कनाडा: 'सोशल सिक्योरिटी सिस्टम' और 'पेंशन फंड' पर लटकी तलवार, भारत से ऐसे चलती हैं ये दोनों योजनाएं
कनाडा पेंशन फंड की ओर से भारत के अलग-अलग बाजार में 15 अरब डॉलर से ज्यादा का निवेश हुआ है। जबकि इसका 80 फीसदी निवेश सोशल सिक्योरिटी सिस्टम को मजबूत करने के लिए भारत के रियल स्टेट फाइनेंशियल सेक्टर और अन्य बड़े स्टॉक मार्केट के माध्यम से किया गया है। अगर भारत और कनाडा के बीच रिश्ते ऐसे ही तर्क रहे तो कनाडा का यह सोशल सिक्योरिटी सिस्टम पूरी तरह से टूट जाएगा।
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कनाडा की तकरीबन चार करोड़ आबादी के लिए चल रहा सरकार का सोशल सिक्योरिटी सिस्टम बेपटरी होने वाला है। वहां की 65 साल से ज्यादा की उम्र वाले लोगों को दी जाने वाली एक अच्छी खासी आय वाली पेंशन भी खतरे में पड़ गई है। दरअसल कनाडा के लोगों की बेहतरी के लिए उनकी सरकार की ओर से चलाई जाने वाली दो प्रमुख योजना , सोशल सिक्योरिटी सिस्टम और कनाडा पेंशन फंड का भारत से सबसे गहरा नाता है। आंकड़ों के मुताबिक कनाडा ने अपनी इन दो प्रमुख योजनाओं के लिए भारत में 15 अरब डॉलर से ज्यादा का अलग-अलग सेक्टर में भारी निवेश किया है। इन आंकड़ों को मॉनिटर करने वाली देश की प्रमुख एजेंसी का मानना है अगर भारत और कनाडा के रिश्ते ऐसे ही बने रहे तो कनाडा की अर्थव्यवस्था बुरी तरीके से चरमरा सकती है, बड़ी सियासी हलचल भी पैदा कर सकती है। क्योंकि वहां की यह दो प्रमुख योजनाएं ज्यादातर भारत में किए गए निवेश के बदले मिलने वाली रकम से ही चल रही हैं।
इंडो कैनेडियन सोशियो इकोनामिक रिलेशंस एंड डेवलपमेंट (आईसीएसईआरडी) के को-फाउंडर जगमीत सिंह घुम्मन कहते हैं की सियासत के लिए कनाडा के प्रधानमंत्री जस्टिन ट्रूडो ने भारत पर जो आरोप लगाए हैं वह अब उनके लिए ही बड़ी मुसीबत बन सकते हैं। घुम्मन कहते हैं कनाडा ने भारत में अपनी दो प्रमुख योजनाओं के लिए सबसे बड़ा निवेश किया है। इसमें सिर्फ कनाडा पेंशन फंड की ओर से भारत के अलग-अलग बाजार में 15 अरब डॉलर से ज्यादा का निवेश हुआ है। जबकि इसका 80 फ़ीसदी निवेश सोशल सिक्योरिटी सिस्टम को मजबूत करने के लिए भारत के अलग-अलग प्रमुख रियल स्टेट, फाइनेंशियल सेक्टर और अन्य बड़े स्टॉक मार्केट के माध्यम से किया गया है। घुम्मन कहते हैं कि बीते दो दशक में कनाडा की अर्थव्यवस्था को खासतौर से उनकी सामाजिक सुरक्षा व्यवस्था और पेंशन फंड को भारत के बढ़ते हुए सबसे बड़े बाजार ने मजबूती दी है। अगर भारत और कनाडा के बीच में यह तल्खी बनी रही तो कनाडा की मजबूत माने जाने वाली पेंशन फंड स्कीम और सोशल सिक्योरिटी सिस्टम पूरी तरीके से ध्वस्त हो सकते हैं।
आईसीएसईआरडी के मुताबिक भारत के बढ़ते हुए बाजार को देखते हुए ही कनाडा ने यहां पर भारी निवेश किया है। वो कहते हैं कि 2005 के बाद से लेकर अब तक कनाडा ने उन दो प्रमुख योजनाओं को अगर छोड़ दिया जाए तो तकरीबन चार अरब डॉलर का अलग-अलग सेक्टर और स्टाक मार्केट समेत डेट मार्केट में निवेश शामिल है। इसके लिए कनाडा के पोर्टफोलियो इन्वेस्टरों ने भारत की मार्केट का भविष्य देखते हुए अरबों डॉलर यहां लगा दिए हैं। हालांकि आईसीएसईआरडी को फाउंडर घुम्मन कहते हैं कि भारत ने भी कनाडा में निवेश किया है लेकिन भारत का निवेश कनाडा की चार करोड़ आबादी वाले देश की ग्रोथ के लिहाज से ही है। भारत की कई सॉफ्टवेयर कंपनियां कनाडा में तो मौजूद है लेकिन वह कनाडा की अर्थव्यवस्था को चलाने के लिए बड़ी बैकबोन के तौर पर पहचानी जाती हैं। यही वजह है कि शुरू हुई तल्खियों के बीच भी कनाडा का एक बड़ा वर्ग कनाडा के प्रधानमंत्री जस्टिन ट्रूडो की मुखालफत कर रहा है।
