Supreme Court: शीर्ष अदालत ने दिल्ली सरकार को दिया बड़ा झटका, प्राइवेट बिजली कंपनियों के कैग ऑडिट पर लगाई रोक
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सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को दिल्ली की निजी बिजली वितरण कंपनियों (डिस्कॉम) के ऑडिट को लेकर चल रहे विवाद में यथास्थिति बनाए रखने का आदेश दिया। अदालत ने नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (सीएजी) द्वारा प्रस्तावित ऑडिट और स्वतंत्र चार्टर्ड अकाउंटेंट की नियुक्ति से संबंधित आगे की कार्रवाई पर फिलहाल रोक लगा दी है।
न्यायमूर्ति केवी विश्वनाथन और न्यायमूर्ति श्री चंद्रशेखर की पीठ ने यह अंतरिम आदेश दिल्ली विद्युत विनियामक आयोग (डीईआरसी) की ओर से दायर अपीलों पर सुनवाई के दौरान दिया। डीईआरसी ने बिजली अपीलीय न्यायाधिकरण (एपीटीईएल) के आदेशों को चुनौती दी है।
मामले में नोटिस जारी करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि यह विवाद एक महत्वपूर्ण कानूनी प्रश्न से जुड़ा है, जिस पर विचार किया जाना आवश्यक है। अदालत ने अगली सुनवाई तक यथास्थिति बनाए रखने का निर्देश दिया।
सुप्रीम कोर्ट ने मामले की अगली सुनवाई 15 जुलाई को तय करते हुए एपीटीईएल के उस आदेश पर रोक लगा दी, जिसमें डीईआरसी को ऑडिट के लिए एक स्वतंत्र चार्टर्ड अकाउंटेंट नियुक्त करने का निर्देश दिया गया था। अदालत ने यह भी कहा कि फिलहाल सीएजी भी इस ऑडिट की प्रक्रिया को आगे नहीं बढ़ाएगा।
यह विवाद सुप्रीम कोर्ट के एक पुराने फैसले से जुड़ा है, जिसमें 2011 से 2014 के बीच डीईआरसी द्वारा जारी टैरिफ आदेशों से संबंधित मामलों की सुनवाई की गई थी। अगस्त 2025 में दिए गए अपने फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने बिजली वितरण कंपनियों द्वारा जमा किए गए नियामकीय परिसंपत्तियों (रेगुलेटरी एसेट्स) पर चिंता जताई थी और बिजली नियामक आयोगों को यह जांच करने का निर्देश दिया था कि ये परिसंपत्तियां किन परिस्थितियों में जमा हुईं। हालांकि, उस फैसले में यह स्पष्ट नहीं किया गया था कि यह ऑडिट कौन करेगा।
इसके बाद मार्च 2026 में दिल्ली के उपराज्यपाल ने सीएजी से ऑडिट कराने के प्रस्ताव को मंजूरी दे दी थी। इस फैसले को एपीटीईएल में चुनौती दी गई, जहां न्यायाधिकरण ने कहा कि कानून के तहत डीईआरसी सीएजी को ऑडिट का काम नहीं सौंप सकता। इसके बजाय उसने डीईआरसी को एक स्वतंत्र चार्टर्ड अकाउंटेंट नियुक्त करने का निर्देश दिया।
डीईआरसी की पुनर्विचार याचिकाएं भी खारिज कर दी गईं, जिसके बाद आयोग ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया।
सुनवाई के दौरान डीईआरसी की ओर से पेश सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट के अगस्त 2025 के फैसले में जिस ऑडिट की बात कही गई थी, वह नियामकीय परिसंपत्तियों से जुड़े मुद्दे के समाधान का महत्वपूर्ण हिस्सा है और उपभोक्ताओं से किसी भी प्रकार की वसूली से पहले इसे पूरा किया जाना जरूरी है।
वहीं बिजली कंपनियों की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता अभिषेक मनु सिंघवी ने इस तर्क का विरोध करते हुए कहा कि वर्तमान विवाद केवल इस बात तक सीमित है कि ऑडिट कौन करेगा। उन्होंने कहा कि ऑडिट और नियामकीय परिसंपत्तियों की वसूली दो अलग-अलग मुद्दे हैं।
दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि इस मामले में उसके अगस्त 2025 के फैसले की व्याख्या करना आवश्यक है। इसके चलते अदालत ने मामले को भारत के मुख्य न्यायाधीश (सीजेआई) के समक्ष भेजने का निर्देश दिया, ताकि इसे सुनवाई के लिए उचित पीठ को सौंपा जा सके।
