{"_id":"58ead6eb4f1c1bac2b5b5a50","slug":"the-peace-is-necessary-to-bring-in-the-world-for-safe-childhood","type":"story","status":"publish","title_hn":"'सुरक्षित बचपन के लिए दुनिया में अमन लाना जरूरी'","category":{"title":"India News","title_hn":"भारत","slug":"india-news"}}
'सुरक्षित बचपन के लिए दुनिया में अमन लाना जरूरी'
amarujala.com- Presented by: संदीप भट्ट
Updated Mon, 10 Apr 2017 06:20 AM IST
विज्ञापन
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
सीरिया में रासायनिक हमले में जिन 27 बच्चों की दर्दनाक मौत हुई है, उन बच्चों की तस्वीरें देख कर मैं दहल गया हूं। खौफनाक टीवी फुटेज ने मुझे रात भर सोने नहीं दिया। उस नन्हें सीरियाई बालक आयलान को याद कीजिए, जिसकी 30 सितंबर, 2015 को समुद्र में डूबने से मौत हो गई थी। आईएस के हमले से बचने के लिए आयलान के माता-पिता समुद्र के रास्ते तुर्की जा रहे थे। तभी नाव दुघर्टना में आयलान समुद्र की लहरों में समा गया था। इसलिए बचपन को सुरक्षित करने के लिए दुनिया में अमन लाना जरूरी है। वसुधैव कुटुम्बकम का नारा देने वाले भारत को ‘करुणा के वैश्वीकरण’ की आवाज उठानी चाहिए।
गोला-बारूद, जहरीली गैसों और समुद्र में तड़प-तड़प कर मरने वाले इन बच्चों की क्या गलती थी? बच्चे न तो कभी सीमाएं निर्धारित करते हैं और न ही कभी किसी युद्ध और हिंसा का कारण होते हैं। वह तो धर्म को भी नहीं जानते, फिर भी धर्म के नाम पर होने वाले युद्ध और आतंकवाद के सबसे ज्यादा शिकार बच्चे ही हो रहे हैं।
दुनिया धार्मिक और राजनीतिक हिंसा के दौर से गुजर रही है। करोड़ों लोगों का जीवन तबाह कर देने वाली इस हिंसा के सबसे ज्यादा शिकार बच्चे हो रहे हैं। यूनिसेफ की एक रिपोर्ट के मुताबिक करीब 23 करोड़ बच्चे ऐसे हैं जो युद्ध और हिंसाग्रस्त देशों और इलाकों में रहते हैं।
विज्ञापन
संयुक्त राष्ट्र संघ के मुताबिक अकेले सीरिया में ही सात साल में 2.20 लाख लोगों की मौत हो चुकी है। इनमें 10 हजार बच्चे शामिल हैं।सीरिया की नहीं, नाइजीरिया, सूडान, सोमालिया, अफगानिस्तान सहित दुनिया के तमाम देश युद्ध और हिंसा की चपेट में हैं। संयुक्त राष्ट्र संघ ने 2009 के बाद से युद्धग्रस्त इलाकों में मारे गए लोगों का रिकॉर्ड रखना शुरू कर दिया है।
इसके मुताबिक अफगानिस्तान में सबसे ज्यादा बच्चों की मौत हुई है। यमन में बड़े पैमाने पर बच्चों को ‘चाइल्ड सोल्जर’ बनाया जा रहा है। हिंसा फैलाने वाले इस्लामिक स्टेट, बोको हरम और अल शबाब जैसे चरमपंथी संगठन न केवल मानव बम के लिए बच्चों का इस्तेमाल कर रहे हैं, बल्कि धन कमाने के लिए बड़े पैमाने पर किशोर लड़कियों की खरीद-फरोख्त भी कर रहे हैं। ऐसी लड़कियों को ‘सेक्स गुलाम’ भी बनाया जा रहा है।
