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दिल्ली के टीचरों को समझ नहीं आ रही भुट्टे से लेकर पान गुटखा तक बेचने की पढ़ाई
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फाइल फोटो
- फोटो : सोशल मीडिया
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दिल्ली सरकार ने स्कूली बच्चों के लिए वोकेशनल ट्रेनिंग की तर्ज पर एंटरप्रेन्योरशिप माइंडसेट करिकुलम (ईएमसी) कार्यक्रम शुरू किया है। इस योजना में नौवीं कक्षा से लेकर 12वीं कक्षा तक के विद्यार्थी शामिल हैं। हर छात्र को प्रतिवर्ष एक हजार रुपये मिलेंगे। वे स्कूल से बाहर जाकर कुछ भी बेचेंगे और एक हजार रुपये कमाकर स्कूल में जमा करा देंगे। कोई विद्यार्थी जमा नहीं करा पाया तो टीचर को एक विस्तृत फीडबैक रिपोर्ट तैयार करनी होगी। अब दिक्कत यह है कि टीचरों को इस बाबत कुछ नहीं पता।
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बच्चा स्कूल से बाहर जाकर पान गुटखा या भुट्टा बेचेगा, नहीं पता। खासतौर पर कला एवं विज्ञान संकाय के शिक्षक तो दिल्ली सरकार की इस योजना को लेकर कुछ ज्यादा ही परेशान हैं। उन्हें डर है कि बच्चों को कामधंधा सिखाने के चक्कर में उनका रिजल्ट खराब हो जाएगा। बच्चों को कामधंधा नहीं सिखाया तो भी सरकार मारेगी और रिजल्ट खराब आया तो करियर चौपट होना तय है। बता दें कि दिल्ली के शिक्षा मंत्री मनीष सिसोदिया ने यह सोचकर ईएमसी योजना लागू की है कि इससे बच्चे स्कूली स्तर पर ही कारोबार करने की कला सीख लेंगे।
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उन्होंने सार्वजनिक तौर पर यह बात कही थी कि युवा पीएचडी तक कर लेते हैं, लेकिन क्लर्क का फार्म भरते हैं। इसका क्या फायदा हुआ। बच्चों को स्कूली स्तर पर कामधंधे की जानकारी होगी तो वे बेरोजगारी की लाइन में नहीं खड़े होंगे। दूसरी ओर दिल्ली सरकार के टीचरों का कहना है कि इस योजना से स्कूल को दोहरा नुकसान होगा। चूंकि एक जुलाई से सभी स्कूलों में ईएमसी की ट्रेनिंग शुरू होगी। पहले पीरियड में यही ट्रेनिंग दी जाएगी।
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कई जगहों पर क्लास टीचर ही बच्चों को कारोबार की बारीकियों से अवगत कराएंगे। यदि किसी स्कूल में एक कक्षा के दस सेक्शन हैं तो ट्रेनिंग के लिए टीजीटी-पीजीटी में से दस शिक्षकों को जिम्मेदारी मिलेगी। यह ट्रेनिंग चालू सत्र में नियमित तौर पर चलती रहेगी। करीब ढाई लाख बच्चों को यह ट्रेनिंग दी जाएगी।
इसलिए परेशान हैं दिल्ली सरकार के टीचर
टीचरों का कहना है कि ईएमसी योजना लागू करने के लिए उन्हें केवल एक-दो घंटे की ट्रेनिंग दी गई है। वो भी किसी कमरे या हॉल में एक्सपर्ट द्वारा नहीं, त्यागराज स्टेडियम में भीड़ के बीच यह बताया गया कि बच्चों को कारोबार करना कैसे सिखाना है। जो टीचर आर्ट या विज्ञान संकाय के हैं, उन्हें इस बाबत कुछ नहीं मालूम। ट्रेनिंग में यह भी नहीं बताया गया कि बच्चों से कौन सा कामधंधा कराना है। वे बाजार में जाकर पान गुटखा बेचें, सिगरेट बेचें या पटरी पर भुट्टा और पानी की बोतल। उन्हें तो केवल बच्चों को एक नाटक के जरिए यह बताना है कि कारोबारा करना ठीक होता है। बस किसी भी तरह से बच्चों को प्रोत्साहन देना है।