करूर भगदड़ मामला: डीएमके का सुप्रीम कोर्ट में पक्षकार बनाने का आग्रह, सीबीआई जांच प्रभावित होने की जताई आशंका
द्रविड़ मुनेत्र कड़गम (डीएमके) ने करूर भगदड़ मामले में सुप्रीम कोर्ट में एक आवेदन दाखिल कर खुद को मामले में पक्षकार बनाने का आग्रह किया है। पार्टी का आरोप है कि इस मामले के आरोपी तमिलनाडु के एक मंत्री द्वारा हाल ही में दिए गए सार्वजनिक बयान और पीड़ित परिवारों को सरकारी लाभ वितरित करने की प्रस्तावित योजना से कोर्ट की निगरानी में चल रही सीबीआई जांच प्रभावित हो सकती है।
यह आवेदन डीएमके के संगठन सचिव आरएस भारती ने दायर किया है। उन्होंने 27 सितंबर 2025 को हुई करूर भगदड़ से जुड़े मामले में प्रतिवादी के रूप में शामिल किए जाने की मांग की है। इस हादसे में तमिलगा वेत्री कड़गम (टीवीके) की एक रैली के दौरान 41 लोगों की मौत हो गई थी, जबकि 142 लोग घायल हुए थे।
यह याचिका ऐसे समय में दायर की गई है, जब सुप्रीम कोर्ट पहले ही मामले की जांच केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) को सौंप चुका है। जांच की निगरानी पूर्व सुप्रीम कोर्ट न्यायाधीश न्यायमूर्ति अजय रस्तोगी की अध्यक्षता वाली समिति कर रही है। शीर्ष अदालत ने मद्रास हाईकोर्ट में मामले की सुनवाई के तरीके पर चिंता जताते हुए गड़बड़ी की आशंका जताई।
आवेदन में 2 जुलाई को तमिलनाडु के लोक निर्माण एवं खेल मंत्री आधव अर्जुन द्वारा दिए गए भाषण का उल्लेख किया गया है। आधव अर्जुन इस मामले में आरोपी भी हैं। डीएमके का आरोप है कि मंत्री ने सार्वजनिक रूप से कहा कि कुछ हिसाब बराबर करना है और करूर हादसे के लिए पिछली डीएमके सरकार को जिम्मेदार ठहराया।
याचिका में कहा गया है कि किसी ऐसे मंत्री का, जो खुद जांच के दायरे में हो, जांच के दौरान इस तरह का बयान देना पूरी तरह अनुचित है और इससे सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में चल रही जांच की निष्पक्षता प्रभावित हो सकती है।डीएमके ने आरोप लगाया कि यह बयान सीबीआई जांच में हस्तक्षेप करने और राजनीतिक लाभ के लिए जनता के बीच यह धारणा बनाने की कोशिश है कि इस घटना के लिए डीएमके और उसका नेतृत्व जिम्मेदार है।याचिका में मीडिया रिपोर्टों का भी हवाला दिया गया है, जिनमें कहा गया है कि मुख्यमंत्री सी. जोसेफ विजय 10 जुलाई को करूर जाकर भगदड़ में मारे गए लोगों के परिजनों को लाभ वितरित कर सकते हैं।
हालांकि, डीएमके ने स्पष्ट किया कि उसे पीड़ित परिवारों को सहायता देने पर कोई आपत्ति नहीं है। याचिका में कहा गया है कि राज्य सरकार द्वारा मृतकों और घायलों के परिवारों को मुआवजा, अनुकंपा नियुक्ति या अन्य कल्याणकारी सहायता देने का वह विरोध नहीं करती। लेकिन पार्टी का कहना है कि पीड़ित परिवार कोर्ट की निगरानी में चल रही सीबीआई जांच के महत्वपूर्ण गवाह भी हैं। ऐसे में मामले से जुड़े लोगों का सीधे उनसे संपर्क करना जांच की निष्पक्षता और स्वतंत्रता को लेकर आशंका पैदा कर सकता है।
याचिका में यह भी कहा गया है कि मुख्यमंत्री पद संभालने से पहले विजय ने कथित तौर पर मृतकों के परिवारों को 20-20 लाख रुपए और घायलों को 2-2 लाख रुपए की सहायता दी थी, जबकि उस समय आपराधिक कार्यवाही लंबित थी। डीएमके ने यह भी उल्लेख किया कि 2026 विधानसभा चुनाव के बाद करूर भगदड़ मामले के कई आरोपी अब तमिलनाडु सरकार में मंत्री पदों पर हैं, जिनमें विजय और टीवीके के अन्य वरिष्ठ नेता शामिल हैं। याचिका में इन परिस्थितियों को 'असाधारण स्थिति' बताते हुए कहा गया है कि इन घटनाक्रमों के संयुक्त प्रभाव से यह आशंका पैदा होती है कि यदि सुप्रीम कोर्ट आवश्यक सुरक्षा उपाय नहीं अपनाता, तो चल रही जांच की निष्पक्षता और स्वतंत्रता प्रभावित हो सकती है।