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इशरत जहां मामले में हो सकती है नई उच्चस्तरीय जांच
राघवेंद्र नारायण मिश्र/ नई दिल्ली
Updated Fri, 17 Jun 2016 05:36 AM IST
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इशरत जहां (फाइल फोटो)
- फोटो : pti
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इशरत जहां मामले में केंद्र सरकार नई उच्चस्तरीय जांच की तैयारी कर रही है। इसमें गवाहों को प्रभावित करने के मामले की जांच को भी शामिल किया जाएगा। इस विवाद को देखते हुए केंद्रीय गृह मंत्री राजनाथ सिंह मुंबई की प्रेस कांफ्रेंस बीच में छोड़कर वापस दिल्ली आ चुके हैं।
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मामले की सीबीआई जांच कराने पर भी मंथन हो रहा है लेकिन इस पर अभी अंतिम निर्णय नहीं हुआ है। हालांकि केंद्रीय गृह सचिव राजीव महर्षि ने इस बात से इनकार किया है, इस मामले में जांच कर रहे अफसर ने किसी गवाह को सिखाया-पढ़ाया है।
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गौरतलब है कि राजनाथ सिंह द्वारा लोकसभा में की गई घोषणा के बाद इशरत मामले में गुम फाइलों की जांच के लिए गृह मंत्रालय के अतिरिक्त निदेशक बी के प्रसाद को नियुक्त किया गया था। प्रसाद ने अपनी रिपोर्ट केंद्रीय गृह सचिव को सौंप दी है।
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इस रिपोर्ट में फाइलों के गुम होने के बारे में किसी पर जिम्मेदारी तय नहीं की गई है। इस बीच जांच समिति के चीफ प्रसाद की गवाह और पूर्व निदेशक अशोक कुमार से फोन पर हुई बातचीत के लीक होने के बाद जांच पर ही सवाल खड़े हो गए हैं।
इस बातचीत में प्रसाद के गवाह को सवाल के साथ उत्तर भी रटाने की बात शामिल है। केंद्रीय गृह मंत्रालय ने ऐसी किसी भी तरह की बातचीत से इनकार किया है।
बातचीत को बिना अनुमति के रिकार्ड करना अनैतिक है : बी के प्रसाद
बी के प्रसाद ने कहा है कि उनकी और अशोक कुमार की बातचीत को बिना अनुमति के रिकार्ड करना अनैतिक है। उन्होंने कहा कि बातचीत का जो रिकार्ड प्रस्तुत किया जा रहा है वह इसका सिर्फ एक हिस्सा है। अशोक कुमार ने क्या पूछा यह नहीं बताया गया।
अशोक कुमार से 26 अप्रैल को पूछताछ की गई और उस पूछताछ में जो सवाल हुए वे जारी टेप में नहीं हैं। जिन अफसरों से पूछताछ की गई वे सभी सक्षम और वरिष्ठ हैं और उन्हें उत्तर के लिए किसी सीख की जरूरत नहीं है।
गृह मंत्रालय में 3 जनवरी 2011 से 23 दिसम्बर 2011 तक निदेशक (आईएएस) रहे अशोक कुमार ने कहा है कि प्रसाद ने 26 अप्रैल को उन्हें पूछताछ के लिए बुलाया था। उनसे प्रसाद ने इशरत जहां मामले में समीना कौसर द्वारा गुजरात हाईकोर्ट में दाखिल शपथ पत्र से संबंधित कागजातों के बारे में पूछताछ की।
यह शपथ पत्र पहले गृह सचिव द्वारा एलडी एजी के पास 18 सितंबर 2009 को भेजी गई। कहा जा रहा है है कि गृह मंत्री ( पी चिदंबरम) ने 24 सितंबर 2009 को शपथ पत्र में संशोधन किया। संशोधित शपथ पत्र गुजरात हाईकोर्ट में 29 सितम्बर 2009 को दाखिल किया गया।
अशोक कुमार से 26 अप्रैल को पूछताछ की गई और उस पूछताछ में जो सवाल हुए वे जारी टेप में नहीं हैं। जिन अफसरों से पूछताछ की गई वे सभी सक्षम और वरिष्ठ हैं और उन्हें उत्तर के लिए किसी सीख की जरूरत नहीं है।
गृह मंत्रालय में 3 जनवरी 2011 से 23 दिसम्बर 2011 तक निदेशक (आईएएस) रहे अशोक कुमार ने कहा है कि प्रसाद ने 26 अप्रैल को उन्हें पूछताछ के लिए बुलाया था। उनसे प्रसाद ने इशरत जहां मामले में समीना कौसर द्वारा गुजरात हाईकोर्ट में दाखिल शपथ पत्र से संबंधित कागजातों के बारे में पूछताछ की।
यह शपथ पत्र पहले गृह सचिव द्वारा एलडी एजी के पास 18 सितंबर 2009 को भेजी गई। कहा जा रहा है है कि गृह मंत्री ( पी चिदंबरम) ने 24 सितंबर 2009 को शपथ पत्र में संशोधन किया। संशोधित शपथ पत्र गुजरात हाईकोर्ट में 29 सितम्बर 2009 को दाखिल किया गया।
क्या है फाइल का मामला?
