दुनिया में सबसे पहले किसने बनाया कबाब और क्यों?
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कबाब कहां से आए, किसने बनाए? ये ऐसा सवाल है जो तकरीबन हर मांसाहारी के दिमाग में कौंधता होगा। कबाब की पैदाइश के बारे में एक सर्वेक्षण से पता चलता है कि ये फौज और खानाबदोशों के सफर के दौरान अस्तित्व में आया। ये सफर में ले जाने के लिए आसान था, पकाने में आसान था, सेहत के लिए अच्छा था और ताकत देता था। दुनिया के नक्शे पर नज़र डालें तो आप पाएंगे कि सबसे बेहतरीन कबाब उन इलाकों से आए हैं जो जहां जंगे हुईं या जहां के लोग खानाबदोश जीवन बिताते थे। ये सैनिक न केवल अपने साथ जीत के झंडे लेकर चलते थे, बल्कि गोश्त के भुने हुए टुकड़े भी अपने साथ रखते थे। सम्राट नेपोलियन की मशहूर टिप्पणी थी कि सेनाएं अपने पेट के बल आगे बढ़ती है। चंगेज खान की सेना हाथ में तीर कमान और काठी में कबाब लेकर चलती थी। इसके बूते उसने कई सभ्यताओं को खत्म किया और नया इतिहास रचा। अगर तलवार और तीरों ने लड़ाई का फैसला किया तो इन जीतों में कबाब की गाथा भी कुछ कम नहीं थी। भारत में मुगलों के आने के साथ खान पान का परिदृश्य नाटकीय रूप से बदला।
शाही रसोई की कमान ईरानी, तुर्की और अफगानी खानसामों के हाथों में आ गई। उन्होंने कई नए तरीकों से गोश्त पकाया। मुगल जिन ईरानीयों को अपने साथ लाए, उनका तरीकों का असर देसी और राजपूत खानपान पर पड़ा और कई नए लज़ीज़ शाकाहारी और मांसाहारी कबाब भी तैयार हुए। कई मौकों पर शिविरों में आगे बढ़ते हुए ज़मीन में बड़े-बड़े गड्ढे खोदे गए और इन्हें गोबर से लीपा गया। शिकार को साफ कर साफ पत्तों में लपेटकर गड्ढे में मसाले के साथ रखा गया और बाद में इन्हें अंगारों पर भुनने के लिए छोड़ दिया गया। खाना पकाने की यह शैली खड्ड पाक कला के नाम से मशहूर हुई। इसी तरह एक और खाना पकाने के तरीके का इजाद 13वीं सदी में हुआ। कहा जाता है कि कुबलई खान अपने सैनिकों के साथ नमकीन गोश्त के सहारे ही खतरनाक गोबी मरुस्थल को पार कर सके थे। उनका मानना था कि मांस के टुकड़ों को चट्टानों और पहाड़ों पर चिपकाकर गर्मी के असर को कुछ कम किया जा सकता था।
ये भी कहा जाता है कि 17वीं सदी में औरंगज़ेब नौ महीनों तक जंग के बाद ही गोलकुंडा किला फ़तह कर पाए थे। इस दौरान उनके सैनिकों ने खुद को ज़िंदा रखने के लिए मांस पकाने की एक नई शैली विकसित कर ली थी और इस तरह से तैयार मांस को शामी कबाब कहा गया। यही हैदराबाद के मशहूर पत्थर कबाब की जन्मस्थली भी है इन्हें गर्म पत्थरों पर पकाया जाता है। मुग़ल साम्राज्य के पतन के बाद उनके व्यंजनों को नवाबों और देसी रियासतों में संरक्षण मिला। नवाबों के शहर लखनऊ ने इन खानसामों को संरक्षण दिया और इन खानसामों ने शाही रसोइयों में उम्दा कबाब भी तैयार किए। इन्हें कई तरीके से तैयार किया जाता था, मामूली फ्राई कर, तेल में पकाकर या फिर लोहे की सीख में धंसाते हुए आग पर सेककर। कबाबों की इस श्रृंखला में गलावत के कबाब, काकोरी कबाब और शामी कबाब शामिल हैं। माना जाता है कि सीख कबाब अवध के लोगों में सबसे अधिक लोकप्रिय रहे। सीख कबाब की अपार लोकप्रियता के बाद इसमें मामूली बदलाव किए गए और इस तरह काकोरी कबाब का जन्म हुआ। राजाओं और अवध के नवाबों ने अपनी मेजबानी में इन्हें खूब पंसद किया गया और मेहमानों ने इनका जमकर लुत्फ उठाया। इस तरह के एक भोज का एक किस्सा है।
खाने के दौरान एक ब्रितानी अधिकारी ने सीख कबाब को लेकर एक टिप्पणी कर दी थी, जो मेजबान को अच्छी नहीं लगी। उन्होंने अपने रसोइये को तलब किया और इससे भी बेहतरीन कबाब बनाने का हुक्म दिया। बेहतर कबाब तैयार करने के प्रयास शुरू हो गए और लखनऊ के बाहर एक छोटे से गांव काकोरी में नई तरह का कबाब तैयार हुआ। आज काकोरी एक अलग-थलग सा गांव ही है, लेकिन इस कबाब ने न केवल अपनी पहचान बनाए रखी, बल्कि लोकप्रिय भी हुआ। लखनऊ के खाने की बात टुंडे के कबाब के बिना पूरी नहीं हो सकती। शहर के एक कबाबची हाजी मुराद अली पतंग उड़ाते हुए छत से गिर गए थे और उन्होंने अपना एक हाथ गंवा दिया था। लेकिन उन्होंने कबाब बनाना नहीं छोड़ा और गलावत के कबाब के बजाय अब ये कबाब उनके नाम से यानी टुंडे के कबाब से मशहूर हैं।
मुराद अली के कबाब मुंह में घुल जाते थे और दावा किया जाता है कि इनमें 160 मसालों का ज़ायका होता था। इस परंपरा को उनके वंशज हाजी मोहम्मद रईस आगे बढ़ा रहे हैं और कबाब प्रेमियों को संतुष्ट कर रहे हैं। भारत के विभाजन के साथ दिल्ली के ज़ायकों में एक अलग किस्म का व्यंजन शामिल किया गया था। ये था तंदूर में पका हुआ भोजन। 1920 में पेशावर में युवा कुंदन लाल ने अपने मालिक को प्रभावित करने के लिए तंदूरी चिकन बनाया था। दरअसल, कुंदनलाल के मालिक ने उनसे कुछ हल्का मांसाहार देने को कहा था और तभी तंदूरी चिकन का ख़्याल कुंदनलाल के दिमाग़ में आया। उन्होंने चिकन को हल्के मसालों में लपेटा और फिर से इसे लोहे के तार के सहारे गर्म तंदूर में रख दिया। जो निकलकर आया वो तंदूरी चिकन था और ये इतिहास बन गया। विभाजन के बाद कुंदनलाल भारत आ गए और तंदूरी चिकन को अपना ख़ास व्यंजन बनाया। समय बीतने के साथ कबाब की दुनिया और अधिक रचनात्मक होती चली गई और कबाब अब शाकाहारियों को भी लुभाने लगे हैं।