आबादी से आधा किलोमीटर दूर ही लगाया जा सकेगा कोल्हू, पहली बार कोल्हू के प्रदूषण पर गाइडलाइन
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अब आबादी व स्कूल-अस्पताल और संवेदी क्षेत्रों के नजदीक कोल्हू नहीं लगाया जा सकेगा। कोल्हू के प्रदूषण पर रोकथाम के लिए केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (सीपीसीबी) ने पहली बार गाइडलाइन जारी की है। इसमें कहा गया है कि कोल्हू को लगाने का स्थान बस्ती और संवेदी क्षेत्रों से न्यूनतम आधा किलोमीटर की दूरी पर ही होना चाहिए। वहीं, कोल्हू की भट्ठी में रबर, टायर, प्लास्टिक का इस्तेमाल भी पूरी तरह प्रतिबंधित होगा। ईंधन के लिए सूखी खोई (पैरा), कृषि अवशेष का इस्तेमाल किया जा सकता है।
सीपीसीबी के सदस्य सचिव ए सुधाकर ने बताया कि नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) के आदेश का पालन करते हुए यह कदम उठाया गया है। एनजीटी ने 22 नवंबर, 2017 को फैसला दिया था। इसके बाद उत्तर प्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने 14 दिसंबर को सीपीसीबी को खत लिखकर इस संबंध में दिशानिर्देश की मांग की थी। मामले का परीक्षण करने के बाद यह गाइडलाइन जारी की गई है।
भट्ठी के लिए पक्की ईंट और स्वच्छ ईंधन पर जोर सभी कोल्हू को कहा गया है कि वह भट्ठी में स्वच्छ ईंधन के इस्तेमाल पर जोर दें।
साथ ही भट्ठी को पक्की ईंट से तैयार किया जाना चाहिए न कि कीचड़ और मिट्टी से। इसके साथ ही गुड़ बनाने के लिए भट्ठी से तीन पैन जोडने का भी आदेश दिया गया है। वहीं रोजाना दो टन गुड़ बनाने वाले कोल्हू को यह छूट दी गई है कि वह एक से तीन पैन का इस्तेमाल अपनी इच्छा से कर सकता है। 500 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर से ज्यादा उत्सर्जन नहीं
कोल्हू की भट्ठी से अतिरिक्त गर्म हवा और पर्टिकुलेट मैटर (खतरनाक कण) बाहर न निकलें इसके लिए उसे ठीक से ढ़कने की भी व्यवस्था कोल्हू मालिक को करनी होगी। एक कोल्हू अधिकतम पर्टिकुलेट मैटर 500 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर से ज्यादा पर्टिकुलेट मैटर का उत्सर्जन नहीं कर सकता। वहीं राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की यह जिम्मेदारी होगी कि वह पर्टिकुलेट मैटर को नियंत्रित करने के लिए मानक तय करे। कोल्हू पूरी साफ-सफाई के साथ ही चलने चाहिए।
180 दिन भरपूर चलते हैं यूपी के 5000 कोल्हू
उत्तर प्रदेश में करीब 5000 कोल्हू हैं। गन्ना पेराई सीजन में पश्चिमी उत्तर प्रदेश व मध्य उत्तर प्रदेश इलाके में करीब 180 दिन कोल्हू के जरिए चीनी व अन्य उत्पादों का उत्पादन किया जाता है। वहीं इस दौरान कोल्हू के जरिए कार्बन डाई ऑक्साइड और कॉर्बन मोनो ऑक्साइड जैसी कई खतरनाक गैसों का उत्सर्जन होता है। जबकि इसकी किसी तरह की जांच का प्रावधान नहीं था। यह पूरा औद्योगिक क्षेत्र ही अनियंत्रित था।