प्रसाद और अशोक कुमार के बीच हुए सवाल और जवाब
सवाल : संयुक्त सचिव धर्मेंद्र कुमार ने इस फाइल ( नम्बर 11011/75/04-आईएस-4) को लिंक अफसर निदेशक (एनई) के माध्यम से हाथ द्वारा भेजा। जैसा उन्होंने लिखा है। क्या आपने यह फाइल प्राप्त की?
उत्तर- मैं टूर पर था। और लौटने पर भी निदेशक (एनई) ने मुझे यह फाइल नहीं दी। मैंने अपने पूरे कार्यकाल में कभी भी इस फाइल को डील नहीं किया और ना ही यह फाइल कभी मेरे पास रही।
सवाल -क्या आप बता सकते हैं कि यह फाइल अभी किसके पास होगी?
उत्तर- गुम हुए कागजातों के बारे में मेरे लिए कुछ भी कहना कठिन होगा।
क्या है फाइल का मामला
दरअसल जब गृह मंत्री पी चिदंबरम् गृह मंत्री थे तो उस समय इशरत जहां मुठभेड़ कांड में मूल हलफनामे के अलावा एक दूसरा हलफनामा दायर करने की बात कही जा रही है। दूसरे हलफनामे में कहा गया था इस बात के निर्णायक सबूत नहीं हैं कि इशरत जहां लश्कर-ए-ताइबा की कार्यकर्ता थी।
जबकि मूल हलफनामे में उसे आतंकवादी बताया गया था। उस समय के गृह सचिव जी. के. पिल्लै ने दावा किया है इस मामले में अदालत में मूल हलफनामे दाखिल करने के एक महीने बाद चिदंबरम ने फाइल वापस मंगाई थी।
इस कहानी से यही सीख मिलती है कि छेड़छाड़ करके तैयार की गई (जांच अधिकारी की) रिपोर्ट भी सच नहीं छिपा सकती। वास्तविक मुद्दा यह है कि क्या इशरत जहां और तीन अन्य लोग वास्तविक मुठभेड़ में मारे गए थे या उनकी मौत फर्जी मुठभेड़ में हुई थी।
-पी चिदंबरम
जिस तरह जांच अधिकारी ने गवाह को सिखाया-पढ़ाया, उससे सुप्रीम कोर्ट को इस मामले को संज्ञान में लेकर कदम उठाना चाहिए।
- आनंद शर्मा, कांग्रेस प्रवक्ता
इस रिपोर्ट के बावजूद पी चिदंबरम् इस बात से बरी नहीं हो जाएंगे कि इशरत जहां से आतंकवादी का बिल्ला हटाने के लिए संशोधित हलफनामा दायर किया गया।
- भाजपा
सवाल : संयुक्त सचिव धर्मेंद्र कुमार ने इस फाइल ( नम्बर 11011/75/04-आईएस-4) को लिंक अफसर निदेशक (एनई) के माध्यम से हाथ द्वारा भेजा। जैसा उन्होंने लिखा है। क्या आपने यह फाइल प्राप्त की?
उत्तर- मैं टूर पर था। और लौटने पर भी निदेशक (एनई) ने मुझे यह फाइल नहीं दी। मैंने अपने पूरे कार्यकाल में कभी भी इस फाइल को डील नहीं किया और ना ही यह फाइल कभी मेरे पास रही।
सवाल -क्या आप बता सकते हैं कि यह फाइल अभी किसके पास होगी?
उत्तर- गुम हुए कागजातों के बारे में मेरे लिए कुछ भी कहना कठिन होगा।
क्या है फाइल का मामला
दरअसल जब गृह मंत्री पी चिदंबरम् गृह मंत्री थे तो उस समय इशरत जहां मुठभेड़ कांड में मूल हलफनामे के अलावा एक दूसरा हलफनामा दायर करने की बात कही जा रही है। दूसरे हलफनामे में कहा गया था इस बात के निर्णायक सबूत नहीं हैं कि इशरत जहां लश्कर-ए-ताइबा की कार्यकर्ता थी।
जबकि मूल हलफनामे में उसे आतंकवादी बताया गया था। उस समय के गृह सचिव जी. के. पिल्लै ने दावा किया है इस मामले में अदालत में मूल हलफनामे दाखिल करने के एक महीने बाद चिदंबरम ने फाइल वापस मंगाई थी।
इस कहानी से यही सीख मिलती है कि छेड़छाड़ करके तैयार की गई (जांच अधिकारी की) रिपोर्ट भी सच नहीं छिपा सकती। वास्तविक मुद्दा यह है कि क्या इशरत जहां और तीन अन्य लोग वास्तविक मुठभेड़ में मारे गए थे या उनकी मौत फर्जी मुठभेड़ में हुई थी।
-पी चिदंबरम
जिस तरह जांच अधिकारी ने गवाह को सिखाया-पढ़ाया, उससे सुप्रीम कोर्ट को इस मामले को संज्ञान में लेकर कदम उठाना चाहिए।
- आनंद शर्मा, कांग्रेस प्रवक्ता
इस रिपोर्ट के बावजूद पी चिदंबरम् इस बात से बरी नहीं हो जाएंगे कि इशरत जहां से आतंकवादी का बिल्ला हटाने के लिए संशोधित हलफनामा दायर किया गया।
- भाजपा