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कानपुर कांड के बाद एक बार फिर चर्चा में आई पुलिस और अपराधियों की प्रगाढ़ता

Wed, 08 Jul 2020 01:46 PM IST
Tanuja Yadav न्यूज़ डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज़ डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: Tanuja Yadav Updated Wed, 08 Jul 2020 01:46 PM IST
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Kanpur News: The Uttar Pradesh Police gangster story is not new, here you know more about UP police
UP Police - फोटो : अमर उजाला

विकास दुबे के साथ संभावित लिंक होने पर 200 से ज्यादा पुलिसकर्मियों को जांच के दायरे में रखा गया है। कानपुर के बिकरू गांव में विकास दुबे को पकड़ने गई पुलिस टीम का, अपराधी के साथ झड़प होने पर आठ पुलिसकर्मी शहीद हो गए थे। इस कांड के बाद पुलिस विभाग का भ्रष्टाचार ही सामने नहीं आया बल्कि उसकी क्रूरता भी सामने आई है।

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पिछले साल उत्तर प्रदेश में भ्रष्टाचार पर ट्रांसपरेंसी इंटरनेशनल इंडिया की ओर से किए गए सर्वे के मुताबिक राज्य का पुलिस विभाग सिर्फ सबसे ज्यादा भ्रष्ट ही नहीं है बल्कि साल 2018-19 में भ्रष्टाचार के मामले सबसे ज्यादा बढ़े हैं। वहीं पिछले साल पुलिस की स्थिति पर की गई रिपोर्ट में यह दावा किया गया कि यूपी की पुलिस अपने वेतन से संतुष्ट नहीं है।
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रिपोर्ट में दावा किया गया है कि 68 फीसदी पुलिस वालों का कहना है कि जितना वो काम करते हैं, उसके हिसाब से उन्हें बहुत वेतन मिलता है।

विकास दुबे ने राज्य के मंत्री और बीजेपी नेता संतोष शुक्ला की साल 2001 में पुलिस स्टेशन के अंदर घुसकर हत्या कर दी थी। इस कहानी के बाद पुलिस और अपराधियों की साठ-गांठ के बारे में पता चला। कोर्ट में ट्रायल के दौरान सभी प्रत्यक्षदर्शी जो कि पुलिस वाले थे, विरोध के सुर अलापने लगे। 
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इसके अलावा एक और उदाहरण देखा जा सकता है कि साल की शुरुआत में नोएडा पुलिस चीफ वैभव कृष्ण को सस्पेंड कर दिया गया, जब उसने एक रिपोर्ट में पांच आईपीएस अफसरों को भ्रष्ट मामलों में लिप्त पाया। साल 2018 में नोएडा पुलिस की कथित रिश्वत लेने का रेट कार्ड सोशल मीडिया पर वायरल हो गया था।


एक तथ्य यह भी है कि उत्तर प्रदेश की पुलिस पर्याप्त तरीके से हथियारों से लैस नहीं है। देश में सबसे कम वाहन अगर किसी के पास हैं तो वो उत्तर प्रदेश की पुलिस है, ये आंकड़ा 57.8 फीसदी है। राज्य के पुलिस बल में आधी संख्या के पास हथियार नहीं है। 

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