SC: 'गैंगस्टरों के मामलों के लिए विशेष अदालतें बनाने पर विचार करें'; मुफ्त रेवड़ी से जुड़ी याचिका खारिज
न्यायमूर्ति सूर्यकांत और जॉयमाल्य बागची की पीठ ने कहा कि जिस तरह से तेज सुनवाई के लिए फास्ट ट्रैक अदालतें बनी थीं, उसी तरह गैंगस्टरों के खिलाफ मुकदमे निपटाने के लिए भी अलग अदालतें होनी चाहिए। अदालत ने कहा कि आंकड़े बताते हैं कि ज्यादातर मामलों में आरोप तय ही नहीं हो पाते और गवाहों की गवाही में वर्षों लग जाते हैं। इससे आरोपी जमानत पर बाहर आ जाते हैं और फरार हो जाते हैं। जजों ने यह भी कहा कि गवाहों की सुरक्षा जरूरी है क्योंकि वे ही अभियोजन की आंख और कान होते हैं। सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र और दिल्ली सरकार से तीन हफ्तों में इस विषय पर ठोस प्रस्ताव दाखिल करने को कहा है।
मुफ्त योजनाओं पर असर जानने की याचिका खारिज
सुप्रीम कोर्ट ने उस याचिका को खारिज कर दिया जिसमें मुफ्त योजनाओं और नकद लाभ के आर्थिक प्रभाव का अध्ययन कराने की मांग की गई थी। मुख्य न्यायाधीश की पीठ ने कहा कि वे इस याचिका को सुनने के इच्छुक नहीं हैं। याचिका में मांग थी कि मुफ्त योजनाएं शुरू करने से पहले विशेषज्ञों से आकलन करवाया जाए और रिजर्व बैंक, नीति आयोग तथा राज्य की योजना संस्थाओं से मंजूरी ली जाए ताकि आर्थिक संतुलन बना रहे और जरूरी सेवाओं पर असर न पड़े।
जजों की नियुक्ति में देरी पर सुप्रीम कोर्ट सख्त
सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार की तरफ से कॉलेजियम की सिफारिशों के बावजूद जजों की नियुक्ति में देरी को लेकर दाखिल याचिकाओं पर दो हफ्ते बाद सुनवाई करने का फैसला किया है। मुख्य न्यायाधीश ने वरिष्ठ अधिवक्ता अरविंद दातार और प्रशांत भूषण की अपील पर यह सहमति दी। अधिवक्ताओं ने कहा कि कुछ नाम 2019, 2020 और 2022 में दोबारा सिफारिश के बावजूद अभी तक मंजूर नहीं हुए हैं, जिससे उम्मीदवारों की रुचि और वरिष्ठता दोनों प्रभावित हो रही है। दातार ने बताया कि दिल्ली और मुंबई के कुछ वकीलों ने अंततः नाम वापस ले लिए। प्रशांत भूषण ने एक महिला वकील का उदाहरण दिया जो नेशनल लॉ स्कूल की टॉपर थीं, लेकिन उनका नाम बार-बार अटका। यह मामला उस बड़ी बहस का हिस्सा है जिसमें केंद्र और न्यायपालिका के बीच कॉलेजियम प्रणाली को लेकर मतभेद जारी हैं।
सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को असम के गोलपारा जिले में हुई तोड़फोड़ और निष्कासन की कार्रवाई को लेकर दायर याचिका पर सुनवाई के लिए सहमति दी है। याचिकाकर्ताओं ने दावा किया है कि जून महीने में की गई इस कार्रवाई में 667 परिवार प्रभावित हुए हैं और यह सुप्रीम कोर्ट के पूर्व निर्देशों का उल्लंघन है। मुख्य न्यायाधीश बी. आर. गवई और न्यायमूर्ति के. विनोद चंद्रन की पीठ ने असम के मुख्य सचिव और अन्य संबंधित अधिकारियों को नोटिस जारी कर दो हफ्ते में जवाब मांगा है। याचिका में कहा गया कि प्रभावितों को न तो पर्याप्त नोटिस दिया गया, न ही व्यक्तिगत सुनवाई का मौका मिला। वरिष्ठ वकील संजय हेगड़े ने कोर्ट को बताया कि दो दिन में ही नोटिस देकर तोड़फोड़ शुरू कर दी गई, जबकि वहां के लोग 60-70 वर्षों से रह रहे हैं। याचिका में अंतरिम राहत, पुनर्वास और मुआवजे की भी मांग की गई है।
