Tripura Election: 30 साल में पहली बार इस वजह से सबसे अलग है यह चुनाव, लेफ्ट-कांग्रेस कैसे भेदेंगे BJP का किला!
Tripura Election 2023: त्रिपुरा में कांग्रेस और लेफ्ट में हमेशा से सियासी अदावत रही है। लेकिन भाजपा के 20180 में सरकार बनने के बाद जिस तरीके से लेफ्ट और कांग्रेस एक हुए उससे यह पता चलता है कि भाजपा ने कितनी मजबूती से त्रिपुरा में अपने पांव जमाने शुरू किए हैं...
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
विस्तार
त्रिपुरा में गुरुवार को विधानसभा चुनाव के लिए मतदान होगा। भाजपा के लिए बड़ी चुनौती अपना किला बचाने की है, तो वहीं धुर विरोधी लेफ्ट और कांग्रेस इस बार एक हो गए हैं। सियासी गलियारों में अब चर्चाएं यही हो रही हैं कि क्या कांग्रेस-लेफ्ट मिलकर इस बार भाजपा का किला गिरा पाएंगे। या तमाम सियासी समीकरणों के बीच भाजपा अपनी सत्ता को बरकरार रख पाएगी। हालांकि इस बार के चुनाव में बीते चुनावों की तरह जनजातियों का भी बड़ा कार्ड टीएमसी और प्रदीप देव वर्धन की पार्टी टिपरा मोथा ने खेला है। लेकिन जनजातियों के लिहाज से भाजपा के पास एक बड़ा ट्रंप कार्ड भी है। इस लिहाज से त्रिपुरा का चुनाव न सिर्फ रोचक हुआ है, बल्कि तमाम सियासी समीकरणों के चलते नार्थ-ईस्ट में एक बड़ा संदेश देने वाला भी चुनाव माना जा रहा है।
कभी धुर-विरोधी रह चुके हैं भाजपा और कांग्रेस
त्रिपुरा में कांग्रेस और लेफ्ट में हमेशा से सियासी अदावत रही है। लेकिन भाजपा के 20180 में सरकार बनने के बाद जिस तरीके से लेफ्ट और कांग्रेस एक हुए उससे यह पता चलता है कि भाजपा ने कितनी मजबूती से त्रिपुरा में अपने पांव जमाने शुरू किए हैं। नॉर्थ-ईस्ट में सियासत को समझने वाले देववर्धन साहा कहते हैं कि यही वजह है कि कभी धुर विरोधी रहे लेफ्ट और कांग्रेस ने त्रिपुरा की सियासत को अपने पाले में खींचने के लिए आपसी दुश्मनी को ही भुला दिया। साहा कहते हैं कि इसमें सबसे बड़ी कुर्बानी तो लेफ्ट ने दी है। क्योंकि 2018 के चुनाव में लेफ्ट ने तकरीबन 44 फ़ीसदी वोट पाए थे। जबकि कांग्रेस तकरीबन डेढ़ फीसदी। बावजूद इन आंकड़ों के भाजपा को हराने के लिए कांग्रेस और लेफ्ट एक हो गई हैं। राजनीतिक विश्लेषक कहते हैं कि लेफ्ट और कांग्रेस के एक होने से सियासी समीकरण तो बहुत हद तक सध रहे हैं, लेकिन अंदरूनी तौर पर दोनों पार्टी के नेताओं में भारी विरोध भी देखने को मिल रहा है। यही वजह है कि आपसी गठबंधन के बाद भी लेफ्ट और कांग्रेस के नेताओं के बीच खिंची तलवारें सियासत की एक अलग कहानी कह रही हैं।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि 2018 में लेफ्ट की कई सालों से चली आ रही सियासत को भाजपा ने जब खत्म किया, तो इतनी मजबूती से खत्म किया कि इस साल के चुनाव में सभी विरोधी दलों को नई रणनीति अपनानी पड़ रही है। राजनीतिक जानकार हरिओम पवार कहते हैं कि त्रिपुरा में सिर्फ लड़ाई लेफ्ट और कांग्रेस के साथ भाजपा की नहीं है, बल्कि टीएमसी ने भी मजबूती के साथ अपनी फील्डिंग सजाई है। पवार कहते हैं कि जातिगत समीकरणों के लिहाज से अगर त्रिपुरा के सियासी तस्वीर को समझा जाए, तो यहां पर तकरीबन 67 फीसदी बांग्ला बोलने वाले लोग रहते हैं। 31 फ़ीसदी आबादी त्रिपुरा में आदिवासी समुदाय से ताल्लुक रखती है, जबकि 9 फीसदी के करीब मुस्लिम आबादी त्रिपुरा में है। जातिगत समीकरणों के आधार पर तृणमूल कांग्रेस ने भी इस चुनाव में अपनी फील्डिंग लगाई है।
राजनीतिक विश्लेषक साहा कहते हैं कि भाजपा ने आईपीएफटी के साथ मिलकर चुनाव में जो समीकरण सेट किए हैं, उसमें 60 सीटों की विधानसभा में 55 सीटें अपने पास रखी हैं जबकि 5 सीटों पर आईपीएफटी को चुनाव लड़ाया जा रहा है। लेफ्ट और कांग्रेस के समझौते में 45 सीटों पर लेफ्ट और 13 सीटों पर कांग्रेस सियासी मैदान में है। इसके अलावा एक सीट पर निर्दलीय को समर्थन दिया गया है। शाही परिवार से ताल्लुक रखने वाले प्रद्योत बिक्रम की नई पार्टी टिपरा मोथा ने 42 सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारे हैं। टीएमसी ने 28 जबकि 58 सीटों पर निर्दलीय प्रत्याशी त्रिपुरा की 60 विधानसभा सीटों के लिए चुनावी मैदान में ताल ठोक रहे हैं।
