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क्या सच में भूख से ही हुई बच्चियों की मौत! पड़ोसी नहीं कर पा रहे यकीन
अमित शर्मा, अमर उजाला, नई दिल्ली
Updated Fri, 27 Jul 2018 07:15 PM IST
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मंगलवार को दिल्ली में तीन सगी बहनों की मौत भूख के कारण हुई थी। दूसरे पोस्टमार्टम रिपोर्ट में भी यही बात सामने आई है। लेकिन मृतक बच्चियों के पड़ोसियों को यह बात गले से नीचे नहीं उतर रही है कि उनकी मौत भूख के कारण ही हुई होगी।
पड़ोसियों का कहना है कि बच्चियों का पिता मंगल बहुत ज्यादा पैसे भले ही नहीं कमा पाता हो, लेकिन इतना अवश्य कमा लेता था कि वह अपने बच्चों का पेट पाल सके। वह न सिर्फ अपने बच्चों को प्यार करता था, बल्कि उनकी देखभाल भी अपने स्तर पर ठीक तरह से किया करता था। इस समय वह रिक्शा चलाता था, लेकिन इसके पहले वह परांठे और चाय की दुकान चलाता था और ठीक-ठाक कमाई कर लेता था।
जहां हुई मौत
मंडावली के पंडित चौक के पास ढिल्लो नाम आदमी के जिस मकान पर बच्चों की मौत हुई थी, वहां के उसके पड़ोसियों ने बताया कि वे शनिवार की शाम को ही वहां आए थे। इसके पहले वे मंडावली के ही साकेत ब्लॉक में रहते थे। वहां से मकान मालिक के द्वारा घर से निकाल दिए जाने के बाद नारायण नाम के आदमी ने अपने दोस्त मंगल को उसके परिवार के साथ ढिल्लो के मकान में अपने कमरे में जगह दी थी।
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पड़ोसियों के मुताबिक ज्यादातर समय पर कमरे का दरवाजा बंद ही रहता था। दोनों छोटे बच्चों को दस्त हो रही थी, उनकी सफाई करने के लिए ही वह घर से बाहर निकलती थी।
होटल से खाना लाता था नारायण
लेकिन इन पड़ोसियों का कहना है कि जिस नारायण के कमरे में पीड़ित परिवार रहने आया था, वह एक होटल में काम करता है। वह होटल से अपने लिए हमेशा शाम का खाना लेकर आता था। शनिवार, रविवार या सोमवार को भी वह खाना लाया था। ऐसे में यह बात गले नहीं उतरती कि उसी कमरे में उसने खाना खाया होगा और बच्चों को खाना नहीं दिया होगा।
नारायण अपने कमरे (10x10) का 2500 रुपये प्रति माह (बिजली-पानी का अतिरिक्त) किराया देता है। वह यहां लंबे समय से रह भी रहा था, ऐसे में कदाचित उसके पास पैसे न भी होते तो वह अपने पड़ोसियों या होटल मालिक से कुछ मदद मांग सकता था। लेकिन उसने ऐसा नहीं किया। इससे यही साबित होता है कि उसके पास पैसे की इतनी तंगी नहीं थी कि वह बच्चों को दो दिन खाना ना खिला पाता।
पहले के पड़ोसियों ने भी किया इनकार
नारायण के साथ पंडित चौक पर रहने के लिए आने से पहले मंगल साकेत ब्लॉक में नकुल नाम के आदमी के मकान में रहता था। यहां के कमरे (8x8) का किराया न दे पाने, और नकुल का एक रिक्शा मंगल से चोरी हो जाने के कारण नकुल ने कथित तौर पर उसकी पिटाई कर दी थी और उसे घर छोड़कर चले जाने को कह दिया था।
नकुल के मकान में मंगल के पड़ोसी हरिराम का कहना है कि वह ठीक-ठाक कमा लेता था। वह अपने बच्चों का ख्याल भी रखता था। चाय-पकोड़े बेचने वाले डबलू ने बताया कि अक्सर शाम को वह उनकी दुकान से बच्चों के लिए पकौड़े ले जाता था। हलांकि कुछ दिन से उसे शराब की लत लग गई थी। इसलिए संभवत: वह लापरवाही करने लगा था।
कबाड़ी को बेचकर मिले थे पैसे
