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Hindi News ›   India News ›   Supreme Court Updates Arun Gawli Court news in hindi 28 Aug 2025

Supreme Court Updates:पार्षद हत्या मामले में सुप्रीम कोर्ट ने अरुण गवली को जमानत दी

Thu, 28 Aug 2025 03:30 PM IST
राहुल कुमार न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: राहुल कुमार Updated Thu, 28 Aug 2025 03:30 PM IST
सार

सुप्रीम कोर्ट ने हत्या के एक मामले में गैंगेस्टर से नेता बने अरुण गवाली को जमानत दी है। वह पिछले कई वर्षों से जेल में बंद थे।  सुप्रीम कोर्ट से जुड़ी अन्य महत्वपूर्ण खबरों को नीचे विस्तार से पढ़े।  
 

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Supreme Court Updates Arun Gawli Court news in hindi 28 Aug 2025
सुप्रीम कोर्ट अपडेट्स - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को गैंगस्टर से नेता बने अरुण गवली को जमानत दे दी। अरुण गवली मुंबई शिवसेना के कॉरपोरेटर कमलाकर जामसांडेकर की 2007 में हुई हत्या के मामले में उम्रकैद की सजा काट रहे हैं। अदालत ने उनकी लंबी कैद को देखते हुए यह राहत दी।

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न्यायमूर्ति एमएम सुंदरेश और एन कोटिश्वर सिंह की पीठ ने कहा कि गवली 17 साल तीन महीने से जेल में हैं और उनकी अपील अदालत के समक्ष लंबित है। पीठ ने यह भी उल्लेख किया कि गवली की उम्र 76 साल हो चुकी है। शीर्ष अदालत ने ट्रायल कोर्ट द्वारा तय शर्तों पर उन्हें जमानत दी है और मामले की अगली सुनवाई फरवरी 2026 के लिए तय की है।
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गवली ने बॉम्बे हाईकोर्ट के 9 दिसंबर 2019 के फैसले को चुनौती दी थी। जिसमें ट्रायल कोर्ट की ओर से सुनाई गई उम्रकैद की सजा को बरकरार रखा गया था। अरुण गवली  2004 से 2009 तक मुंबई के चिंचपोकली विधानसभा सीट से विधायक भी रहे। गवली और अन्य आरोपियों को 2006 में गिरफ्तार किया गया था और जामसांडेकर की हत्या के लिए उन पर मुकदमा चला था। अगस्त 2012 में मुंबई की सेशन कोर्ट ने उन्हें उम्रकैद की सजा सुनाई थी और 17 लाख रुपये का जुर्माना भी लगाया था।

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भारत में उत्कृष्ट प्रतिभा है, फुटबॉल की बेहतरी के लिए किए जाएंगे अतिरिक्त प्रयास: सुप्रीम कोर्ट

 सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि भारत में उत्कृष्ट प्रतिभा है और वह खेल की बेहतरी के लिए अखिल भारतीय फुटबॉल महासंघ (एआईएफएफ) के संविधान मसौदे को अंतिम रूप देने के लिए अतिरिक्त प्रयास करेगा। शीर्ष अदालत एआईएफएफ और फुटबॉल स्पोर्ट्स डेवलपमेंट लिमिटेड (एफएसडीएल) के बीच विवाद के मामले में सुनवाई कर रही थी।

जस्टिस पीएस नरसिम्हा और जस्टिस जॉयमाल्या बागची की पीठ ने कहा, हम चाहते हैं कि चीजें आगे बढ़ें। यह एक असाधारण पल है। हम सभी सहयोग कर रहे हैं। भारत में उत्कृष्ट प्रतिभा है। हम सभी मिलकर काम करेंगे। हम अतिरिक्त प्रयास करेंगे और यह सुनिश्चित करेंगे कि चीजें व्यवस्थित हों। कुछ कोच कह रहे थे कि भारत में युवा स्तर पर प्रतिभा दुनिया में कहीं भी उपलब्ध प्रतिभा के बराबर है। हम कुछ भी नहीं रोक सकते। सुनवाई के दौरान एआईएफएफ ने पीठ को सर्वोत्तम वैश्विक प्रथाओं के अनुरूप इंडियन सुपर लीग (आईएसएल) के संचालन के लिए एक वाणिज्यिक भागीदार के चयन हेतु खुली, प्रतिस्पर्धी और पारदर्शी निविदा प्रक्रिया आयोजित करने की जानकारी दी। सुप्रीम कोर्ट 1 सितंबर को एआईएफएफ के प्रस्ताव पर विभिन्न पक्षों की दलीलें सुनेगा।

न्यायमित्र और वरिष्ठ अधिवक्ता गोपाल शंकरनारायणन ने फीफा की ओर से एआईएफएफ को भेजे गए एक पत्र का हवाला दिया, जिसमें 30 अक्तूबर की समय सीमा तय की गई है ताकि व्यवस्था को दुरुस्त किया जा सके। शंकरनारायणन ने कहा, फीफा देश की सुप्रीम कोर्ट को शर्तें नहीं थोप सकता। पीठ ने कहा कि फीफा का पत्र अप्रासंगिक है और इस पर कोई ध्यान देने से इन्कार कर दिया। सुप्रीम कोर्ट ने इससे पहले एआईएफएफ और एफएसडीएल को मास्टर राइट्स समझौते के नवीनीकरण से संबंधित मुद्दे को सुलझाने के लिए कहा था।
 