स्थिति भयावह है। लाखों कमजोर और असहाय बच्चों की रक्षा करना हमारा सामूहिक कर्तव्य है। हमें नई पीढ़ी के बचपन और भविष्य को सुरक्षित बनाने के लिए दुनिया में अमन और शांति लानी होगी। बुद्ध और गांधी की धरती से यह आवाज उठनी चाहिए। पश्चिम के उपभोक्तावाद से उपजे भूमंडलीकरण और बाजारवाद के दुश्मनों ने पूरी दुनिया को हिंसा की चपेट में ला दिया है। ‘वसुधैव कुटुम्बकम’ का नारा देने वाले भारत से ‘करुणा के वैश्वीकरण’ की आवाज उठनी चाहिए।
(लेखक कैलाश सत्यार्थी बाल अधिकार कार्यकर्ता और नोबेल शांति पुरस्कार विजेता हैं।)
विज्ञापन
गोला-बारूद, जहरीली गैसों और समुद्र में तड़प-तड़प कर मरने वाले इन बच्चों की क्या गलती थी? बच्चे न तो कभी सीमाएं निर्धारित करते हैं और न ही कभी किसी युद्ध और हिंसा का कारण होते हैं। वह तो धर्म को भी नहीं जानते, फिर भी धर्म के नाम पर होने वाले युद्ध और आतंकवाद के सबसे ज्यादा शिकार बच्चे ही हो रहे हैं।
विज्ञापन
दुनिया धार्मिक और राजनीतिक हिंसा के दौर से गुजर रही है। करोड़ों लोगों का जीवन तबाह कर देने वाली इस हिंसा के सबसे ज्यादा शिकार बच्चे हो रहे हैं। यूनिसेफ की एक रिपोर्ट के मुताबिक करीब 23 करोड़ बच्चे ऐसे हैं जो युद्ध और हिंसाग्रस्त देशों और इलाकों में रहते हैं।
विज्ञापन
संयुक्त राष्ट्र संघ के मुताबिक अकेले सीरिया में ही सात साल में 2.20 लाख लोगों की मौत हो चुकी है। इनमें 10 हजार बच्चे शामिल हैं।सीरिया की नहीं, नाइजीरिया, सूडान, सोमालिया, अफगानिस्तान सहित दुनिया के तमाम देश युद्ध और हिंसा की चपेट में हैं। संयुक्त राष्ट्र संघ ने 2009 के बाद से युद्धग्रस्त इलाकों में मारे गए लोगों का रिकॉर्ड रखना शुरू कर दिया है।
इसके मुताबिक अफगानिस्तान में सबसे ज्यादा बच्चों की मौत हुई है। यमन में बड़े पैमाने पर बच्चों को ‘चाइल्ड सोल्जर’ बनाया जा रहा है। हिंसा फैलाने वाले इस्लामिक स्टेट, बोको हरम और अल शबाब जैसे चरमपंथी संगठन न केवल मानव बम के लिए बच्चों का इस्तेमाल कर रहे हैं, बल्कि धन कमाने के लिए बड़े पैमाने पर किशोर लड़कियों की खरीद-फरोख्त भी कर रहे हैं। ऐसी लड़कियों को ‘सेक्स गुलाम’ भी बनाया जा रहा है।
स्थिति भयावह है। लाखों कमजोर और असहाय बच्चों की रक्षा करना हमारा सामूहिक कर्तव्य है। हमें नई पीढ़ी के बचपन और भविष्य को सुरक्षित बनाने के लिए दुनिया में अमन और शांति लानी होगी। बुद्ध और गांधी की धरती से यह आवाज उठनी चाहिए। पश्चिम के उपभोक्तावाद से उपजे भूमंडलीकरण और बाजारवाद के दुश्मनों ने पूरी दुनिया को हिंसा की चपेट में ला दिया है। ‘वसुधैव कुटुम्बकम’ का नारा देने वाले भारत से ‘करुणा के वैश्वीकरण’ की आवाज उठनी चाहिए।
(लेखक कैलाश सत्यार्थी बाल अधिकार कार्यकर्ता और नोबेल शांति पुरस्कार विजेता हैं।)