तीन मूर्ति भवन से जुड़ी हैं पंडित नेहरू की यादें, जानिए ऐतिहासिक महत्व
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70 साल पहले जिस तीन मूर्ति भवन में देश के प्रथम प्रधानमंत्री रहने आये थे आज वो भाजपा और कांग्रेस के बीच राजनीतिक विवाद का केंद्र बन कर चर्चा में है। केंद्र सरकार तीन मूर्ति भवन को एक संग्रहालय में बदलना चाहती है जिसे लेकर कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और पूर्व प्रधानमंत्री डॉक्टर मनमोहन सिंह ने पीएम मोदी को नाराजगी जताते हुए चिट्ठी लिखी है।
दरअसल, मोदी सरकार तीन मूर्ति भवन को एक ऐसे संग्रहालय में तब्दील करना चाहती है जिसमें देश के सभी प्रधानमंत्रियों के बारे में विस्तार से जानकारी दी गई हो। लेकिन इस खबर के सामने आते ही कांग्रेस पार्टी में गुस्सा फूट पड़ा है और पूर्व प्रधानमंत्री ने फौरन अपना विरोध जता दिया है। पूर्व प्रधानमंत्री डॉक्टर मनमोहन सिंह ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को एक पत्र लिखकर इस योजना पर नाराजगी व्यक्त करते हुए कहा है कि यहां से पंडित नेहरू की यादें जुड़ी हैं और इसका एक ऐतिहासिक महत्व है, इसलिए इससे कोई छेड़छाड़ न की जाए।
इस पत्र में पूर्व प्रधानमंत्री ने ये भी लिखा कि इस योजना को एक एजेंडे के तहत लाकर एनएमएमएल और तीन मूर्ति कॉम्प्लेक्स में बदलाव करने की कोशिश की जा रही है। देश के प्रथम प्रधामंत्री जवाहरलाल नेहरू केवल कांग्रेस के नेता नहीं थे बल्कि पूरे देश के लोकप्रिय नेता थे। जिन लोगों का नाता पार्टी से ऊपर उठ कर पूरे देश से हो उनके योगदान को सराहना और यादों के संजों के रखना हर सरकार की नैतिक जिम्मेदारी है।
देश के बड़े शख्सियतों की स्मृतियों से छेड़-छाड़ की योजना को गलत ठहराते हुए पत्र में पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी का जिक्र किया । मनमोहन सिंह ने लिखा की उनकी सरकार ने अटल जी की यादों सेे कभी छेड़-छाड़ करने की कोशिश नहीं की। तीन मूर्ति भवन खुद में कई यादों को समेटे हुए है, आईये जानते हैं इसके ऐतिहासिक महत्व के बारे में।
फ्लैग स्टाफ हाउस
राॅबर्ट और रसेल नाम के शख्स थे वास्तुकार
1922 में तीन मूर्ति भवन स्मारक का निर्माण सिनाय, फिलीस्तीन व सीरिया में प्रथम विश्वयुद्ध के दौरान शहीद भारतीय सैनिकों की स्मृति में हुआ।
1947 में जनरल सर रॉय बुचर ने इसे खाली कर दिया था, जो कि इसमें रहने वाले भारत की आजादी के पहले अंतिम व्यक्ति थे।
1948 में 2 अगस्त से तीन मूर्ति भवन, देश के पहले पीएम जवाहरलाल नेहरू का निवास स्थान बना।
1964 में 14 नवम्बर को नेहरू के 75वें जन्मदिवस पर राष्ट्रपति डॉ. राधाकृष्णन ने तीन मूर्ति भवन में संग्रहालय एवं पुस्तकालय स्थापित करने के लिए राष्ट्र को औपचारिक रूप से समर्पित किया।
ब्रिटिश राज
तीन मूर्ति भवन को अंग्रेजों के जमानेे में फ्लैग स्टाफ हाउस के नाम से जाना जाता था जिसमें भारत में ब्रिटिश सेना के कमांडर-इन-चीफ रहा करते थे। इस भवन से न केवल पंडित नेहरू की यादें जुड़ी हैं, बल्कि इंदिरा गांधी और राजीव गांधी की भी यादें इससे जुड़ी हैं। इसका नामकरण तीन सैनिकों की मूर्ति समूह से हुआ जो कि मैसूर, जोधपुर एवं हैदराबाद राज्य के शस्त्रधारकों का प्रतिनिधित्व करते हैं।
आजादी के बाद
पंडित नेहरू के प्रधानमंत्री बनने के बाद यह उनका आधिकारिक आवास बन गया। आज से 70 साल पहले देश के पहले प्रधानमंत्री यहीं रहने आये थे और उनके निधन के बाद इस भवन को एक संग्रहालय में बदल दिया गया। यहां पर उनसे जुड़ी कई चीजों को सहेजकर रखा गया है। यूं भी यह कभी राजनीति का सबसे अहम केंद्र हुआ करता था।
कैसे पड़ा नाम
टेनिस कोर्ट हुआ करता था तारामंडल की जगह
जिस जगह पर नेहरू तारामंडल बना हुआ है, वहां पर कभी एक टेनिस कोर्ट हुआ करता था। जहां पर बचपन में राजीव अपने भाई संजय के साथ टेनिस खेलते थे। यहां पर इन दोनों का बचपन बीता था। नेहरू और उनके परिवार से जुड़ी यादों के रूप में यहां पर कई निजी फोटो भी लगे हैं। इस भवन में मौजूद सीढ़ीनुमा गुलाब उद्यान से कभी पंडित नेहरू अपनी शेरवानी में लगाने के लिए गुलाब चुनते थे। यह उनकी पहचान भी थी।
नेहरू तारामंडल
भवन परिसर में ही पश्चिमी ओर फिरोज शाह तुगलक निर्मित कुशक महल संरक्षित स्मारक है। तीन मूर्ति भवन के परिसर में ही नेहरू तारामंडल बना है। यहां ब्रह्मांड, तारों, सितारों और खगोलीय घटनाओं को वैज्ञानिक तकनीक से एक अर्ध-गोलाकार छत रूपी पर्दे पर देखा जा सकता है। नेहरू तारामंडल की कल्पना एवं योजना पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने बनाई थी। वे चाहती थीं कि बच्चों में विज्ञान को बढ़ावा दिया जाए।
ऐतिहासिक साक्ष्य
इतिहास के साक्षी बहुत से समाचार पत्र, जिनमें ऐतिहासिक समाचार छपे हैं, उनकी प्रतियां, या छायाचित्र भी यहां सुरक्षित हैं। इन सबके साथ ही पंडित नेहरू को मिला भारत रत्न भी प्रदर्शन के लिए रखा हुआ है।दरअसल जिस जगह यह भवन स्थित है वहां के गोल चक्कर पर बीचों बीच एक स्तंभ के किनारे तीन दिशाओं में मुंह किए हुए तीन सैनिकों की मूर्तियां लगी हुई हैं। ये द्वितीय विश्व युद्ध में काम आए सैनिकों का स्मारक है।
वास्तु
ये मूल भवन ऑस्ट्योर क्लासिक शैली में निर्मित है। इस शैली का दूसरा भवन दिल्ली स्थित हैदराबाद हाउस है। यह भव्य भवन साधारण रूप से उत्कृष्ट शैली में बनाया गया तथा इसकी संरचना के दौरान यह ध्यान रखा गया कि इसमें सैन्य कौशल का प्रतिबिम्ब परिलक्षित हो। फील्ड मार्शल सर विलियम बर्डवुड इस भवन में रहने वाले प्रथम व्यक्ति थे।