आदिवासी समुदाय की 20 सीटें भाजपा के पास
त्रिपुरा में 2018 के चुनावों में 60 सीटों वाली विधानसभा में 44 सीटों पर भाजपा और गठबंधन ने बंपर जीत हासिल करते हुए ढाई दशक के लेफ्ट के शासन को झटके में बाहर कर दिया था। 16 सीटों के साथ दूसरे नंबर पर लेफ्ट पार्टी रही थी जबकि कांग्रेस तो पिछले चुनाव में खाता तक नहीं खोल पाई थी। पत्रकार और राजनीतिक विश्लेषक चैतन्य बताते हैं कि त्रिपुरा की सियासत में सबसे बड़ा योगदान आदिवासी समुदाय का होता है। बीते कई सालों के चुनावों में आदिवासी समुदाय के मुद्दे और उनको साथ करके ही न सिर्फ सभी चुनाव लड़े गए, बल्कि उनके परिणाम भी उन्हीं के आधार पर सामने आए। त्रिपुरा की 60 सीटों वाली विधानसभा में 20 सीटें तो अनुसूचित जनजाति के लिए रिजर्व हैं। चैतन्य कहते हैं कि 2018 के चुनावों में सभी अनुसूचित जनजाति वाली 20 सीटें भाजपा के खाते में आई थीं। इसकी सबसे बड़ी वजह यह थी की ढाई दशक से चल रहे लेफ्ट के शासन को बदलने के लिए 2018 में भाजपा ने इसी को चुनावी मुद्दा बनाया था। क्योंकि इस साल पांच साल तक भाजपा की सरकार रह चुकी है और अब जनता के पास भाजपा के शासन को आकलन करने का आधार है। त्रिपुरा अब उस आधार पर ही गुरुवार को वोट डालेगी।
भाजपा ने त्रिपुरा में सरकार बनाने के बाद सत्ता बिप्लब देब को सौंपी थी। चार साल तक सत्ता में रहने के बाद बिप्लब देब को मुख्यमंत्री पद से हटाकर माणिक साहा को राज्य का नया मुखिया बना दिया गया। अब मुख्यमंत्री माणिक साहा और प्रधानमंत्री मोदी के चेहरे के साथ डबल इंजन की सरकार के दम पर भाजपा ने चुनावी मैदान में जोर आजमाइश की है। हालांकि राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि 2018 के बाद त्रिपुरा की सियासी तस्वीर इस बार काफी बदली हुई है। राजनैतिक विश्लेषक अरूप चक्रवर्ती कहते हैं कि हाल में हुए जिला परिषद के चुनावों में आदिवासी इलाके में जिस तरीके से परिणाम आए हैं और बड़े विपक्षी दलों के एक होने से भाजपा के लिए चुनौतियां भी बढ़ी हैं। लेकिन भाजपा केंद्र सरकार की योजनाओं के दम पर और डबल इंजन सरकार का जोर लगाकर सत्ता वापसी की राह देख रही है।
क्या किंगमेकर बनेगी टिपरा मोथा?
दरअसल त्रिपुरा के इस चुनाव में टिपरा मोथा के प्रद्योत बिक्रम माणिक्य देबबर्मन इस चुनाव में खुद को किंग मेकर के तौर पर देख रहे हैं। नॉर्थ ईस्ट की राजनीति को करीब से समझने वाले विश्लेषकों का मानना है कि तिपरा मोथा की मौजूदगी और उनके वादों से इस बार के चुनावों में आदिवासी समुदाय में एक अलग माहौल तो दिख रहा है। वरिष्ठ पत्रकार चैतन्य कहते हैं कि टिपरा मोथा ने आदिवासी समुदाय को एक साथ जोड़कर ग्रेटर त्रिपुरा लैंड बनाने की भी बात कही है। क्योंकि नॉर्थ-ईस्ट में खासतौर से त्रिपुरा के इस इलाके में आदिवासियों के लिहाज से यह मुद्दा न सिर्फ बड़ा है, बल्कि चुनाव की दशा दिशा भी तय करता रहा है। चैतन्य कहते हैं कि दरअसल 2018 से पहले तक जो भी आदिवासियों के मुद्दे थे, उन पर बातचीत होती थी। उनके आधार पर चुनाव लड़ा जाता था। लेकिन कुछ नया देखने को नहीं मिलता था। 2018 में जब भाजपा ने ढाई दशक पुरानी सत्ता को बाहर कर दिया, तो त्रिपुरा की राजनीति में अचानक से बड़े बदलाव देखने को मिलने लगे। वह कहते हैं कि 2023 का यह चुनाव कई मायनों में बेहद अलग है। इसमें न सिर्फ भाजपा को दोबारा सत्ता वापसी के लिए मेहनत करनी पड़ रही है, बल्कि दो धुर विरोधी कांग्रेस और लेफ्ट को एक होना पड़ा है। इन सबके अलावा प्रद्योत बिक्रम माणिक्य देबबर्मन की पार्टी की मौजूदगी ने त्रिपुरा के चुनावों को बड़ा रोचक बना दिया है।