की पत्नी या किसी की बेटी के रूप में पंजीकृत होने का विकल्प चुनती थीं। तत्कालीन मुख्य चुनाव आयुक्त सुकुमार सेन ने इस अंतर को देखा और उन्होंने मतदाता सूची को ठीक करने को कहा ताकि मताधिकार के लिए महिलाओं के अधिकारों को उनके परिवारों से अलग पहचाना मिल सके और वे अपना स्वतंत्र मतदान कर सकें।

फिर भी, मतदान में महिलाओं की भागीदारी सीमित रही। उदाहरण के लिए, 1962 के लोकसभा चुनावों में,  62 फीसदी पुरुषों की तुलना में केवल 47 फीसदी महिलाएं ही मतदान करने के लिए निकलीं। देश में महिला और पुरुषों के अलग-अलग मतदान प्रतिशत के आंकड़े तीसरी लोकसभा के चुनाव से शुरू हुए।

2014 तक, यह अंतर केवल 1.5 प्रतिशत अंक तक कम हो पाया। हालांकि बिहार और ओडिशा जैसे कुछ राज्यों में पुरुषों की तुलना में मतदान के दिन अधिक महिलाओं का मतदान ज्यादा दर्ज किया गया था। 2019 तक, पूरे भारत में महिलाओं का मतदान प्रतिशत पुरुषों से अधिक हो गया। 2019 लोकसभा चुनाव के पहले चार चरणों में महिलाओं ने वोट देने के मामले में पुरुषों को पीछे छोड़ दिया था। असम, बिहार, ओडिशा, केरल, तमिलनाडु और पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों में महिलाओं ने पुरुषों को पछाड़ दिया।

पश्चिम बंगाल में इस विधानसभा चुनाव में महिला मतदाताओं का प्रतिशत 49 फीसदी को पार कर गया, जबकि तमिलनाडु में पुरुषों से ज्यादा महिलाओं ने मतदान किया।। इस चुनाव में बीजू जनता दल और तृणमूल कांग्रेस जैसी पार्टियों ने महिला उम्मीदवारों पर खुलकर दांव लगाया। पिछले 59 सालों में महिलाओं के वोट प्रतिशत में करीब 19 फीसदी की वृद्धि हुई है

 

महिला मतदाता
महिला मतदाता - फोटो : अमर उजाला
महिलाएं मर्जी से वोट डाल रही
यहां एक और आकर्षक तथ्य है कि अब महिलाएं न केवल बड़ी संख्या में वोट देने के लिए बाहर निकल रही हैं,  बल्कि राजनीति में उनकी दिलचस्पी पैदा हो रही हैं। वहीं अब कई महिलाएं परिवारों या समुदायों के इच्छा मुताबिक नहीं बल्कि अपनी मर्जी से वोट डाल रही हैं। दूसरी बड़ी बात है कि अब नए मतदाताओं में पढ़ी-लिखी युवतियां भी बड़ी संख्या में शामिल हो रही हैं। वे अपनी माओं (औसतन) की तुलना में अधिक शिक्षित हैं और आमतौर पर उम्मीदवार को चुनने या किसी एक खास पार्टी को वोट देने के लिए अपने गांव या सामाजिक समूह के सामूहिक निर्णयों का पालन नहीं करती हैं। 

लोकनीति-सेंटर फॉर द स्टडी ऑफ डेवलपिंग सोसाइटीज (सीएसडीएस) ने फरवरी 2019 में पहली बार पांच हजार युवा महिला मतदाताओं जिनकी उम्र (18-22 की उम्र के बीच) थी के बीच एक सर्वेक्षण किया था। पांच में से तीन महिलाओं ने कहा था वे अपने परिवारों से प्रभावित हुए बिना अपनी मर्जी से मतदान करेंगी।  68 फीसदी का मानना था कि महिलाओं को पुरुषों की तरह ही राजनीति में भाग लेना चाहिए, और 65 फीसदी ने इस विचार को खारिज कर दिया कि पुरुष महिलाओं की तुलना में बेहतर राजनीतिक होते हैं।
 

यूपी विधानसभा का शीतकालीन सत्र (फाइल फोटो)
यूपी विधानसभा का शीतकालीन सत्र (फाइल फोटो)
यूपी की स्थिति क्या
प्रदेश विधानसभा में महिलाओं का प्रतिनिधित्व मात्र दस फीसदी है जो आजादी के बाद से अब तक सबसे अधिक है। वर्ष 2017 के चुनाव में 403 सदस्यीय विधानसभा में मात्र 38 महिलाएं ही चुनी गईं। पिछले चुनाव में भाजपा से सबसे अधिक 34 महिला चुनी गई थी। महिलाओं को सबसे ज्यादा 43 टिकट भाजपा ने दिया था। जबकि बसपा और कांग्रेस से दो दो और सपा और अपना दल से एक- एक उम्मीदवार को जीत मिली।

इस चुनाव में महिलाओं को टिकट देने का सभी दलों का औसत आठ फीसदी के करीब रहा था। यहां एक बात गौर करने वाली है जिन महिलाओं को टिकट मिला, उन्हें वोट देने में मतदाताओं ने कोई कंजूसी नहीं की। इस बार सभी राजनीतिक दलों ने कुल 96 महिलाओं को टिकट दिए थे। इसमें से 38 यानी करीब 40 फीसद महिलाओं ने जीत हासिल की है। 

चुनाव आयोग के रिकॉर्ड के अनुसार आजादी के बाद यूपी में हुए पहले विधानसभा चुनाव में 20 महिलाएं चुनी गई थीं। यूपी में महिला विधायकों की संख्या में उतार-चढ़ाव रहा है और 1991 में विधानसभा में सिर्फ 10 महिला विधायक थीं। 1989 में यूपी विधानसभा में महिला विधायकों की संख्या 18 थी। जबकि 2007 में, यूपी विधानसभा में 23 महिला विधायक थीं। 2012 में हालांकि यह संख्या 35 तक पहुंच गई और 2017 में यह संख्या और भी अधिक हो गई। 

कितना सुनहरा नारा
उत्तर प्रदेश की राजनीति धर्म और जाति पर आधारित है और महिलाएं भी इससे अछूती नहीं है। दूसरी बात यह भी है कि कांग्रेस का संगठन इतना मजबूत नहीं है और महिलाओं में कांग्रेस की वैसी पैठ नहीं है जैसी दूसरी पार्टियों की है, तो कांग्रेस इतने उम्मीदवार कहां से लाएंगी? इसके जवाब में शफीक कहती हैं हैं, पार्टी में योग्य महिला उम्मीवारों की कोई कमी नहीं है। अब तक महिलाओं को आगे ही नहीं किया गया था तो उनकी योग्यता का कैसे पता चलता। जबकि खूब पढ़ी-लिखीं और पेशेवर महिलाएं भी कांग्रेस से जुड़ी हुई हैं। इसलिए उम्मीदवारों की कमी नहीं होगी। उनका कहना है कि प्रियंका गांधी के इस फैसले से महिला कार्यकर्ताओं में उत्साह का संचार हो गया है।
 
विज्ञापन
विज्ञापन

रहें हर खबर से अपडेट, डाउनलोड करें Android Hindi News apps, iOS Hindi News apps और Amarujala Hindi News apps अपने मोबाइल पे|
Get all India News in Hindi related to live update of politics, sports, entertainment, technology and education etc. Stay updated with us for all breaking news from India News and more news in Hindi.

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

Next Article

Followed