दिल्ली विश्वविद्यालय में अर्थशास्त्र के प्रवक्ता प्रोफेसर उत्तम मनु कहते हैं कि भारत और कनाडा के बीच में हुए कंप्रिहेंसिव इकोनामिक पार्टनरशिप एग्रीमेंट से कनाडा की जीडीपी में अगले 12 साल के भीतर बड़ी ग्रोथ का अनुमान लगाया जा रहा था। प्रोफेसर मनु कहते हैं कि कनाडा की सेंट्रल बैंक और वित्तीय व्यवस्थाओं को देखने वाले मंत्रालय ने आकलन करके बताया था कि कंप्रिहेंसिव इकोनामिक पार्टनरशिप एग्रीमेंट के चलते होने वाले विपक्षीय व्यापार से तकरीबन सवा सात अरब डॉलर की वृद्धि होने वाली थी। इस इकोनामिक ग्रोथ के साथ कनाडा की जीडीपी में 2035 तक 5.93 अरब डॉलर की वृद्धि का भी अनुमान लगाया गया था। आंकड़े बताते हैं कि 2022 तक भारत और कनाडा के बीच में 8 अरब डॉलर का कारोबार हो रहा है। दोनों देशों में तकरीबन चार-चार अरब डॉलर का आयात और निर्यात बना हुआ है। जो कि पार्टनरशिप के माध्यम से आगे बढ़ने की राह पर भी चल रहा था। प्रोफेसर उत्तम कहते हैं कि अब किस तरीके से व्यापार और व्यापारिक गतिविधियां होंगी यह तो दोनों देशों की सरकार ही तय करेंगी। लेकिन जिस तरीके के इस वक्त रिश्ते भारत और कनाडा के बीच में बने हैं उसमें स्थितियां स्पष्ट नहीं दिख रही है।
आंकड़े बताते हैं कि कनाडा में भारत से पढ़ने जाने वाले छात्रों की वजह से भी उनकी अर्थव्यवस्था को बड़ा बूस्टर मिलता रहा है। "इंडो कैनेडियन यूनिवर्सिटीज कोलैबोरेशन एंड स्टूडेंट वेलफेयर" के आंकड़े बताते हैं कि 2018 के बाद से कनाडा में पढ़ने वाले विदेशी छात्रों में भारतीयों की संख्या सबसे ज्यादा बढ़ी है। इस संगठन के अध्यक्ष जतिन भोगल कहते हैं की 2022 में अकेले कनाडा में ही भारतीय छात्रों की संख्या में तकरीबन 49 फ़ीसदी की वृद्धि हुई थी। इसके चलते यह आंकड़ा तकरीबन साढ़े तीन लाख स्टूडेंट्स तक पहुंच गया था। वह कहते हैं कि भारत के अलग-अलग राज्यों खास तौर से उत्तरी भारत के पंजाब, हिमाचल प्रदेश, चंडीगढ़ और दिल्ली समेत उत्तराखंड के जाने वाले छात्रों की वजह से कनाडा की एजुकेशनल इंडस्ट्री को सबसे बड़ा बूस्टर मिला हुआ है। यूनिवर्सिटी कोलैबोरेशन एंड स्टूडेंट वेलफेयर के आंकड़े बताते हैं की बीते 15 सालों में छात्रों की यह संख्या न सिर्फ लगातार बढ़ रही है। बल्कि कनाडा की अर्थव्यवस्था को आगे बढ़ाने में सबसे बड़ी वर्कफोर्स के तौर पर भी कम कर रही है।
कनाडा में बसे भारतीय सामुदाय के प्रमुख संगठन "भारतीयम" के संदीप रावत कहते हैं कनाडा में सोशल सिक्योरिटी सिस्टम और पेंशन लोगों की जिंदगी को बेहतर करने का सबसे प्रमुख माध्यम है। कनाडा सरकार इन्हीं दो माध्यमों से वहां के चुनाव में अपनी इमेज को आगे रखती है। हालांकि संदीप का मानना है कि इसके अलावा भी और भी कई ऐसे मुद्दे हैं जो कि चुनाव में रखे जाते हैं। लेकिन यह दो मुद्दे कनाडा को समूची दुनिया में अलग पहचान भी देते हैं। संदीप कहते हैं कि जिस तरीके से कनाडा की डेवलपमेंट और ग्रोथ के लिए यहां की सरकार ने भारत में बड़ा निवेश किया है उसको देखते हुए तो यह कहा जा सकता है कि कनाडा की सरकार अपने पैरों पर कुल्हाड़ी नहीं मारेगी। क्योंकि सोशल सिक्योरिटी सिस्टम और पेंशन फंड में किसी भी तरह की आने वाली अड़चन से यहां की सरकार को मुसीबत का सामना करना पड़ सकता है और आने वाले चुनाव में उसका बड़ा खामियाजा भी भुगतना पड़ सकता है।