सुप्रीम कोर्ट ने असम एफआईआर में अभिसार शर्मा को गिरफ्तारी से संरक्षण दिया

सुप्रीम कोर्ट ने बृहस्पतिवार को यूट्यूबर पत्रकार अभिसार शर्मा द्वारा असम पुलिस द्वारा दर्ज की गई एफआईआर की वैधता को चुनौती देने वाली याचिका पर विचार करने से इनकार कर दिया। शर्मा ने एक निजी कंपनी को 3000 बीघा जमीन आवंटित करने के मामले में राज्य सरकार की आलोचना की थी। हालांकि जस्टिस एमएम सुंदरेश और जस्टिस एन कोटिश्वर सिंह की पीठ ने उन्हें गुवाहाटी हाईकोर्ट जाने के लिए चार हफ़्ते की अंतरिम गिरफ्तारी से छूट दे दी। अदालत ने राजद्रोह अधिनियम की धारा 152 के तहत राजद्रोह के प्रावधान की वैधता को चुनौती देने वाली उनकी याचिका को पहले से लंबित एक याचिका के साथ विचार के लिए संलग्न कर दिया।

शीर्ष अदालत ने बीएनएस की धारा 152 को चुनौती देने वाली उनकी याचिका पर केंद्र सरकार को नोटिस भी जारी किया। याचिकाकर्ता की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने कहा कि धारा 152 का इस्तेमाल एक व्यापक प्रावधान के रूप में किया जा रहा है। हालांकि, अदालत ने उनसे एफआईआर को हाईकोर्ट में चुनौती देने के लिए कहा। पीठ ने कहा, "आप हाईकोर्ट की अवहेलना क्यों कर रहे हैं? हम आपको सुरक्षा देंगे, आप हाईकोर्ट जाएं। सिर्फ़ इसलिए कि आप पत्रकार हैं, हम आपकी बात नहीं मान सकते।" सिद्धार्थ वरदराजन और करण थापर के मामलों का हवाला देते हुए उन्होंने कहा कि जैसे न्यायालय ने पहले अन्य पत्रकारों को सुरक्षा प्रदान की थी, वैसे ही इसमें कुछ एकरूपता होनी चाहिए। सिब्बल को डर था कि पुलिस एक और एफ़आईआर दर्ज कर सकती है।

इस पर पीठ ने कहा, "अगर हम भी विचार करें तो भी वे एक और एफ़आईआर दर्ज कर सकते हैं।" इसके बाद सिब्बल ने कहा, "समाज इस न्यायालय का सम्मान करता है। कृपया ऐसा न करें। ऐसा नहीं होना चाहिए। हम क्या संदेश दे रहे हैं?" हालांकि न्यायालय ने कहा कि वह एफ़आईआर दर्ज करने के पक्ष में नहीं है। 18 अगस्त, 2025 को, याचिकाकर्ता ने कहा कि उन्होंने अपने यूट्यूब चैनल पर एक वीडियो पोस्ट किया था जिसका शीर्षक था, "जब जज ने भाजपा सरकार को फटकार लगाई! अडानी को हजारों बीघा जमीन क्यों?" उन्होंने कहा कि उन्होंने महाबल सीमेंट्स जैसी एक निजी संस्था को 3000 बीघा आदिवासी भूमि आवंटित करने की बुद्धिमत्ता पर सवाल उठाया और आदिवासी भूमि अधिकारों, पर्यावरण संबंधी चिंताओं और लोकतांत्रिक जवाबदेही को प्रभावित करने वाले सरकारी फैसलों को उजागर किया। 

21 अगस्त, 2025 को यूट्यूब वीडियो के खिलाफ एक निजी शिकायत के आधार पर याचिकाकर्ता के खिलाफ बीएनएस की धारा 152, 196 और 197 के तहत गुवाहाटी जिले के पुलिस थाना अपराध शाखा में प्राथमिकी दर्ज की गई। उनकी याचिका में दावा किया गया कि उन्होंने पहले से ही सार्वजनिक डोमेन में मौजूद राजनीतिक भाषणों की रिपोर्टिंग और आलोचनात्मक टिप्पणी करके केवल अभिव्यक्ति और प्रेस की स्वतंत्रता के अपने मौलिक अधिकार का प्रयोग किया। उनकी याचिका में दावा किया गया कि वर्तमान प्राथमिकी, यदि प्रत्यक्ष रूप से देखी जाए, तो किसी अपराध का खुलासा नहीं करती है और यह पत्रकारिता की अभिव्यक्ति को निशाना बनाने के लिए आपराधिक कानून का स्पष्ट दुरुपयोग है।

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