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Supreme Court: सरकारों के पास निचली अदालतों के बकाया भुगतान का अंतिम मौका, SNJPC की सिफारिश पर कोर्ट सख्त
Thu, 23 Nov 2023 06:27 PM IST
आदर्श शर्मा
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
Published by: आदर्श शर्मा
Updated Thu, 23 Nov 2023 06:27 PM IST
सार
दूसरी राष्ट्रीय न्यायिक वेतन आयोग(एसएजेपीसी) की सिफारिशों के तहत निचली अदालतों ने अधिकारियों का बकाया भुगतान के लिए सुप्रीम कोर्ट ने राज्य सरकारों और केंद्र शासित प्रदेशों को अंतिम मौका दिया है। यहां पढ़ें...
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सुप्रीम कोर्ट
- फोटो : ANI
विस्तार
दूसरी राष्ट्रीय न्यायिक वेतन आयोग(एसएजेपीसी) की सिफारिशों के मुताबिक निचली अदालत के न्यायाधीशों के बकाया वेतन और अन्य बकाया भुगतान करने के लिए राज्यों, केंद्र शासित प्रदेशों को सुप्रीम कोर्ट ने अंतिम मौका दिया है।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा- अंतिम अवसर दिया
सुप्रीम कोर्ट ने मामले की सुनवाई करते हुए कहा, आदेश के अनुपालन के लिए एक आखिरी मौका दिया जा रहा है। निर्देश 8 दिसंबर 2023 को या उससे पहले प्रभावी होंगे। यदि फिर भी आदेशों की अवमानना होती है तो, राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के मुख्य सचिव व्यक्तिगत रूप से अदालत के सामने पेश होंगे। साथ ही कोर्ट ने स्पष्ट करते हुए कहा, अनुपालन का अर्थ- प्रत्येक न्यायिक अधिकारी और पारिवारिक पेंशन के मामले में जीवित पति-पत्नी को देय राशि का वास्तविक क्रेडिट होगा।
बता दें एसएनजेपीसी की सिफारिशें जिला न्यायपालिका की सेवा शर्तों के विषयों,वेतन संरचना, पेंशन और पारिवारिक पेंशन और भत्ते को कवर करती हैं। मुख्य न्यायाधीश चंद्रचूड़ की अध्यक्षता वाली पीठ ने कहा, 19 मई को दिए उनके आदेशों के बावजूद कुछ राज्यों ने उसका अनुपालन नहीं किया है। पीठ ने कहा, पहली नजर में लग रहा है, राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के सचिव आदेश की अवमानना कर रहे हैं।
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गौरतलब है कि जिला न्यायपालिका को न्यायिक प्रणाली का अहम अंग बताते हुए सुप्रीम कोर्ट ने 19 मई को आदेश दिया था कि सभी राज्यों को एसएनजेपीसी की सिफारिशों के मुताबिक निचली अदालत के न्यायाधीशों के बकाया और अन्य भुगतान करना होगा। 2020 में न्यायमूर्ति पीवी रेड्डी की अध्यक्षता वाली एसएनजेपीसी द्वारा दी सिफारिशों को सुप्रीम कोर्ट ने स्वीकार कर लिया था। साथ ही कोर्ट ने राज्यों को आदेश दिए थे कि न्यायिक अधिकारियों के खातों में बकाया भुगतान किया जाए।
कोर्ट ने कहा था कि एसएनजेपीसी की सिफारिशों को लागू करने के लिए सभी न्यायक्षेत्रों में न्यायिक अधिकारियों के सेवा नियमों में जिला न्यायपालिका में कैडर की एकरूपता जैसे मुद्दों पर आवश्यक संशोधन किए जाने चाहिए। साथ ही एक अन्य आदेश में पीठ ने तेलंगाना हाईकोर्ट को राज्य सरकार के अधिकारियों के अनुरूप न्यायिक अधिकारियों की सेवानिवृत्ति आयु 60 से बढ़ाकर 61 वर्ष करने की भी अनुमति दी।
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सुप्रीम कोर्ट ने कहा- अंतिम अवसर दिया
सुप्रीम कोर्ट ने मामले की सुनवाई करते हुए कहा, आदेश के अनुपालन के लिए एक आखिरी मौका दिया जा रहा है। निर्देश 8 दिसंबर 2023 को या उससे पहले प्रभावी होंगे। यदि फिर भी आदेशों की अवमानना होती है तो, राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के मुख्य सचिव व्यक्तिगत रूप से अदालत के सामने पेश होंगे। साथ ही कोर्ट ने स्पष्ट करते हुए कहा, अनुपालन का अर्थ- प्रत्येक न्यायिक अधिकारी और पारिवारिक पेंशन के मामले में जीवित पति-पत्नी को देय राशि का वास्तविक क्रेडिट होगा।
