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उडुपी में महिलाओं का रुतबा ऊंचा, लेकिन राजनीति में पूछ नहीं
बीबीसी, हिंदी
Updated Thu, 12 Apr 2018 03:31 PM IST
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दक्षिण भारत के कर्नाटक का तटवर्ती जिला उडुपी जहां घरों में बेटों से कहा जाता है कि उन्हें समाज में महिलाओं का सम्मान किस तरह करना चाहिए। यही वजह है कि उडुपी जिले में महिलाओं का अनुपात मर्दों की तुलना में ज्यादा है। 2011 के जनसंख्या के आंकड़ों के अनुसार उडुपी जिले में 1,000 पुरुषों पर 1094 महिलाएं हैं। यह अनुपात इसलिए भी ज्यादा है क्योंकि बेटी के पैदा होने पर यहां जश्न मनाया जाता है।
उडुपी को अपने व्यंजनों के लिए देश और विदेश में ख्याति मिली हुई है। ब्रैंड उडुपी के होटलों का चेन दूर-दूर तक फैला हुआ है। चाहे वो इडली, वड़ा या डोसा हो या फिर आचार, उडुपी के व्यंजनों की अपनी अलग पहचान है। यहां पर सिर्फ महिलाओं द्वारा संचालित कई उद्यम हैं। चाहे छोटे हों या बड़े। यहां तक कि एक रेस्तरां है 'क्लास्सिक विलेज रेस्टोरेंट' जिसे सिर्फ और सिर्फ 12 महिलाएं ही मिलकर चलाती हैं। इसकी मालकिन हैं जीए कोटेयार जबकि मुख्य शेफ हैं गीता सुवर्णा।
उडुपी के लोगों को लगता है कि इस तरह का रेस्तरां ही काफी है ये बताने के लिए कि यहां के समाज में महिलाएं कितनी सशक्त हैं। लेकिन इन सबके बावजूद जब बात राजनीति की आती है तो यहां महिलाओं का उतना प्रतिनिधित्व नहीं है जितना होना चाहिए।
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महिलाओं को टिकट नहीं
यहां की रहने वाली जयश्री राज कहती हैं कि राजनीति का जब सवाल उठता है तो यहां सभी दल एक पायदान पर हैं क्योंकि महिलाओं को कोई टिकट नहीं देना चाहता। हालांकि उडुपी की अच्छी बात यह है कि यहां की सांसद शोभा कर्ण लाजे और जिला अधिकारी मेरी फ्रांसिस महिला हैं। विनुथा किरण सामजिक कार्यकर्ता हैं जिनका जन्म ही उडुपी में हुआ है।
बीबीसी से बातचीत के दौरान वो कहती हैं कि स्थानीय निकायों में महिलाओं की संख्या काफी है। जैसे जिला परिषद् और पंचायत। वो कहती हैं, "मगर जब बात विधानसभा के चुनावों की आती है तो कोई भी दल महिलाओं को टिकट नहीं देना चाहता है। राजनीतिक दल मानकर चलते हैं कि महिलाएं कमजोर हैं और चुनाव जीत नहीं सकतीं, जबकि ये बात गलत है। आप स्थानीय निकायों को देखिए। यहां पंचायतों और जिला परिषद् में महिलाओं का दबदबा है।"
पुरुषों की संख्या
विधानसभा के चुनावों की घोषणा होने के साथ टिकटों के लिए नेताओं में खूब संघर्ष चल रहा है। लेकिन इस दौड़ में महिलाएं काफी पीछे हैं। चुनाव आयोग के आंकड़े बताते हैं कि उडुपी जिले की सभी पांच विधानसभा क्षेत्रों में महिला वोटरों की संख्या ज्यादा है। पूरे जिले की आबादी 10 लाख की है जिसमे पांच लाख से ज्यादा महिलाएं हैं जबकि पुरुषों की संख्या चार लाख पचास हजार के आसपास की बताई जाती है।
इस जिले में ब्यन्दूर, कुंदापुर, उडुपी, कऊप और करकला विधान सभा क्षेत्र हैं। इसका यह मतलब हुआ कि उडुपी की सभी सीटों पर महिलाएं ही तय करेंगीं कि जीत किसकी होगी। उन्ही के वोट निर्णायक होंगे। ज्योति रमन्ना शेट्टी के अनुसार, उडुपी की महिलाओं ने हर क्षेत्र में अपना दबदबा बनाने में कामयाबी हासिल की है। चाहे वो शिक्षा का क्षेत्र हो या व्यवसाय।
महिलाओं का रुतबा
उडुपी में ही मनिपाल विश्वविद्यालय है और इसे शिक्षा का गढ़ माना जाता है। दूर-दूर से छात्र यहां पढ़ने आते हैं। ज्योति कहती हैं कि इस सुविधा का ज्यादा फायदा यहां की महिलाओं ने उठाया है और खूब शिक्षा हासिल की है। विनुथा किरण के अनुसार इसके अलावा भी कई छोटे छोटे उद्यम हैं जिसे सिर्फ महिलाएं ही चलाती हैं। कई महिला समूह भी हैं जो इन छोटे उद्यमों को वित्तीय सहायता प्रदान करने के लिए काम कर रहे हैं।
बीबीसी से बातचीत के दौरान उडुपी की महिलाओं का कहना था कि वो अपने बेटों को घरों में ही सिखाती हैं कि महिलाओं का सम्मान किस तरह किया जाना चाहिए। यही कारण है कि उडुपी में ना सिर्फ महिलाओं का रुतबा काफी ऊंचा है, उन्हें सम्मान के साथ भी देखा जाता है।
