तमिलनाडु-कर्नाटक ही नहीं नदियों के विवाद में सुलगते रहे हैं कई राज्य
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कावेरी जल विवाद को लेकर तमिलनाडु और कनार्टक दोनों राज्य हिंसा की आग में झुलस रहे हैं। दुर्भाग्यपूर्ण ये है कि मामले में सुप्रीम कोर्ट के हस्तक्षेप करने का भी कोई फायदा नहीं हुआ और हालात और खराब हो गए हैं। कर्नाटक के लोग जहां सुप्रीम कोर्ट के आदेश के विरोध में सड़कों पर हैं तो तमिलनाडु में अभी तक पानी न छोड़े जाने के विरोध में सड़कों पर उतर आए हैं। हालांकि ऐसा नहीं है कि यह विवाद सिर्फ कर्नाटक और तमिलनाडु के बीच है बल्कि कई और राज्य भी
इसी तरह विस्फोट के मुहाने पर खड़े हैं। जानिए कौन कौन से हैं ऐसे राज्य और क्या है विवाद।
कर्नाटक-तमिलनाडु कावेरी विवाद
तमिलनाडु और कर्नाटक के बाद कावेरी जल विवाद 100 साल से भी ज्यादा पुराना बताया जाता है। जिसे कभी अंग्रेज भी नहीं सुलझा पाए थे। विवाद की असली जड़ है कर्नाटक का तमिलनाडु को निर्धारित पानी न छोड़ना। असल में सुप्रीम कोर्ट ने बीते 5 सितंबर को आदेश दिया था कि कर्नाटक दस दिन तक हर रोज तमिलनाडु के लिए कावेरी नदी में 15 हजार क्यूसेक पानी छोड़ेगा। वहीं कर्नाटक की दलील थी कि वह मात्र एक हजार क्यूसेक पानी ही छोड़ सकता है वो भी हफ्ते भर के लिए। बस इसी को लेकर दोनों राज्यों में खींचतान चल रही है और मामला जहां का तहां अटका हुआ है।
पंजाब हरियाणा सतलुज नहर विवाद
पंजाब और हरियाणा के बीच सतलुज लिंक नहर दशकों पुराना है। हरियाणा में पानी की बड़ी जरूरत को पूरा करने के लिए पंजाब की सतलुज नदी से यमुना नदी को जोड़ने के लिए सतलुज लिंक नहर बनाई जानी थी। जिसका उद्घाटन खुद पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने किया था। लेकिन अब यह नहर विवादों भेंट चढ़ चुकी है। विवाद भी ऐसा कि नहर का 90 फीसदी काम पूरा होने के बाद अब इसे पाटने का काम शुरू कर दिया गया है। इस संबंध में मार्च महीने में पंजाब विधानसभा ने भी प्रस्ताव पास कर नदी के निर्माण पर रोक लगा दी थी। यह मुद्दा इतना गंभीर है कि पंजाब और हरियाणा और उनके हजारों किसान आमने सामने हैं। मामला सुप्रीम कोर्ट में है तो पंजाब ने किसी भी आदेशों को मानने से इंकार कर दिया है।
उड़ीसा छत्तीसगढ़ के बीच महानदी विवाद
तमिलनाडु और कर्नाटक की तरह ही उड़ीसा और छत्तीसगढ़ में महानदी के लेकर विवाद गहराता जा रहा है। छत्तीसगढ़ सरकार ने महानदी पर सात से ज्यादा बड़ी परियोजनाओं का प्रस्ताव तैयार कर रखा है और वो जल्द ही उस पर काम शुरू करने वाली है। जिसमें महानदी पर बने सात बैराज से पावर प्लांट को पानी दिया जाना है। ऐसे में नदी का 70 फीसदी जल पावर प्लांट्स को चला जाएगा। उड़ीसा सरकार इसका विरोध कर रही है। उडीसा में भी एनटीपीसी सहित कई बड़े
पावर प्रोजक्ट महानदी के सहारे ही चलते हैं। ऐसे में उसकी मांग है कि उसे पर्याप्त पानी दिया जाए।
गुजरात-मध्यप्रदेश में नर्मदा विवाद
भाजपा शासित गुजरात और मध्यप्रदेश के बीच नर्मदा विवाद लंबे समय से चला आ रहा है। मध्यप्रदेश के अमरकंटक से निकलने वाली 1300 किलोमीटर लंबी नर्मदा नदी को लेकर गुजरात और मध्यप्रदेश के बीच लगातार तलवारें खिंची रहती हैं। नर्मदा नदी के पानी का बंटावारा और विस्थापन को लेकर लगातार विवाद गहराता रहता है। नर्मदा को लेकर विवाद इस कदर गंभीर है कि मध्यप्रदेश गुजरात के साथ राजस्थान भी इसमें कूद पड़ा है। हालांकि मुख्य विवाद नर्मदा पर बनने वाले एक हजार से ज्यादा छोटे बड़े बांधों को लेकर है जिसके कारण बड़ी आबादी विस्थापित होगी और इसका लाभ कम लोगों को ही मिल पाएगा।
यमुना नदी जल विवाद
देश में नदी को सबसे गहरा विवाद यमुना को लेकर है। पांच राज्यों से होकर गुजरने वाली यमुना नदी और इससे निकलने वाली नहर को लेकर यूपी हरियाणा और दिल्ली के बीच लगातार तलवारें खिंची रहती हैं। इसको लेकर 1954 में एक समझौता भी हुआ जिसमें हरियाणा को 77 फीसदी और यूपी को 23 फीसदी पानी मिलना था। बाद में दिल्ली और राजस्थान भी इस विवाद में कूद गए। जिसके बाद हरियाणा और दिल्ली के बीच हुए समझौते के तहत मुनक नहर का निर्माण हुआ। लेकिन इसके बाद से ही दोनों राज्यों में तलवारें खिंची रहती हैं। दिल्ली सरकार लगातार हरियणा पर मुनक नहर में पानी छोड़ने पर मनमानी का आरोप लगाती रही है।