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कानों देखी: महाराष्ट्र में ऐसे चला बूस्टर डोज का जादू, लेकिन खतरा भी; दिल्ली में होगी जोरदार लड़ाई

Thu, 28 Nov 2024 08:48 PM IST
Shashidhar Pathak शशिधर पाठक
Updated Thu, 28 Nov 2024 08:48 PM IST
सार

अगले साल के शुरुआत में दिल्ली में विधानसभा चुनाव होंगे। आम आदमी पार्टी ने चुनाव पूर्व मुख्यमंत्री केजरीवाल के चेहरे पर लड़ने का फैसला किया है। गली-गली में आम आदमी के नेता कह रहे हैं कि आपको केजरीवाल को वापस लाना है। दिलचस्प है कि भाजपा के नेता भी मुख्यमंत्री आतिशी पर कोई ध्यान नहीं दे रहे हैं। उनके भी निशाने पर केजरीवाल ही हैं। 

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This is how the magic of booster dose worked in Maharashtra, but there is danger too; fierce fight in delhi
देवेंद्र फडणवीस, एकनाथ शिंदे और अजित पवार - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

4 जून 2024 को लोकसभा चुनाव का नतीजा आया तो भाजपा चाणक्य के हाथ-पांव फूल गए। कुछ महीने बाद महाराष्ट्र, झारखंड में चुनाव की आहट भांप पहुंच गए मुंबई। हुआ मंथन। एनसीपी(अजीत) के वरिष्ठ नेता बताते हैं कि उनकी सलाह पर बूस्टर डोज के जरिये सरकार विरोधी राजनीतिक वायरस को काबू किया गया। 01जुलाई से ही हमने लाडली बहना और फिर लाडला भाई योजना की ईमानदारी से किश्त जारी कर दी। बताते हैं, फिर क्या था? नरेटिव बदलते देर नहीं लगी और नवंबर में चुनाव का नतीजा आने तक जारी हुई पांच किश्तों ने कमाल कर दिया। हालांकि इस कमाल ने भाजपा को 132 सीटें दिला दी हैं। 5 उसके बागी भी साथ आ गए। 137 तक पहुंची भाजपा सहयोगियों के नखरे से मुक्त हो गई। लिहाजा सहयोगियों के पास चाणक्य के भरोसे का आसरा भर है। साथ में चेतावनी भी कि न्याय न किया तो बाद में कौन भाजपा से जुड़ना चाहेगा? लिहाजा पहले अजित पवार ने अपना भाव बढ़ाया, फिर शिंदे ने और अब तो बारी अपनी-अपनी पार्टी बूस्टर डोज दिलाने की है।
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महाराष्ट्र बनने वाला है अनोखा राज्य
महाराष्ट्र में भाजपा एक कमाल करने जा रही है। भाजपा के नेता चाहते हैं कि एकनाथ शिंदे भाजपा के मुख्यमंत्री की कैबिनेट में उपमुख्यमंत्री बनें। अजित पवार तो इस अवसर की ताक में हैं और देवेन्द्र फडणवीस को अपनी मंशा बता चुके हैं। पवार बस एकनाथ शिंदे जैसा ट्रीटमेंट चाहते हैं। वहीं एकनाथ उपमुख्यमंत्री नहीं बनना चाहते। लेकिन भाजपा के नेताओं ने उन्हें समझाया है कि आखिर देवेंद्र भी सीएम थे। लेकिन न चाहते हुए भी माने। बताते हैं दूसरी तरफ एकनाथ शिंदे भी मजबूरी समझ रहे हैं। उन्हें पता है कि भविष्य की राजनीतिक चुनौती और उद्धव ठाकरे की सेना से पार पाने के लिए पद और प्रभावी होना जरूरी है। हालांकि देवेंद्र और एकनाथ के समीकरण जगजहिर हैं। वहीं भाजपा को भी पता है कि महाराष्ट्र में भावी चुनौतियों से पार पाने के लिए सहयोगियों को साधे और बांधे रखना है। 
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क्या स्थानीय निकाय चुनाव से पहले बढ़ेगी उद्धव-कांग्रेस की तल्खी
महाराष्ट्र में महायुति की सरकार बनने की जा रही है। इसके बाद मुंबई में स्थानीय निकाय के चुनाव होंगे। इस चुनाव से पहले ही शिवसेना(उद्धव) और कांग्रेस में तल्खी की शुरुआत हो गई है। शिवसेना के नेताओं के रुख से इसी के संकेत मिल रहे हैं। खबर है कि विधानसभा चुनाव के बाद से शिवसेना(उद्धव) के प्रमुख उद्धव ठाकरे काफी तंग चल रहे हैं। उद्धव के बारे में आम है कि उन्हें राजनीति में लीपा-पोती पसंद नहीं है। सीधी-साफ राजनीति करते हैं। इस बार उनके लिए झटका सह पाना मुश्किल हो रहा है। बीएमसी भी हाथ से निकलने का खतरा है। दूसरे कांग्रेस में कई नेता हैं। तय नहीं हो पाता कि किससे बात होगी? एक बड़ी समस्या है कि किसी मुद्दे पर कांग्रेस के निर्णय लेने की प्रक्रिया भी बहुत लंबी और ऊबाऊ है। तीसरा कारण, उद्धव को शिवसैनिकों ने बताया है कि स्थानीय निकाय के चुनाव में शिवसेना और कांग्रेस के वोटर अलग-अलग हैं। इसलिए बिना कांग्रेस के साथ तल्खी बनाए, बीएमसी में करिश्मा की उम्मीद कम है। अब देखिए आगे क्या होता है?
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दिल्ली में होगी जोरदार लड़ाई, केजरीवाल होंगे आप का चेहरा
अगले साल के शुरुआत में दिल्ली में विधानसभा चुनाव होंगे। आम आदमी पार्टी ने चुनाव पूर्व मुख्यमंत्री केजरीवाल के चेहरे पर लड़ने का फैसला किया है। गली-गली में आम आदमी के नेता कह रहे हैं कि आपको केजरीवाल को वापस लाना है। दिलचस्प है कि भाजपा के नेता भी मुख्यमंत्री आतिशी पर कोई ध्यान नहीं दे रहे हैं। उनके भी निशाने पर केजरीवाल ही हैं। वहीं भाजपा भी इस बार केजरीवाल के मुकाबले अपने स्थानीय चेहरे पर चुनाव लड़ सकती है। दिल्ली भाजपा संगठन के अधिकांश नेता चेहरा घोषित करके चुनाव लड़ने पक्ष में हैं। हालांकि भाजपा के एक सांसद अभी सबको समझा रहे हैं कि अब पार्टी चेहरा घोषित करके चुनाव नहीं लड़ती। मुख्यमंत्री के चेहरे का फैसला चुनाव बाद विधायक दल की बैठक में तय होता है। बताते हैं दिल्ली में बांसुरी स्वराज का बढ़ता क्रेज और युवाओं से कनेक्ट कई नेताओं के पेट में दर्द पैदा कर रहा है। वहीं बांसुरी समर्थक युवा भाजपा नेता कहते हैं कि बांसुरी को प्रोजेक्ट किया गया तो केजरीवाल का चेहरा कोई कमाल नहीं कर पाएगा।