मंगल के पुराने मकान के ठीक सामने इमरान नाम का एक कबाड़ी रहता है। इमरान ने अमर उजाला को बताया कि शनिवार को कमरा छोड़ने के बाद वह उसके पास आया था। उसने 170 रुपये की कबाड़ बेचा था। यानी उसके पास कम से कम इतने रुपये तो थे ही कि वह दो-तीन दिन अपने बच्चों का पेट भर सकता था। ऐसे में उसे यह यकीन ही नहीं होता कि बच्चे भूख के कारण मर गए होंगे।
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पड़ोसियों का कहना है कि बच्चियों का पिता मंगल बहुत ज्यादा पैसे भले ही नहीं कमा पाता हो, लेकिन इतना अवश्य कमा लेता था कि वह अपने बच्चों का पेट पाल सके। वह न सिर्फ अपने बच्चों को प्यार करता था, बल्कि उनकी देखभाल भी अपने स्तर पर ठीक तरह से किया करता था। इस समय वह रिक्शा चलाता था, लेकिन इसके पहले वह परांठे और चाय की दुकान चलाता था और ठीक-ठाक कमाई कर लेता था।
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जहां हुई मौत
मंडावली के पंडित चौक के पास ढिल्लो नाम आदमी के जिस मकान पर बच्चों की मौत हुई थी, वहां के उसके पड़ोसियों ने बताया कि वे शनिवार की शाम को ही वहां आए थे। इसके पहले वे मंडावली के ही साकेत ब्लॉक में रहते थे। वहां से मकान मालिक के द्वारा घर से निकाल दिए जाने के बाद नारायण नाम के आदमी ने अपने दोस्त मंगल को उसके परिवार के साथ ढिल्लो के मकान में अपने कमरे में जगह दी थी।
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पड़ोसियों के मुताबिक ज्यादातर समय पर कमरे का दरवाजा बंद ही रहता था। दोनों छोटे बच्चों को दस्त हो रही थी, उनकी सफाई करने के लिए ही वह घर से बाहर निकलती थी।
होटल से खाना लाता था नारायण
लेकिन इन पड़ोसियों का कहना है कि जिस नारायण के कमरे में पीड़ित परिवार रहने आया था, वह एक होटल में काम करता है। वह होटल से अपने लिए हमेशा शाम का खाना लेकर आता था। शनिवार, रविवार या सोमवार को भी वह खाना लाया था। ऐसे में यह बात गले नहीं उतरती कि उसी कमरे में उसने खाना खाया होगा और बच्चों को खाना नहीं दिया होगा।
नारायण अपने कमरे (10x10) का 2500 रुपये प्रति माह (बिजली-पानी का अतिरिक्त) किराया देता है। वह यहां लंबे समय से रह भी रहा था, ऐसे में कदाचित उसके पास पैसे न भी होते तो वह अपने पड़ोसियों या होटल मालिक से कुछ मदद मांग सकता था। लेकिन उसने ऐसा नहीं किया। इससे यही साबित होता है कि उसके पास पैसे की इतनी तंगी नहीं थी कि वह बच्चों को दो दिन खाना ना खिला पाता।
पहले के पड़ोसियों ने भी किया इनकार
नारायण के साथ पंडित चौक पर रहने के लिए आने से पहले मंगल साकेत ब्लॉक में नकुल नाम के आदमी के मकान में रहता था। यहां के कमरे (8x8) का किराया न दे पाने, और नकुल का एक रिक्शा मंगल से चोरी हो जाने के कारण नकुल ने कथित तौर पर उसकी पिटाई कर दी थी और उसे घर छोड़कर चले जाने को कह दिया था।
नकुल के मकान में मंगल के पड़ोसी हरिराम का कहना है कि वह ठीक-ठाक कमा लेता था। वह अपने बच्चों का ख्याल भी रखता था। चाय-पकोड़े बेचने वाले डबलू ने बताया कि अक्सर शाम को वह उनकी दुकान से बच्चों के लिए पकौड़े ले जाता था। हलांकि कुछ दिन से उसे शराब की लत लग गई थी। इसलिए संभवत: वह लापरवाही करने लगा था।
कबाड़ी को बेचकर मिले थे पैसे
मंगल के पुराने मकान के ठीक सामने इमरान नाम का एक कबाड़ी रहता है। इमरान ने अमर उजाला को बताया कि शनिवार को कमरा छोड़ने के बाद वह उसके पास आया था। उसने 170 रुपये की कबाड़ बेचा था। यानी उसके पास कम से कम इतने रुपये तो थे ही कि वह दो-तीन दिन अपने बच्चों का पेट भर सकता था। ऐसे में उसे यह यकीन ही नहीं होता कि बच्चे भूख के कारण मर गए होंगे।