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Supreme Court: मेहुल चोकसी के खिलाफ धोखाधड़ी का मामला बहाल; मध्यस्थता समझौता साइन नहीं होने पर भी बाध्यकारी
Wed, 06 Dec 2023 09:07 PM IST
ज्योति भास्कर
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
Published by: ज्योति भास्कर
Updated Wed, 06 Dec 2023 09:07 PM IST
सार
सुप्रीम कोर्ट ने मध्यस्थता समझौते को लेकर अहम टिप्पणी की है। अदालत ने कहा है कि ऐसी कंपनियां या फर्म जो हस्ताक्षर नहीं करते, उन पर भी कंपनियों के सिद्धांत (companies' doctrine) के तहत होने वाले समझौते बाध्यकारी हो सकते हैं।
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सुप्रीम कोर्ट
- फोटो : ANI
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विस्तार
सुप्रीम कोर्ट ने कंपनी के सिद्धांत और मध्यस्थता समझौते पर अहम टिप्पणी की है। देश की शीर्ष अदालत ने कहा कि साइन न करने वाले फर्म पर भी मध्यस्थता समझौते बाध्यकारी हो सकते हैं। चीफ जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ की अध्यक्षता वाली पांच जजों की संविधान पीठ ने कहा, 'कई पक्षों और कई समझौतों से जुड़े जटिल लेनदेन के संदर्भ में मध्यस्थता समझौता (Arbitration Agreements) भारतीय मध्यस्थता न्यायशास्त्र में बरकरार रखा जाना चाहिए।' अदालत ने यह आदेश कॉक्स एंड किंग्स लिमिटेड की तरफ से दायर याचिका पर पारित किया।
बुधवार को पारित एक महत्वपूर्ण फैसले में उच्चतम न्यायालय ने कहा, मध्यस्थता समझौता 'कंपनियों के समूह सिद्धांत' (Companies Doctrine) के तहत समझौता गैर-हस्ताक्षरकर्ता फर्म यानी ऐसी इकाई जिसने समझौते पर साइन नहीं किया है, उन पर भी बाध्यकारी हो सकता है। अदालत ने साफ किया कि कंपनियों के सिद्धांत के अनुसार, एक फर्म जो दो पक्षों के बीच मध्यस्थता समझौते पर हस्ताक्षरकर्ता नहीं है, उसे बिना साइन के भी सहमत और बाध्य माना जा सकता है। हालांकि, समझौता बाध्यकारी तभी होगा जब साइन न करने वाली फर्म या कंपनी, कंपनियों के उसी समूह का हिस्सा हैं जिन्होंने मध्यस्थता समझौते पर साइन के बाद सहमति जताई है।
सीजेआई के अलावा, जस्टिस हृषिकेश रॉय, पीएस नरसिम्हा, जेबी पारदीवाला, मनोज मिश्रा और जस्टिस नरसिम्हा भी संविधान पीठ में शामिल हैं। सीजेआई के अलावा जस्टिस नरसिम्हा ने भी सहमति वाला फैसला लिखा। खबर के अनुसार, संविधान पीठ ने मध्यस्थता समझौते से जुड़े विवाद पर सर्वसम्मति से फैसला सुनाया। पीठ ने कहा, कई पक्षों और कई समझौतों से जुड़े जटिल लेनदेन के संदर्भ में मध्यस्थता समझौता बेहद कारगर है। करार में शामिल होने वाली पार्टियों के इरादे को निर्धारित करने में इसकी उपयोगिता अहम है। इसे देखते हुए 'कंपनियों के समूह' वाले सिद्धांत को भारतीय मध्यस्थता न्यायशास्त्र में बरकरार रखा जाना चाहिए।
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शीर्ष अदालत का विस्तृत फैसला सामने नहीं आया है, लेकिन फैसले के ऑपरेटिव हिस्से में कहा गया है कि जो लोग मध्यस्थता समझौते पर हस्ताक्षरकर्ता हैं वे ही करार से बंधे हों, यह जरूरी नहीं है। अदालत ने कानूनी पहलू साफ किया और कहा, 'लिखित मध्यस्थता समझौते की जरूरत का मतलब यह नहीं है कि करार पर साइन न करने वाले समझौते के लिए बाध्य नहीं होंगे। अदालत के मुताबिक करार के लिए हस्ताक्षरकर्ताओं और गैर-हस्ताक्षरकर्ताओं के बीच एक परिभाषित कानूनी संबंध होने चाहिए। इसके अलावा समझौता करने वाली पार्टियों का इरादा नैतिक रूप से अधिनियम के तहत समझौता करने का हो।
गौरतलब है कि मई 2022 में सुप्रीम कोर्ट के तत्कालीन चीफ जस्टिस एनवी रमना की अध्यक्षता वाली तीन जजों की पीठ ने इस मामले को पांच जजों की पीठ के पास भेजा था। उन्होंने कहा था कि कंपनियों के समूह के सिद्धांत (Companies Doctrine) के कुछ कानूनी पहलुओं पर दोबारा विचार करने की जरूरत है। संविधान पीठ ने इस मामले में कुछ कानूनी पहलुओं और सवालों पर विचार किया। इनमें "क्या कंपनियों के समूह के सिद्धांत को मध्यस्थता अधिनियम की धारा 8 के तहत माना जाना चाहिए या नहीं? मूल सवाल था। अदालत को यह भी विचार करना था कि क्या मध्यस्थता कानून की धारा आठ किसी भी वैधानिक प्रावधान से स्वतंत्र भारतीय न्यायशास्त्र में बरकरार रखा जा सकता है?
