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सुप्रीम कोर्ट: मतगणना का वीडियो न देने पर सुप्रीम फटकार, अदालत ने कहा- बहाने नहीं चलेंगे
Thu, 15 Oct 2026 04:56 AM IST
नितिन गौतम
अमर उजाला ब्यूरो
अमर उजाला ब्यूरो
Published by: नितिन गौतम
Updated Thu, 15 Oct 2026 04:56 AM IST
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सुप्रीम कोर्ट
- फोटो : ANI
सुप्रीम कोर्ट ने निर्वाचन आयोग को कर्नाटक के शृंगेरी विधानसभा क्षेत्र की 2023 की मतगणना की वीडियो रिकॉर्डिंग ट्रेस न कर पाने का दावा करने पर कड़ी फटकार लगाई। अदालत ने कहा कि हम लचर बहाने नहीं मानेंगे, आप रिकॉर्ड पेश करें। जस्टिस संजय कुमार और जस्टिस संजीव सचदेवा की पीठ कांग्रेस नेता टीडी राजेगौड़ा और भाजपा प्रत्याशी डीएन जीवराज के बीच चुनावी विवाद से जुड़े मामले की सुनवाई कर रही थी।
चुनाव आयोग की ओर से वरिष्ठ वकील शेषाद्री नायडू ने पीठ को जब बताया कि आयोग 2023 की मतगणना का वीडियो ढूढ़ंने में असमर्थ है, तो पीठ ने इस पर कड़ा ऐतराज और आश्चर्य व्यक्त किया। पीठ ने कहा, आयोग यह कैसे कह सकता है कि उसने अपना रिकॉर्ड खो दिया है? आपका पूरा उद्देश्य ही चुनाव कराना है, और आपके पास दस्तावेज सुरक्षित होने चाहिए।
पीठ ने पूछा- क्या आपने इसे निर्वाचित उम्मीदवार को दे दिया था?
पीठ ने कहा, आप यह कैसे कह सकते हैं कि हां, हम इसे ट्रेस करने की कोशिश कर रहे हैं? क्या आपने इसे निर्वाचित उम्मीदवार को दे दिया था? क्या आपके यहां रिकॉर्ड्स की कोई कस्टडी नहीं है? आपके पास जो कुछ भी है, उसे अगली तारीख 15 फरवरी 2027 पर पेश करें।
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क्या है मामला
2023 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस के टीडी राजेगौड़ा शृंगेरी सीट से महज 201 वोटों के बेहद मामूली अंतर से जीते थे। हालांकि, हाल ही में वोटों की दोबारा गिनती के बाद राजेगौड़ा को हटा दिया गया और भाजपा के डीएन जीवराज को अधिक वोट मिलने पर विजयी घोषित कर दिया गया। मई में सुप्रीम कोर्ट ने राजेगौड़ा को अंतरिम राहत देते हुए निर्देश दिया था कि उनकी याचिका लंबित रहने तक वे विधायक बने रहेंगे। भाजपा प्रत्याशी डीएन जीवराज खुद पोस्टल बैलेट पेपरों के साथ कथित छेड़छाड़ के एक आपराधिक मामले का सामना कर रहे हैं।
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चुनाव आयोग की ओर से वरिष्ठ वकील शेषाद्री नायडू ने पीठ को जब बताया कि आयोग 2023 की मतगणना का वीडियो ढूढ़ंने में असमर्थ है, तो पीठ ने इस पर कड़ा ऐतराज और आश्चर्य व्यक्त किया। पीठ ने कहा, आयोग यह कैसे कह सकता है कि उसने अपना रिकॉर्ड खो दिया है? आपका पूरा उद्देश्य ही चुनाव कराना है, और आपके पास दस्तावेज सुरक्षित होने चाहिए।
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पीठ ने पूछा- क्या आपने इसे निर्वाचित उम्मीदवार को दे दिया था?
पीठ ने कहा, आप यह कैसे कह सकते हैं कि हां, हम इसे ट्रेस करने की कोशिश कर रहे हैं? क्या आपने इसे निर्वाचित उम्मीदवार को दे दिया था? क्या आपके यहां रिकॉर्ड्स की कोई कस्टडी नहीं है? आपके पास जो कुछ भी है, उसे अगली तारीख 15 फरवरी 2027 पर पेश करें।
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क्या है मामला
2023 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस के टीडी राजेगौड़ा शृंगेरी सीट से महज 201 वोटों के बेहद मामूली अंतर से जीते थे। हालांकि, हाल ही में वोटों की दोबारा गिनती के बाद राजेगौड़ा को हटा दिया गया और भाजपा के डीएन जीवराज को अधिक वोट मिलने पर विजयी घोषित कर दिया गया। मई में सुप्रीम कोर्ट ने राजेगौड़ा को अंतरिम राहत देते हुए निर्देश दिया था कि उनकी याचिका लंबित रहने तक वे विधायक बने रहेंगे। भाजपा प्रत्याशी डीएन जीवराज खुद पोस्टल बैलेट पेपरों के साथ कथित छेड़छाड़ के एक आपराधिक मामले का सामना कर रहे हैं।
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गणना फॉर्म नहीं भरने पर वोटर का नाम हटाना गैरकानूनी: जस्टिस ओका
सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज जस्टिस अभय ओका ने कहा कि सिर्फ गणना फॉर्म नहीं भरने के आधार पर किसी मतदाता का नाम सूची से हटाने की प्रक्रिया कानून के अनुरूप नहीं है। उन्होंने कहा कि सीजेआई जस्टिस सूर्यकांत की पीठ के मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) की सांविधानिक वैधता बरकरार रखने वाले मई 2026 के फैसले पर दोबारा विचार करने की जरूरत है।
जस्टिस ओका ने कहा, जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 के तहत मतदाता सूची के गहन पुनरीक्षण की प्रक्रिया एक समय में किसी एक निर्वाचन क्षेत्र के लिए होनी चाहिए, न कि सभी निर्वाचन क्षेत्रों में एक साथ। उनके मुताबिक, निर्वाचन आयोग के पास गणना फॉर्म अनिवार्य करने और उसे नहीं भरने पर सीधे नाम हटाने का अधिकार भी नहीं है। उन्होंने कहा, मतदाता का नाम हटाने से पहले उसे कारण बताओ नोटिस देना, अपना पक्ष रखने का अवसर देना और कानून के मुताबिक निर्णय करना जरूरी है। जस्टिस ओका ने यह भी कहा कि मतदाता सूची में नाम शामिल करने के लिए इस्तेमाल होने वाले फॉर्म-6 और फॉर्म-8 में बदलाव करने का अधिकार निर्वाचन आयोग के बजाय केंद्र सरकार के पास है।
संशोधित फॉर्म-6 पर अब सुप्रीम कोर्ट सुनाए फैसला : जस्टिस ओका ने संशोधित फॉर्म-6 में जोड़ी गई घोषणा का मुद्दा भी उठाया। उन्होंने कहा कि पिछले मुकदमे के दौरान इस प्रावधान पर सुप्रीम कोर्ट में बहस नहीं हुई थी, इसलिए अदालत को इस पर अपनी राय रखने का अवसर नहीं मिला। अब सुप्रीम कोर्ट इस मुद्दे पर फैसला सुना सकता है। उन्होंने कहा कि यदि सुप्रीम कोर्ट अपने पहले के निष्कर्षों पर दोबारा विचार नहीं भी करता, तब भी एसआईआर को लागू करने के तरीके को मनमाना होने के आधार पर चुनौती दी जा सकती है।
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