सुप्रीम कोर्ट ने झारखंड के डीजीपी अनुराग गुप्ता की नियुक्ति को चुनौती देने वाली याचिका पर सुनवाई के लिए सहमति दे दी है। मुख्य न्यायाधीश की बेंच ने कहा कि यह मामला 30 या 31 जुलाई को सूचीबद्ध किया जाएगा। वरिष्ठ अधिवक्ता अंजना प्रकाश ने दलील दी कि राज्य सरकार ने नियुक्ति प्रक्रिया में शीर्ष अदालत के 2006 के फैसले और दिशा-निर्देशों की अनदेखी की है। याचिकाकर्ता ने गुप्ता की सेवा विस्तार को भी असंवैधानिक बताया, जिसे केंद्र सरकार ने पहले ही खारिज कर दिया है। अदालत ने पहले भी इस मामले में राज्य सरकार और गुप्ता से जवाब मांगा था।
सुप्रीम कोर्ट ने 1984 की भोपाल गैस त्रासदी से जुड़े एक मामले में याचिका खारिज कर दी, जिसमें दावा किया गया था कि कई गंभीर रूप से घायल पीड़ितों को गलत श्रेणी में डालकर कम मुआवजा दिया गया। मुख्य न्यायाधीश की पीठ ने याचिकाकर्ताओं को संबंधित हाईकोर्ट में जाने की अनुमति दी है। कोर्ट ने याचिका के तथ्यों पर कोई टिप्पणी नहीं की। याचिका में मांग की गई थी कि केंद्र और मध्यप्रदेश सरकार उन पीड़ितों की दोबारा पहचान करे जिन्हें 'अस्थायी विकलांगता' या 'हल्की चोट' मानकर कम मुआवजा दिया गया। याचिकाकर्ताओं ने कहा कि कई लोगों को किडनी फेल और कैंसर जैसी गंभीर बीमारियां हुईं, फिर भी उन्हें मामूली रूप से घायल माना गया।
हरिद्वार की प्रसिद्ध मां चंडी देवी मंदिर के सेवायत (मुख्य पुजारी) महंत भवानी नंदन गिरी ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की है। इसमें उन्होंने उत्तराखंड हाईकोर्ट के उस आदेश को चुनौती दी है जिसमें मंदिर की देखरेख के लिए बद्री-केदार मंदिर समिति को रिसीवर नियुक्त करने का निर्देश दिया गया था। याचिकाकर्ता का कहना है कि 2012 से मंदिर की निगरानी के लिए जिलाधिकारी और एसएसपी की समिति पहले से बनी हुई है और कभी किसी गड़बड़ी की शिकायत नहीं आई। हाईकोर्ट ने यह आदेश एक जमानत याचिका की सुनवाई के दौरान दिया था, जबकि सेवायत पक्ष को सुना भी नहीं गया। उन्होंने इसे प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का उल्लंघन बताया है। मंदिर की स्थापना 8वीं सदी में आदि शंकराचार्य ने की थी और तब से याचिकाकर्ता के परिवार द्वारा इसका संचालन हो रहा है।
सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली-नोएडा डायरेक्ट (डीएनडी) फ्लाईवे से जुड़ी एक याचिका में नोएडा टोल ब्रिज कंपनी लिमिटेड (एनटीबीसीएल) के पूर्व वरिष्ठ अधिकारी प्रदीप पुरी के खिलाफ की गई टिप्पणियों को हटाने पर सहमति जताई है। न्यायमूर्ति सूर्यकांत और उज्ज्वल भुइयां की पीठ ने कहा कि चूंकि पुरी अब रिटायर हो चुके हैं और टिप्पणियां सीधे नहीं की गई थीं, इसलिए उन्हें अनावश्यक परेशानी नहीं होनी चाहिए। अदालत ने साफ किया कि फैसले की मूल बातों में कोई बदलाव नहीं होगा, सिर्फ व्यक्तिगत टिप्पणियों को हटाया जाएगा।
इससे पहले कोर्ट ने 20 दिसंबर 2024 को फैसला दिया था कि डीएनडी फ्लाईवे टोल-फ्री रहेगा। कोर्ट ने कहा था कि कंपनी ने निर्माण लागत और मुनाफा दोनों वसूल लिए हैं, इसलिए अब टोल वसूलने का कोई औचित्य नहीं है। अदालत ने यह भी कहा था कि सरकारी संस्थाएं जनता की भलाई के बजाय निजी कंपनियों को फायदा पहुंचा रही थीं, जो जनहित के खिलाफ है। यह फैसला लाखों दिल्ली-नोएडा यात्रियों के लिए बड़ी राहत साबित हुआ था।
वाहनों में छह एयरबैग अनिवार्य करने संबंधी याचिका खारिज
