पीएम मोदी के वादे पर संशय, 50 दिन की जगह नोट बदलने में लगेंगे 4 महीने!
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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पहली बार नोटबंदी पर बोलते हुए देश को कैश की समस्या से उबारने के लिए 50 दिन का समय मांगा। गोवा, कर्नाटक और फिर यूपी के गाजीपुर में भी पीएम ने अपनी वही बात दोहराई। उन्होंने कहा कि देश की जनता उन्हें 50 दिन का समय दे और वो सब ठीक कर देंगे।
पीएम ने ये भी कहा था कि अगर 50 दिनों के बाद लोगों को नोटबंदी से किसी प्रकार की समस्या हो तो वो उन्हें सजा दे सकते हैं, लेकिन पीएम का ये दावा आंकड़ों पर खरा नहीं उतरता। आंकड़ों को परखें तो नोटबंदी की वजह से बैंक और एटीएम के बाहर लगी कतारें 50 दिन में खत्म नहीं होंगी।
इकनॉमिक टाइम्स की खबर के मुताबिक बाजार में मौजूदा नोटों के फ्लो के हिसाब से लोगों तक कैश की सामान्य पहुंच के लिए लगभग चार महीने का वक्त लगेगा।
बैंकों से इस तरह 18 करोड़ लेनदेन
वित्त मंत्री अरुण जेटली के द्वारा पेश किए गए आंकड़ों के मुताबिक अक्टूबर के आखिर तक 17,50,000 करोड़ के नोट प्रचलन में थे, जिसका 14,50,000 करोड़ रुपया 500 और 1000 के नोटों के रूप में था। नोटबंदी के बाद से इस बड़ी रकम का ये हिस्सा बेकार हो चुका है।
वित्त मंत्रालय के आंकड़ों की अगर बात करें, तो 10 से 13 नवंबर के बीच लोगों को 50,000 करोड़ के नए नोट (100 और 2,000 के नोट) ग्राहकों को उपलब्ध कराए गए। अरुण जेटली ने इस दौरान कहा कि बैंकों से इस तरह 18 करोड़ लेनदेन किए गए।
लोगों ने पुराने नोटों को बदलने के लिए बैंकों का सहारा लिया, साथ ही एटीएम और डाकघर से भी पैसे निकाले। इन सबके बावजूद बैंकों में पैसा खत्म हो रहा है। कैश की कमी आरबीआई के उस दावे को भी झूठा साबित कर रही है, जिसमें उसने बैंकों में भरपूर पैसा होने की बात कही थी।
नोट बदलने में लगेगा 116 दिन का वक्त
इकनॉमिक टाइम्स में छपी खबर के मुताबिक अगर मान लें कि रोजाना 2,000 रुपये के नोट के रूप में 12,500 करोड़ रुपये की रकम रोज वितरित की जा रही है तो वित्तीय प्रणाली में अवैध करार दी गई रकम को वापस लोगों तक पहुंचने में 116 दिन का वक्त लगेगा।
इसमें यह भी माना गया है कि अबतक अवैध करार किए गए सभी नोटों को बदला जाएगा। केंद्रीय प्रत्यक्ष कर बोर्ड के अध्यक्ष की 2012 की 109 पन्नों की रिपोर्ट 'भारत और विदेश में काले धन से निपटने के उपाय' में कहा गया है कि विमुद्रीकरण से कालेधन की समस्या का समाधान नहीं होता। कालाधन बड़े बेनामी संपत्ति, सर्राफा, और आभूषण के रूप में होती है।
रिपोर्ट में आगे भी कहा गया था कि विमुद्रीकरण के इस कदम से बाजार पर उल्टा असर होता है। इससे जनता को भी परेशानी होती है। 1947 और 1978 में भी इस तरह के कदम से महज 15 फीसदी नोट ही बदलने के लिए आए। बाकी का 85 फीसदी पैसा कभी बाहर नहीं आया।