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बजट 2018: किसानों के लिए बातें ज्यादा और काम कम, हितैषी दिखने पर जोर
संजय मिश्र
Updated Fri, 02 Feb 2018 12:18 PM IST
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किसान
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वर्ष 2018-19 के लिए पेश बजट से सरकार ने अपनी छवि किसान हितैषी दिखाने की भरपूर कोशिश की है। मगर किसानों की आमदनी बढ़ाने को लेकर आम बजट में कुछ ठोस नजर नहीं आया, आलम तो यह भी रहा कि वित्त मंत्री ने लंबे समय से अटकी किसानों की मांग का जिक्र करते हुए कृषि उत्पाद के लागत मूल्य पर डेढ़ गुना ज्यादा न्यूनतम समर्थन मूल्य देने की बात तो की पर बजट में इसके लिए कितनी राशि का आवंटन किया जाएगा इसकी बात तक नहीं की गई। जिसकी वजह से सरकार के इस लोकलुभावन कदम पर सवाल उठ रहे हैं।
इसकी वजह यह भी है कि एकओर आंकड़ो की जादूगरी कर सरकार अपने आप को कृषि और किसान हितैषी दिखाने की कोशिश कर रही है। लेकिन कृषि मंत्रालय को खर्च के लिए दी गई राशि में मामूली बढ़ोत्तरी की गई है जिससे किसानों की सेहत पर बहुत असर पड़ता दिखाई नहीं दे रहा है।
पिछले वर्ष कृषि मंत्रालय का बजट 51,576 करोड़ आवंटित किया गया था। इस वर्ष मामूली बढ़त के साथ इसे 58,080 करोड़ किया गया है। पिछले वर्ष के मुकाबले कृषि बजट में महज 6504 करोड़ की बढ़ोत्तरी है। इसमें से अधिकांश राशि महंगाई की खाई पाटने में ही खर्च हो जाएगी। सरकार ने किसानों को उनके उत्पाद का कृषि लागत से 50 प्रतिशत ज्यादा न्यूनतम समर्थन मूल्य देने का ऐलान किया है लेकिन बजट में राशि का प्रावधान करना ही भूल गई है।
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खरीद के मानकों पर भी सरकार ने नीति आयोग और राज्य सरकार का नाम लेकर अपना पल्ला बचाने की कोशिश की है। इसके अलावा कृषि क्षेत्र की अन्य अहम योजनाओं में भी राशि के आवंटन में ज्यादा बढोत्तरी नहीं की है। यही वजह है कि आम बजट को लेकर कहा जाने लगा है कि किसानों के लिए बातें ज्यादा और काम कम है।
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इसकी वजह यह भी है कि एकओर आंकड़ो की जादूगरी कर सरकार अपने आप को कृषि और किसान हितैषी दिखाने की कोशिश कर रही है। लेकिन कृषि मंत्रालय को खर्च के लिए दी गई राशि में मामूली बढ़ोत्तरी की गई है जिससे किसानों की सेहत पर बहुत असर पड़ता दिखाई नहीं दे रहा है।
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पिछले वर्ष कृषि मंत्रालय का बजट 51,576 करोड़ आवंटित किया गया था। इस वर्ष मामूली बढ़त के साथ इसे 58,080 करोड़ किया गया है। पिछले वर्ष के मुकाबले कृषि बजट में महज 6504 करोड़ की बढ़ोत्तरी है। इसमें से अधिकांश राशि महंगाई की खाई पाटने में ही खर्च हो जाएगी। सरकार ने किसानों को उनके उत्पाद का कृषि लागत से 50 प्रतिशत ज्यादा न्यूनतम समर्थन मूल्य देने का ऐलान किया है लेकिन बजट में राशि का प्रावधान करना ही भूल गई है।
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खरीद के मानकों पर भी सरकार ने नीति आयोग और राज्य सरकार का नाम लेकर अपना पल्ला बचाने की कोशिश की है। इसके अलावा कृषि क्षेत्र की अन्य अहम योजनाओं में भी राशि के आवंटन में ज्यादा बढोत्तरी नहीं की है। यही वजह है कि आम बजट को लेकर कहा जाने लगा है कि किसानों के लिए बातें ज्यादा और काम कम है।
आंकड़ों से जरिए कांग्रेस से अव्वल दिखने की कवायद
किसान
कृषि मंत्रालय ने वर्ष 2009-14 से 2014-19 के बीच के कृषि मद में बजट आवंटन के आंकड़े जारी कर मोदी सरकार कांग्रेस से ज्यादा किसान हितैषी दिखाने की कवायद है। मंत्रालय के जरिए जारी बयान में कहा गया है कि कांग्रेस सरकार के वर्ष 2009 से 2014 तक के कृषि बजट को देखें तो यह 1,21,082 करोड़ था। जोकि मोदी सरकार के पांच वर्षों 2014 से 2019 के बीच बढक़र 2,11,694 करोड़ हो गया है। मंत्रालय ने मोदी राज में कृषि बजट की बढ़ोत्तरी को 74.5 प्रतिशत बताया है।