सुप्रीम कोर्ट ने यात्री वाहनों में छह एयरबैग अनिवार्य करने की मांग वाली याचिका खारिज कर दी। शीर्ष अदालत ने कहा कि यह मामला पूरी तरह से नीतिगत दायरे के तहत आता है। nसीजेआई बीआर गवई और जस्टिस के विनोद चंद्रन की पीठ ने याचिकाकर्ता से कहा कि वह सरकार के समक्ष आवेदन दे सकता है। याचिकाकर्ता ने कहा कि वह 17 मई को सरकार को आवेदन दे चुके हैं। पीठ ने कहा, रिट याचिका में की गई प्रार्थनाएं पूरी तरह से कार्यपालिका द्वारा बनाई जाने वाली नीति के दायरे में आती हैं। इसलिए हम इस याचिका पर विचार करने के इच्छुक नहीं हैं। पीठ ने कहा कि अगर याचिकाकर्ता ने केंद्र को कोई आवेदन दिया है, तो उसके गुण-दोष के आधार पर उसपर विचार किया जाएगा।
अदालत से आग्रह किया गया है कि छह एयरबैग अनिवार्य न करने को संविधान के अनुच्छेद 14 और 21 का उल्लंघन घोषित करे। सुरक्षा तंत्र को सुदृढ़ बनाने का निर्देश अफसरों को दे।
न्यायमित्र की सिफारिश...संबंध बनाने की वैध सहमति उम्र 18 से घटाकर 16 की जाए
न्यायमित्र और वरिष्ठ अधिवक्ता इंदिरा जयसिंह ने सहमति से शारीरिक संबंध बनाने के लिए वैधानिक उम्र 18 से घटाकर 16 वर्ष करने की सिफारिश शीर्ष अदालत से की है। जयसिंह ने यौन अपराधों से बच्चों का संरक्षण अधिनियम (पॉक्सो) 2012 व भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की धारा 375 के तहत 16 से 18 वर्ष के किशोर एवं किशोरियों की यौन गतिविधियों को अपराध मानने चुनौती दी है। अधिवक्ता ने चर्चित निपुण सक्सेना बनाम भारत सरकार मामले में बतौर न्यायमित्र शीर्ष अदालत की मदद की थी। उन्होंने तर्क दिया कि मौजूदा कानून किशोरों के बीच सहमति से बने रोमांटिक संबंधों को अपराध मानता है। उनके सांविधानिक अधिकारों का उल्लंघन करता है। कानूनी ढांचा किशोरों के बीच सहमति से बने संबंधों को दुर्व्यवहार मानते हुए उनकी स्वायत्तता और सहमति देने की क्षमता को नजरअंदाज करता है। जयसिंह ने 2017 व 2021 के बीच 16-18 वर्ष की आयु के नाबालिगों से जुड़े पॉक्सो के तहत मुकदमों में 180% की वृद्धि का हवाला दिया।
असम सरकार के अधिकारियों के खिलाफ अवमानना याचिका पर होगी सुनवाई
सुप्रीम कोर्ट ने बृहस्पतिवार को असम सरकार के अधिकारियों के खिलाफ अवमानना कार्रवाई की मांग वाली याचिका पर सुनवाई करने पर सहमति दे दी। याचिका में आरोप लगाया गया है कि गोलपाड़ा जिले में हुए विध्वंस अभियान के दौरान अधिकारियों ने शीर्ष अदालत के निर्देशों का उल्लंघन किया। मुख्य न्यायाधीश बीआर गवई और न्यायमूर्ति के विनोद चंद्रन की पीठ ने असम के मुख्य सचिव और अन्य अधिकारियों को नोटिस जारी कर दो सप्ताह के भीतर जवाब देने को कहा। याचिका में दावा किया गया है कि जून में हुए बड़े पैमाने पर विध्वंस और बेदखली अभियान में 667 से अधिक परिवार प्रभावित हुए। गोलपाड़ा जिले के आठ निवासियों की ओर से दायर याचिका में कहा गया कि बिना व्यक्तिगत सुनवाई या अपील का पर्याप्त मौका दिए विध्वंस कार्रवाई की गई।
याचिकाकर्ताओं के वकील संजय हेगड़े ने कहा कि मात्र दो दिन का नोटिस देकर विध्वंस कर दिया गया। मुख्य न्यायाधीश ने पूछा, आप हाईकोर्ट क्यों नहीं गए? इस पर हेगड़े ने जवाब दिया कि कई लोगों ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया, लेकिन वहां भी पुनर्वास का मुद्दा था। उन्होंने कहा, ये 667 गरीब परिवार हैं, जो 60-70 साल से उस जमीन पर रह रहे थे।
अतिक्रमण करने वालों को भी कानूनी प्रक्रिया का अधिकार है। याचिका में आरोप लगाया गया कि अधिकारियों ने विध्वंस अभियान में अल्पसंख्यक समुदाय को निशाना बनाया, जबकि बहुसंख्यक समुदाय के लोगों को छोड़ दिया गया।