जयश्री कृष्णा राज कहती हैं, "हम बेटियों को नहीं कहते कि क्या पहन कर घर से निकलें। बल्कि हम बेटों को सिखाते हैं कि महिलों के साथ कैसे पेश आना चाहिए और कैसे उनको सम्मान की नजर से देखना चाहिए। यही फर्क है हमारे समाज में और उत्तर भारत के समाज में।"
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उडुपी को अपने व्यंजनों के लिए देश और विदेश में ख्याति मिली हुई है। ब्रैंड उडुपी के होटलों का चेन दूर-दूर तक फैला हुआ है। चाहे वो इडली, वड़ा या डोसा हो या फिर आचार, उडुपी के व्यंजनों की अपनी अलग पहचान है। यहां पर सिर्फ महिलाओं द्वारा संचालित कई उद्यम हैं। चाहे छोटे हों या बड़े। यहां तक कि एक रेस्तरां है 'क्लास्सिक विलेज रेस्टोरेंट' जिसे सिर्फ और सिर्फ 12 महिलाएं ही मिलकर चलाती हैं। इसकी मालकिन हैं जीए कोटेयार जबकि मुख्य शेफ हैं गीता सुवर्णा।
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उडुपी के लोगों को लगता है कि इस तरह का रेस्तरां ही काफी है ये बताने के लिए कि यहां के समाज में महिलाएं कितनी सशक्त हैं। लेकिन इन सबके बावजूद जब बात राजनीति की आती है तो यहां महिलाओं का उतना प्रतिनिधित्व नहीं है जितना होना चाहिए।
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महिलाओं को टिकट नहीं
यहां की रहने वाली जयश्री राज कहती हैं कि राजनीति का जब सवाल उठता है तो यहां सभी दल एक पायदान पर हैं क्योंकि महिलाओं को कोई टिकट नहीं देना चाहता। हालांकि उडुपी की अच्छी बात यह है कि यहां की सांसद शोभा कर्ण लाजे और जिला अधिकारी मेरी फ्रांसिस महिला हैं। विनुथा किरण सामजिक कार्यकर्ता हैं जिनका जन्म ही उडुपी में हुआ है।
बीबीसी से बातचीत के दौरान वो कहती हैं कि स्थानीय निकायों में महिलाओं की संख्या काफी है। जैसे जिला परिषद् और पंचायत। वो कहती हैं, "मगर जब बात विधानसभा के चुनावों की आती है तो कोई भी दल महिलाओं को टिकट नहीं देना चाहता है। राजनीतिक दल मानकर चलते हैं कि महिलाएं कमजोर हैं और चुनाव जीत नहीं सकतीं, जबकि ये बात गलत है। आप स्थानीय निकायों को देखिए। यहां पंचायतों और जिला परिषद् में महिलाओं का दबदबा है।"
पुरुषों की संख्या
विधानसभा के चुनावों की घोषणा होने के साथ टिकटों के लिए नेताओं में खूब संघर्ष चल रहा है। लेकिन इस दौड़ में महिलाएं काफी पीछे हैं। चुनाव आयोग के आंकड़े बताते हैं कि उडुपी जिले की सभी पांच विधानसभा क्षेत्रों में महिला वोटरों की संख्या ज्यादा है। पूरे जिले की आबादी 10 लाख की है जिसमे पांच लाख से ज्यादा महिलाएं हैं जबकि पुरुषों की संख्या चार लाख पचास हजार के आसपास की बताई जाती है।
इस जिले में ब्यन्दूर, कुंदापुर, उडुपी, कऊप और करकला विधान सभा क्षेत्र हैं। इसका यह मतलब हुआ कि उडुपी की सभी सीटों पर महिलाएं ही तय करेंगीं कि जीत किसकी होगी। उन्ही के वोट निर्णायक होंगे। ज्योति रमन्ना शेट्टी के अनुसार, उडुपी की महिलाओं ने हर क्षेत्र में अपना दबदबा बनाने में कामयाबी हासिल की है। चाहे वो शिक्षा का क्षेत्र हो या व्यवसाय।
महिलाओं का रुतबा
उडुपी में ही मनिपाल विश्वविद्यालय है और इसे शिक्षा का गढ़ माना जाता है। दूर-दूर से छात्र यहां पढ़ने आते हैं। ज्योति कहती हैं कि इस सुविधा का ज्यादा फायदा यहां की महिलाओं ने उठाया है और खूब शिक्षा हासिल की है। विनुथा किरण के अनुसार इसके अलावा भी कई छोटे छोटे उद्यम हैं जिसे सिर्फ महिलाएं ही चलाती हैं। कई महिला समूह भी हैं जो इन छोटे उद्यमों को वित्तीय सहायता प्रदान करने के लिए काम कर रहे हैं।
बीबीसी से बातचीत के दौरान उडुपी की महिलाओं का कहना था कि वो अपने बेटों को घरों में ही सिखाती हैं कि महिलाओं का सम्मान किस तरह किया जाना चाहिए। यही कारण है कि उडुपी में ना सिर्फ महिलाओं का रुतबा काफी ऊंचा है, उन्हें सम्मान के साथ भी देखा जाता है।
जयश्री कृष्णा राज कहती हैं, "हम बेटियों को नहीं कहते कि क्या पहन कर घर से निकलें। बल्कि हम बेटों को सिखाते हैं कि महिलों के साथ कैसे पेश आना चाहिए और कैसे उनको सम्मान की नजर से देखना चाहिए। यही फर्क है हमारे समाज में और उत्तर भारत के समाज में।"