Supreme court : बच्चों के खिलाफ कुछ श्रेणियों के अपराध गैर-संज्ञेय होने पर केंद्र को नोटिस, पढ़ें SC की खबरें
याचिका में संशोधित अधिनियम की धारा 26 को चुनौती दी गई है जो तीन साल और उससे अधिक की अवधि के कारावास के साथ दंडनीय अपराधों को गैर-संज्ञेय के रूप में वर्गीकृत करता है।
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
विस्तार
सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को किशोर न्याय अधिनियम, 2015 में हालिया संशोधन को चुनौती देने वाली याचिका पर केंद्र से जवाब मांगा, जिसके तहत बच्चों के खिलाफ कुछ श्रेणियों के अपराधों को गैर-संज्ञेय बनाया गया है। न्यायमूर्ति डी वाई चंद्रचूड़ और न्यायमूर्ति हेमा कोहली की पीठ ने महिला एवं बाल विकास मंत्रालय को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है। शीर्ष अदालत दिल्ली बाल अधिकार संरक्षण आयोग द्वारा किशोर न्याय (देखभाल और संरक्षण) अधिनियम, 2015 में किए गए संशोधन को चुनौती देने वाली याचिका पर सुनवाई कर रही थी, जो बच्चों के खिलाफ किए गए कुछ अपराधों को गैर-संज्ञेय के रूप में वर्गीकृत करता है।
याचिका में संशोधित अधिनियम की धारा 26 को चुनौती दी गई है जो तीन साल और उससे अधिक की अवधि के कारावास के साथ दंडनीय अपराधों को गैर-संज्ञेय के रूप में वर्गीकृत करता है। संशोधित कानून के अनुसार, गंभीर अपराधों में वे शामिल होंगे जिनके लिए अधिकतम सजा सात साल से अधिक कारावास है। संज्ञेय अपराध अपराधों की एक श्रेणी है जिसमें पुलिस किसी व्यक्ति को बिना वारंट के गिरफ्तार कर सकती है, जबकि असंज्ञेय अपराध वे हैं जिनमें वह केवल अदालत से वारंट के साथ गिरफ्तारी को अंजाम दे सकती है। याचिका में कहा गया है कि संशोधन के परिणामस्वरूप पुलिस को किशोर अपराधियों की जांच और गिरफ्तारी करने की शक्ति से वंचित कर दिया गया है।
मानसिक स्वास्थ्य संस्थान में कैदियों को जंजीरों में जकड़े जाने पर याचिका
याचिका में कहा गया है कि मानसिक स्वास्थ्य अधिनियम, 2017 की धारा 95 के तहत मानसिक बीमारी वाले लोगों को जंजीर में बांधना प्रतिबंधित है। शीर्ष अदालत ने 2019 में कहा था कि मानसिक रूप से बीमार लोगों की जंजीर की अनुमति नहीं दी जा सकती है, इसे अत्याचारी और अमानवीय कहा जाता है।
ड्रग माफिया नेटवर्क के खतरे पर केंद्र को नोटिस
सीजेआई, न्यायमूर्ति एस रवींद्र भट और न्यायमूर्ति जेबी पारदीवाला की पीठ ने वकील शोएब आलम को सहायता के लिए एक न्याय मित्र नियुक्त किया और उन्हें अपनी पसंद के एक एडवोकेट-ऑन-रिकॉर्ड (एओआर) की सहायता लेने की स्वतंत्रता दी। 17 नवंबर, 2021 को मुख्य न्यायाधीश के समक्ष रखे गए कार्यालय नोट को मुख्य न्यायाधीश के निर्देशों के तहत एक रिट याचिका में बदल दिया गया।
उत्तराखंड उच्च न्यायालय के फैसले में हस्तक्षेप करने से इनकार
किराये की कोख से जुड़े प्रावधानों पर केंद्र से जवाब मांगा
न्यायमूर्ति अजय रस्तोगी और न्यायमूर्ति सीटी रविकुमार की पीठ ने याचिका पर सुनवाई करते हुए केंद्र सरकार और अन्य को नोटिस जारी किया। चेन्नई निवासी अर्जुन मुथुवेल की ओर से दायर इस याचिका में कहा गया है कि दोनों ही कानून किराये की कोख और सहायक प्रजनन प्रौद्योगिकी के विनियमन के अनिवार्य लक्ष्य को पूरी तरह हासिल करने के लिहाज से नाकाफी हैं। अधिवक्ता मोहिनी प्रिया की ओर से दाखिल इस याचिका में कहा गया कि सरोगेसी कानून किराये की कोख के कारोबार पर पूरी तरह पाबंदी लगाता है जो ना तो वांछनीय है और ना ही प्रभावी हो सकता है। याचिका में कहा गया है कि किराये की कोख के कारोबार पर पूर्ण पाबंदी से कालाबाजारी का उदय होगा और अधिक शोषण होगा।
याचिका में विवाहित महिलाओं के अलावा 35 साल से ऊपर की अन्य महिलाओं के अधिकारों को मान्यता देने का निर्देश देने की मांग की गई है ताकि मातृ सुख के लिए वह सहायक प्रजनन प्रौद्योगिकी के साधन के रूप में किराये की कोख हासिल कर सकें।