योगी बाबा जी अब महाकुंभ की तैयारी में व्यस्त
मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को चैन की सांस लेने का अवसर कम मिलता है। इधर राज्यों के चुनाव प्रचार और उप चुनाव का बोझ उतरा तो सामने महाकुंभ-2025 है। 13 जनवरी-26 फरवरी 2025(44 दिन) तक के महाकुंभ के आयोजन को मुख्यमंत्री भूतो न भविष्यति की तर्ज पर करने में व्यस्त हैं। वरिष्ठ नौकरशाहों की एक टीम के सामने एकमात्र लक्ष्य के रूप में इसे रख दिया है। गौरतलब है कि हर 12 साल पर महाकुंभ आता है। इसका आयोजन प्रयागराज, उज्जैन, हरिद्वार और नासिक में होता है। इससे पहले मुख्यमंत्री बनने के बाद और लोकसभा चुनाव से पहले उप्र सरकार ने कुंभ का आयोजन किया था। इस धार्मिक और सांस्कृतिक आयोजन की भव्यता के जरिये मुख्यमंत्री की योजना देश-प्रदेश में एक अलग संदेश देने की है।

 
अब तो मैच फिक्सिंग राजनीति में आम है, नैतिकता तो किताबी
एनसीपी(अजीत) ने नवाब मलिक को टिकट दे दिया और भाजपा के नेताओं ने इस पर खूब गाली दी। मीडिया में भी छपा कि भाजपा की एनसीपी के अजित पवार से किनारा करने की तैयारी। अब एनसीपी के नेता इसका राज खोल रहे हैं। वह कहते हैं कि यह तो मैच फिक्सिंग थी। हमने टिकट दे दिया, उन्होंने गाली दी। दरअसल, भाजपा को पता था कि हमारे वोटर का एक वर्ग उसका वोटर नहीं है। हमें पता था कि भाजपा का वोटर कुछ हमसे भी परहेज करेगा। लिहाजा हमने टिकट दे दिया और वह गाली देते रहे। फायदा कहीं न कहीं दोनों को हो गया। जनता के हिस्से में अब हमारी महायुति की सरकार मिल गई।
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