अगर कोई बच्चा एक हजार रूपये वापस नहीं लौटाता है तो टीचर को तैयार करनी होगी फीडबैक रिपोर्ट
खास बात है कि यदि कोई बच्चा कामधंधा करने के बाद स्कूल में एक हजार रुपये जमा नहीं करा पाता है तो उसके लिए टीचर को फीडबैक लेकर रिपोर्ट तैयार करनी होगी। बच्चों से अनेकों सवाल पूछे जाएंगे। जैसे, कौन सा काम किया है, कहां किया, वो फेल क्यों हुआ और पैसे का दुरुपयोग आदि। नाम न छापने की शर्त पर एक पीजीटी ने बताया, हम बच्चों को पढ़ायें या उन्हें कारोबार के गुर सिखाएं। जब हमें ही नहीं मालूम तो हम बच्चों को क्या सिखाएंगे। अब रिजल्ट पर आते हैं। दिल्ली सरकार का पहले ही रिजल्ट को लेकर टीचरों पर भारी दबाव है। अब इस कारोबार के चक्कर में न टीचर और न ही बच्चे अपनी पढ़ाई पर फोकस कर पाएंगे। सारा साल इसी में बीत जाएगा। रिजल्ट खराब आया तो टीचर पर कार्रवाई होगी।
क्या कहते हैं शिक्षाविद और एक्सपर्ट
हरियाणा के पूर्व आईएएस अधिकारी अशोक कुमार यादव, जो कि स्कूली शिक्षा विभाग के महानिदेशक भी रहे हैं और अब स्कूल मंत्रा नाम से एक मैगजीन ला रहे हैं, बताते हैं, जिस उम्र में दिल्ली सरकार बच्चों को कारोबार करना सिखा रही है, दरअसल वह समय पढ़ाई पर ध्यान देने का है। अगर सरकार बच्चों की मदद ही करना चाहती है तो स्कूल किट या बच्चों की जरूरत के हिसाब से अन्य सामग्री देकर करे। वोकेशनल ट्रेनिंग देनी है, कौन सा ट्रेड, उसकी ग्राउंड रियल्टी, जिसमें बहुत सी परेशानियां भी शामिल है, आदि जानकारी की आवश्यता होती है। केवल वित्तीय सहायता देना सब कुछ नहीं है।
बच्चे की रूचि क्या है, यह जानना भी जरूरी है। यह जिम्मेदारी किसकी है कि बच्चा स्कूल से बाहर जाकर कौन सा काम करेगा। कई तरह के कई सर्वे और सूची तैयार करनी होती हैं। यादव के मुताबिक, इस योजना में सरकारी राशि के दुरुपयोग की आशंका ही ज्यादा नजर आती है। सरकार की योजना ठीक हो सकती है, लेकिन इस लागू करने में जल्दबाजी नजर आ रही है। पहले एक पायलट प्रोजेक्ट शुरू कर उसके नतीजे देखते तो ज्यादा ठीक रहता। जेएनयू के पूर्व प्रोफेसर आनंद कुमार कहते हैं, बच्चों को 40 मिनट के पीरियड में कैसे पता चलेगा कि उद्योग या व्यवसाय क्या होता है। वह कैसे चलता है, मार्केट सर्वे आदि का ज्ञान जरूरी है।
दिल्ली सरकार के स्कूलों में जो बच्चे पढ़ते हैं, उनकी माली हालत अच्छी नहीं है। केवल एक हजार रुपये दे देना और यह कहना कि काम करो, ठीक नहीं है। कौशल प्रशिक्षण की कला महज एक पीरियड में संभव नहीं है। स्कूली स्तर के बच्चों को वन टू वन समझाना पड़ता है। दिल्ली सरकार की योजना का कोई दूरगामी परिणाम सामने आएगा, ऐसा नहीं लगता। यदि कोई बच्चा सड़क पर कुछ बेच रहा है और उसके साथ कोई घटना हो जाती है तो वह जिम्मेदारी किसकी होगी।
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