इसके साथ ही तमाम कृषि योजनाओं में हुई राशि की बढ़ोत्तरी का भी विवरण दिया गया है। लेकिन किसान संगठनों से लेकर किसान नेताओं तक को सरकार के इस दावे पर विश्वास नहीं है। कृषि अर्थशास्त्री देवेंद्र शर्मा ने सरकार के आम बजट को आंकड़ो की बाजीगरी करार देकर सरकार के कृषि हितैषी बजट की कलई खोल दी है।
क्यों है किसान हितैषी छवि बनाने की कवायद
दरअसल किसान हितैषी दिखने के पीछे सरकार की सियासी मजबूरी मानी जा रही है। लोकसभा चुनाव 2014 में पीएम मोदी के नेतृत्व में प्रचंड बहुमत के साथ सत्ता में आई केंद्र की सरकार के सामने सबसे बड़ी समस्या किसानों की नाराजगी को साधना है। अमीरी-गरीबी का भेद कर सरकार कई मौको पर किसानों को साधने में कामयाब भी रही है। मगर नजर दौड़ाएं तो भाजपा शासित राज्यों से लेकर तमाम राज्यों में किसानों के बीच सरकार को लेकर भारी असंतोष है।
गुजरात चुनाव में इसका खामियाजा भाजपा को देखने को भी मिला है। पार्टी बमुश्किल अपनी शाख बचा पाई है। वहीं राजस्थान, मध्यप्रदेश में आंदोलन की झलक दिखाकर किसानों ने अपनी नाराजगी की झलक सरकार के रणनीतिकारों को दिखा दिया है।
अगर गौर करें तो मोदी सरकार के खिलाफ सबसे पहले किसी वर्ग की नारजगी झलकी थी तो वह किसान वर्ग है। वर्ष 2015 में सरकार के प्रस्तावित भूमि अधिग्रहण बिल का किसानों के जरिए देशभर में विरोध हुआ था। तक पीएम मोदी पर सूट-बूट की सरकार का आरोप लगा। सरकार ने सबक लेते हुए बिल वापस ठंडे बस्ते में डाल दिया। उसके बाद से ही सरकार ने किसानों के बीच अपनी छवि चमकाने की कवायद शुरू कर दी थी। कृषि हित के लिए नीम कोटिंग यूरिया, भूमि स्वास्थ्य कार्ड, फसल बीमा योजना और सिंचाई योजनाओं सरीखी तमाम अहम योजनाएं शुरू की। मगर किसान के बीच जमीन पर सरकार की योजनाओं का असर होता नहीं दिख रहा है।
पिछले वर्ष मध्य प्रदेश, गुजरात, राजस्थान, महाराष्ट्र सरीखे भाजपा शासित राज्यों में ही किसानों का आंदोलन मुखर दिखा। यही वजह है कि आगामी विधानसभा चुनावों और लोकसभा चुनाव को ध्यान में रखते हुए सरकार ने किसान हितैषी छवि बनाने की अपनी मुहिम और तेज कर दी है।
इसके साथ ही तमाम कृषि योजनाओं में हुई राशि की बढ़ोत्तरी का भी विवरण दिया गया है। लेकिन किसान संगठनों से लेकर किसान नेताओं तक को सरकार के इस दावे पर विश्वास नहीं है। कृषि अर्थशास्त्री देवेंद्र शर्मा ने सरकार के आम बजट को आंकड़ो की बाजीगरी करार देकर सरकार के कृषि हितैषी बजट की कलई खोल दी है।
क्यों है किसान हितैषी छवि बनाने की कवायद
दरअसल किसान हितैषी दिखने के पीछे सरकार की सियासी मजबूरी मानी जा रही है। लोकसभा चुनाव 2014 में पीएम मोदी के नेतृत्व में प्रचंड बहुमत के साथ सत्ता में आई केंद्र की सरकार के सामने सबसे बड़ी समस्या किसानों की नाराजगी को साधना है। अमीरी-गरीबी का भेद कर सरकार कई मौको पर किसानों को साधने में कामयाब भी रही है। मगर नजर दौड़ाएं तो भाजपा शासित राज्यों से लेकर तमाम राज्यों में किसानों के बीच सरकार को लेकर भारी असंतोष है।
गुजरात चुनाव में इसका खामियाजा भाजपा को देखने को भी मिला है। पार्टी बमुश्किल अपनी शाख बचा पाई है। वहीं राजस्थान, मध्यप्रदेश में आंदोलन की झलक दिखाकर किसानों ने अपनी नाराजगी की झलक सरकार के रणनीतिकारों को दिखा दिया है।
अगर गौर करें तो मोदी सरकार के खिलाफ सबसे पहले किसी वर्ग की नारजगी झलकी थी तो वह किसान वर्ग है। वर्ष 2015 में सरकार के प्रस्तावित भूमि अधिग्रहण बिल का किसानों के जरिए देशभर में विरोध हुआ था। तक पीएम मोदी पर सूट-बूट की सरकार का आरोप लगा। सरकार ने सबक लेते हुए बिल वापस ठंडे बस्ते में डाल दिया। उसके बाद से ही सरकार ने किसानों के बीच अपनी छवि चमकाने की कवायद शुरू कर दी थी। कृषि हित के लिए नीम कोटिंग यूरिया, भूमि स्वास्थ्य कार्ड, फसल बीमा योजना और सिंचाई योजनाओं सरीखी तमाम अहम योजनाएं शुरू की। मगर किसान के बीच जमीन पर सरकार की योजनाओं का असर होता नहीं दिख रहा है।
पिछले वर्ष मध्य प्रदेश, गुजरात, राजस्थान, महाराष्ट्र सरीखे भाजपा शासित राज्यों में ही किसानों का आंदोलन मुखर दिखा। यही वजह है कि आगामी विधानसभा चुनावों और लोकसभा चुनाव को ध्यान में रखते हुए सरकार ने किसान हितैषी छवि बनाने की अपनी मुहिम और तेज कर दी है।