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बता दें एसएनजेपीसी की सिफारिशें जिला न्यायपालिका की सेवा शर्तों के विषयों,वेतन संरचना, पेंशन और पारिवारिक पेंशन और भत्ते को कवर करती हैं। मुख्य न्यायाधीश चंद्रचूड़ की अध्यक्षता वाली पीठ ने कहा, 19 मई को दिए उनके आदेशों के बावजूद कुछ राज्यों ने उसका अनुपालन नहीं किया है। पीठ ने कहा, पहली नजर में लग रहा है, राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के सचिव आदेश की अवमानना कर रहे हैं।
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गौरतलब है कि जिला न्यायपालिका को न्यायिक प्रणाली का अहम अंग बताते हुए सुप्रीम कोर्ट ने 19 मई को आदेश दिया था कि सभी राज्यों को एसएनजेपीसी की सिफारिशों के मुताबिक निचली अदालत के न्यायाधीशों के बकाया और अन्य भुगतान करना होगा। 2020 में न्यायमूर्ति पीवी रेड्डी की अध्यक्षता वाली एसएनजेपीसी द्वारा दी सिफारिशों को सुप्रीम कोर्ट ने स्वीकार कर लिया था। साथ ही कोर्ट ने राज्यों को आदेश दिए थे कि न्यायिक अधिकारियों के खातों में बकाया भुगतान किया जाए।
कोर्ट ने कहा था कि एसएनजेपीसी की सिफारिशों को लागू करने के लिए सभी न्यायक्षेत्रों में न्यायिक अधिकारियों के सेवा नियमों में जिला न्यायपालिका में कैडर की एकरूपता जैसे मुद्दों पर आवश्यक संशोधन किए जाने चाहिए। साथ ही एक अन्य आदेश में पीठ ने तेलंगाना हाईकोर्ट को राज्य सरकार के अधिकारियों के अनुरूप न्यायिक अधिकारियों की सेवानिवृत्ति आयु 60 से बढ़ाकर 61 वर्ष करने की भी अनुमति दी।
PMLA से जुड़ी पुनर्विचार याचिका को सुप्रीम कोर्ट ने टाला
वर्ष 2022 के पीएमएलए फैसले पर दायर पुनर्विचार याचिका को सुप्रीम कोर्ट ने टाल दिया है। बता दें फैसले में ईडी की गिरफ्तारी और संपत्ति कुर्क करने की शक्तियों को बरकरार रखा गया था। सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को इस मामले पर पुनर्विचार याचिका को आठ हफ्तों के लिए टाल दिया है। केंद्र की ओर से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता द्वारा कोर्ट से समय मांगने के बाद पीठ ने सुनवाई को टाल दिया।
हालांकि न्यायमूर्ति संजीव खन्ना और न्यायमूर्ति त्रिवेदी की पीठ ने संशोधन आवेदन वाली याचिका को स्वीकार करते हुए केंद्र सरकार को चार सप्ताह के अंदर जवाब दाखिल करने को कहा है।
पीठ ने कहा, स्थगन से अदालत को आदेश लिखने के लिए पर्याप्त समय नहीं मिलेगा। हममें से एक न्यायाधीश के सेवानिवृत्त होने पर सीजेआई को पीठ का पुनर्गठन करना होगा। बता दें जस्टिस कौल 25 दिसंबर को सेवानिवृत्त हो रहे हैं।
याचिकाकर्ताओं की तरफ से वकील कपिल सिब्बल, अभिषेक सिंघवी ने मामले पर दलीलें दी। बुधवार को सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि सीमित दायरा यह है कि क्या 2022 के फैसले पर बड़ी पीठ द्वारा पुनर्विचार करने की आवश्यकता है। केंद्र से सुप्रीम कोर्ट को कहा था कि धन शोधन निवारण अधिनियम (पीएमएलए) देश के लिए एक जरूरी कानून है। वहीं याचिकाकर्ता ने ईडी को एक 'बेकाबू घोड़े' की संज्ञा दी।
बता दें पीठ कुछ मापदंडों पर 2022 के फैसले पर पुनर्विचार की मांग वाली याचिकाओं पर सुनवाई कर रही थी।
हालांकि न्यायमूर्ति संजीव खन्ना और न्यायमूर्ति त्रिवेदी की पीठ ने संशोधन आवेदन वाली याचिका को स्वीकार करते हुए केंद्र सरकार को चार सप्ताह के अंदर जवाब दाखिल करने को कहा है।
पीठ ने कहा, स्थगन से अदालत को आदेश लिखने के लिए पर्याप्त समय नहीं मिलेगा। हममें से एक न्यायाधीश के सेवानिवृत्त होने पर सीजेआई को पीठ का पुनर्गठन करना होगा। बता दें जस्टिस कौल 25 दिसंबर को सेवानिवृत्त हो रहे हैं।
याचिकाकर्ताओं की तरफ से वकील कपिल सिब्बल, अभिषेक सिंघवी ने मामले पर दलीलें दी। बुधवार को सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि सीमित दायरा यह है कि क्या 2022 के फैसले पर बड़ी पीठ द्वारा पुनर्विचार करने की आवश्यकता है। केंद्र से सुप्रीम कोर्ट को कहा था कि धन शोधन निवारण अधिनियम (पीएमएलए) देश के लिए एक जरूरी कानून है। वहीं याचिकाकर्ता ने ईडी को एक 'बेकाबू घोड़े' की संज्ञा दी।
बता दें पीठ कुछ मापदंडों पर 2022 के फैसले पर पुनर्विचार की मांग वाली याचिकाओं पर सुनवाई कर रही थी।