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किसान आंदोलन: यूरोप, अमेरिका के बाद भारत के किसानों की खबरें लेकर 'ट्राली' पहुंची पाकिस्तान!

Tue, 23 Mar 2021 06:25 PM IST
Harendra Chaudhary राहुल संपाल, अमर उजाला, नई दिल्ली
राहुल संपाल, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: Harendra Chaudhary Updated Tue, 23 Mar 2021 06:25 PM IST
सार

शुक्रवार और शनिवार को ट्राली टाइम्स अखबार की संपादकीय टीम इसे तैयार करती है। इसमें देशभर के प्रमुख कॉलेजों में पढ़ने वाले छात्र शामिल हैं। सात हजार से ज्यादा प्रतियां प्रकाशित होती हैं। इसके लिए हमे 35 हजार रुपये तक का खर्चा आता है...

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Trolley Times  newspaper are being published in many regional languages including Hindi, English, Gurmukhi, Bengali
टिकरी बॉर्डर पर ट्रॉली टाइम्स का ऑफिस तैयार करते हुए किसान। - फोटो : Amar Ujala

विस्तार

केंद्र सरकार के नए कृषि कानूनों का विरोध कर रहे किसानों ने अब देश-विदेश में रहने वाले लोगों तक अपनी बात पहुंचाने की ठान ली है। किसानों ने अपनी बात रखने के लिए एक अखबार शुरू किया है, जो देश के साथ-साथ दूसरे देशों तक उनकी मांगों को पहुंचा रहा है। ट्राली टाइम्स के नाम से शुरू हुआ ये अखबार हिंदी, अंग्रजी, गुरुमुखी, बंगाली समेत कई क्षेत्रीय भाषाओं में निकाला जा रहा हैं। ई-पेपर के जरिए ट्राली टाइम्स अमेरिका, यूके, कनाडा और आस्ट्रेलिया में भी पहुंचने लगा है। फ्रेंच, जर्मन भाषा के अलावा इस पेपर का शाहमुखी लिपि में भी इसका अनुवाद किया जा रहा है, ताकि पाकिस्तान के लोगों तक भी किसान आंदोलन की खबरें पहुंच सकें।  

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ट्राली टाइम्स अखबार का काम देख रहे वरुण आदित्य सिंह चौहान ने अमर उजाला से कहा, किसान आंदोलन को आज तीन माह से ज्यादा समय हो गया हैं। आज भी मीडिया का एक बड़ा वर्ग किसानों की सही स्थिति नहीं दिखा रहा है। सरकार और लोगों तक उनकी बात को सही ढंग से नहीं पहुंचा रहा है। उनका आरोप है कि कुछ मीडिया संस्थान तो किसानों के खिलाफ ही खबरें चला रहे थे।
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यही वजह है कि किसान अब अपना ही अखबार लेकर आ गए हैं। किसान अपनी बातें साफ और स्पष्ट ढंग से आम लोगों तक पहुंचा सकें इसलिए चार पन्नों का एक समाचार पत्र निकाला जा रहा है। इसका बकायदा रजिस्ट्रेशन भी करवाया गया है। इसका हिंदी, पंजाबी के अलावा सभी प्रमुख क्षेत्रीय भाषाओं में अनुवाद भी किया जा रहा है।

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टिकरी बॉर्डर पर अखबार का दफ्तर

ट्रॉली टाइम्स के पहले पेज पर आमतौर पर किसान संगठन के नेताओं और प्रदर्शनकारी किसानों द्वारा लिखित संपादकीय, तस्वीरें, कार्टून, कविताएं और समाचार रिपोर्ट प्रकाशित होती हैं। किसानों द्वारा किए जा विरोध प्रदर्शन आमतौर पर अखबार की हेडिंग होती है।


वरुण आदित्य सिंह चौहान अमर उजाला को आगे बताते है, अखबार के लिए एक छोटा आफिस टिकरी बॉर्डर पर तैयार किया जा रहा है। शुक्रवार और शनिवार को अखबार की संपादकीय टीम इसे तैयार करती है। इसमें देशभर के प्रमुख कॉलेजों में पढ़ने वाले छात्र शामिल हैं। दिल्ली स्थित एक प्रिटिंग प्रेस में ये अखबार छपता है। इसके बाद रविवार सुबह तक सिंघु, टीकरी और गॉजीपुर बॉर्डर के प्रदर्शन स्थलों पर इसे किसानों के बीच बांटा जाता है। सात हजार से ज्यादा प्रतियां प्रकाशित होती हैं। इसके लिए हमे 35 हजार रुपये तक का खर्चा आता है।

ऑनलाइन और पीडीएफ के जरिए विदेश तक पहुंच रहा अखबार

चौहान ने आगे कहा, ज्यादा से ज्यादा लोगों तक किसानों की बात पहुंचे इसके लिए हम ट्विटर हैंडल, इंस्टाग्राम, व्हाट्सएप, फेसबुक और टेलीग्राम ग्रुप पर भी लोगों से जुड़ रहे हैं। हमारी टीम यहां पर अपने समाचार पत्र की पीडीएफ अपलोड कर देती है। इसके बाद राज्यों के किसान संगठन इसे अपनी भाषा में अनुवाद कर इसे किसानों और लोगों में वितरित कर देते हैं। इसके अलावा पाकिस्तान, अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया, कनाडा, स्पेन और यूके में रहने लोग भी हमसे इस समाचार पत्र को लेकर संपर्क करते है।

फ्रेंच, जर्मन भाषा के अलावा इस पेपर का पाकिस्तान की शाहमुखी लिपि में भी इसका अनुवाद हो रहा है। हमने सभी लोगों से इसे अपनी भाषा में अनुवाद करने और प्रकाशित करने की अनुमति दी है, लेकिन सभी से स्पष्ट कहा कि इसके कंटेंट में किसी भी प्रकार का बदलाव नहीं किया जाए और न ही कुछ जोड़ा या हटाया जाए।

इस तरह से आया आइडिया

उन्होंने आगे बताया कि किसान आंदोलन जब चरम पर था तब सभी युवाओं के मन में आइडिया आया कि प्रदर्शन स्थलों के मंच पर क्या चल रहा है, किसानों में क्या चर्चा है और ट्रालियों में बैठे किसान क्या कर रहे हैं। यहां के लोगों को सभी जगह की सही जानकारी मिलनी चाहिए। इसलिए इस अखबार की लॉन्चिंग की गई। प्रदर्शन स्थलों पर जुटे लोग गांवों से आए हैं वे सोशल मीडिया से भी जुड़े नहीं हैं, इसलिए भी हमने अखबार निकालने का फैसला किया। आज हर आम आदमी मंच से अपनी बात किसानों तक नहीं पहुंचा सकता है, इसके लिए भी यह अखबार उन लोगों का माध्यम बन रहा जो अपनी बात कहना चाहते हैं।

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