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वोटिंग को लेकर तिब्बतियों में द्वंद, सिर्फ हजार ने स्वीकारी भारत की नागरिकता

Mon, 06 Nov 2017 06:47 PM IST
संजय मिश्र/ धर्मशाला
संजय मिश्र/ धर्मशाला Updated Mon, 06 Nov 2017 06:47 PM IST
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Tibetan community divided on Indian citizenship and voting rights

भारत सरकार ने अपनी उदारता का परिचय देते हुए देश में रह रहे तिब्बती शरणार्थियों को बेशक मतदान का अधिकार प्रदान कर दिया है, मगर यहां धर्मशाला में रह रहे तिब्बतियों के बीच भारतीय मतदाता बनने को लेकर द्वंद दिखाई पड़ रहा है। यही वजह है कि धर्मशाला में 18 वर्ष से ज्यादा उम्र के रह रहे 6596 तिब्बतियों में से महज 1000 के करीब तिब्बतियों ने ही भारत की नागरिकता स्वीकार कर मतदाता के रूप में अपना नाम दर्ज करवाया है। 

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दरअसल तिब्बतियों को लगता है कि यदि वे भारत की नागरिकता हासिल कर यहां के मतदाता बनते हैं तो उनके तिब्बत आंदोलन पर इसका विपरीत असर पड़ेगा। यदि वे भारत के नागरिक बन गए तो तिब्बत जाने का उनका सपना अधूरा रह जाएगा, लेकिन कुछ ऐसे भी हैं जिनका मानना है कि भारत की राजनीतिक धारा में जुड़ने से उनके आंदोलन को मजबूती मिलेगी। 
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सामाजिक क्षेत्र में कार्य करने वाले मैक्लोडगंज के तिब्बती नेता थीम्पा का मानना है कि भारतीय राजनीति के साथ जुड़ने से तिब्बत आंदोलन को ताकत मिलेगी, इसलिए वे भारत की लोकतांत्रिक प्रक्रिया में शामिल होने की वकालत करते हैं। थीम्पा के अनुसार अन्य तिब्बतियों को भी ऐसा ही करना चाहिए। 
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मैक्लोडगंज के सेंट्रल तिब्बतियन प्रशासन के इलेक्शन विभाग में सेक्शन ऑफिसर पद पर कार्य करने वाली फूरबू टोलमा की राय अलग है। टोलमा के अनुसार पूरे हिमाचल प्रदेश में रहने वाले 18 वर्ष से अधिक उम्र के तिब्बतियों की संख्या 9307 है। 

टोलमा ने बताया कि भारत का मतदाता बनने को लेकर हमारा किसी भी तिब्बती पर दबाव नहीं हैं। वो अपनी मर्जी से भारत की नागरिकता ले सकते हैं या नहीं, लेकिन लोग यह मानते हैं कि यदि हम भारत की नागरिकता ले लेंगे तो तिब्बत वापस कैसे जाएंगे। टोलमा के अनुसार अकेले धर्मशाला में 18 वर्ष से ज्यादा की उम्र के 6596 तिब्बती  हैं।

वोटिंग को लेकर दलाईलामा का हस्तक्षेप नहीं

Tibetan community divided on Indian citizenship and voting rights

तिब्बतियों के भारत का मतदाता बनने और न बनने के साथ ही तिब्बती धर्मगुरु दलाई लामा का वोटिंग के मामलों में भी हस्तक्षेप नहीं हैं। चाहे वह भारतीय चुनाव हो या तिब्बतियन संसद के चुनाव, दलाई लामा इनसे अपने आप को अलग रखते हैं।

तिब्बतियन संसद में कार्यरत तसिंग डोलमा ने अमर उजाला को बताया कि लामा जी इन सबसे दूर रहते हैं। वे अपनी भूमिका महज धार्मिक गुरु तक सीमित रखते हैं। धर्मशाला के मैक्लोडगंज में उपस्थित बुद्ध विहार से जुड़े तिब्बतियों का भी कहना है कि भारत में मतदान के अधिकार को स्वीकार करना लोगों की पसंद पर निर्भर है। लामा जी का मामले में कोई हस्तक्षेप नहीं है।

कब और कैसे मिला तिब्बतियों को मत का अधिकार
वर्ष 2012 में न्यायालय के निर्देश के बाद भारतीय चुनाव आयोग ने तिब्बत से निर्वासित ऐसे तिब्बतियों को मत का अधिकार प्रदान किया जो कि 1950 से 1987 के बीच भारत आ चुके थे। इन तिब्बतियों के बच्चों को भी मत का अधिकार प्रदान किया गया है।

लोकसभा चुनाव 2014 में पहली दफे कुछ तिब्बतियों ने भारत की संसद के लिए अपनी पसंद का सांसद चुनने के लिए मताधिकार का इस्तेमाल भारत में पहली दफे किया था, लेकिन राज्य विधानसभा चुनाव के लिए वे पहली दफे वोट डालेंगे। 

वोटिंग के अधिकार से अनभिज्ञ हैं कई युवा
धर्मशाला में तिब्बतियों के बीच वोटिंग के अधिकार को लेकर चर्चा करने में अधिकांश युवक मताधिकार से अनभिज्ञ नजर आए, जबकि जानकारी प्रदान करने के मामले में तिब्बती प्रशासन सजग नजर आया। 

दलाई लामा से मिले इंद्रेश कुमार
हिमाचल प्रदेश में चल रही चुनावी गहमागहमी के बीच संघ के शीर्ष नेता इंद्रेश कुमार ने शनिवार को बुद्ध विहार पहुंचकर तिब्बती धर्मगुरु दलाई लामा से मुलाकात की। लामा से उनकी मुलाकात को चुनावी सरगर्मी से जोड़कर देखा जा रहा है। उनसे चंद दिनों पहले भाजपा नेता शांता कुमार ने भी लामा से मुलाकात की थी। वैसे भाजपा इस दफे धर्मशाला सीट पर मजबूती से चुनाव लड़ रही है। 

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