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बुधवार को पारित एक महत्वपूर्ण फैसले में उच्चतम न्यायालय ने कहा, मध्यस्थता समझौता 'कंपनियों के समूह सिद्धांत' (Companies Doctrine) के तहत समझौता गैर-हस्ताक्षरकर्ता फर्म यानी ऐसी इकाई जिसने समझौते पर साइन नहीं किया है, उन पर भी बाध्यकारी हो सकता है। अदालत ने साफ किया कि कंपनियों के सिद्धांत के अनुसार, एक फर्म जो दो पक्षों के बीच मध्यस्थता समझौते पर हस्ताक्षरकर्ता नहीं है, उसे बिना साइन के भी सहमत और बाध्य माना जा सकता है। हालांकि, समझौता बाध्यकारी तभी होगा जब साइन न करने वाली फर्म या कंपनी, कंपनियों के उसी समूह का हिस्सा हैं जिन्होंने मध्यस्थता समझौते पर साइन के बाद सहमति जताई है।
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सीजेआई के अलावा, जस्टिस हृषिकेश रॉय, पीएस नरसिम्हा, जेबी पारदीवाला, मनोज मिश्रा और जस्टिस नरसिम्हा भी संविधान पीठ में शामिल हैं। सीजेआई के अलावा जस्टिस नरसिम्हा ने भी सहमति वाला फैसला लिखा। खबर के अनुसार, संविधान पीठ ने मध्यस्थता समझौते से जुड़े विवाद पर सर्वसम्मति से फैसला सुनाया। पीठ ने कहा, कई पक्षों और कई समझौतों से जुड़े जटिल लेनदेन के संदर्भ में मध्यस्थता समझौता बेहद कारगर है। करार में शामिल होने वाली पार्टियों के इरादे को निर्धारित करने में इसकी उपयोगिता अहम है। इसे देखते हुए 'कंपनियों के समूह' वाले सिद्धांत को भारतीय मध्यस्थता न्यायशास्त्र में बरकरार रखा जाना चाहिए।
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शीर्ष अदालत का विस्तृत फैसला सामने नहीं आया है, लेकिन फैसले के ऑपरेटिव हिस्से में कहा गया है कि जो लोग मध्यस्थता समझौते पर हस्ताक्षरकर्ता हैं वे ही करार से बंधे हों, यह जरूरी नहीं है। अदालत ने कानूनी पहलू साफ किया और कहा, 'लिखित मध्यस्थता समझौते की जरूरत का मतलब यह नहीं है कि करार पर साइन न करने वाले समझौते के लिए बाध्य नहीं होंगे। अदालत के मुताबिक करार के लिए हस्ताक्षरकर्ताओं और गैर-हस्ताक्षरकर्ताओं के बीच एक परिभाषित कानूनी संबंध होने चाहिए। इसके अलावा समझौता करने वाली पार्टियों का इरादा नैतिक रूप से अधिनियम के तहत समझौता करने का हो।
गौरतलब है कि मई 2022 में सुप्रीम कोर्ट के तत्कालीन चीफ जस्टिस एनवी रमना की अध्यक्षता वाली तीन जजों की पीठ ने इस मामले को पांच जजों की पीठ के पास भेजा था। उन्होंने कहा था कि कंपनियों के समूह के सिद्धांत (Companies Doctrine) के कुछ कानूनी पहलुओं पर दोबारा विचार करने की जरूरत है। संविधान पीठ ने इस मामले में कुछ कानूनी पहलुओं और सवालों पर विचार किया। इनमें "क्या कंपनियों के समूह के सिद्धांत को मध्यस्थता अधिनियम की धारा 8 के तहत माना जाना चाहिए या नहीं? मूल सवाल था। अदालत को यह भी विचार करना था कि क्या मध्यस्थता कानून की धारा आठ किसी भी वैधानिक प्रावधान से स्वतंत्र भारतीय न्यायशास्त्र में बरकरार रखा जा सकता है?
धोखाधड़ी मामला: भगोड़े कारोबारी मेहुल चोकसी और पत्नी के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट ने केस बहाल किया
मेहुल चोकसी के खिलाफ गुजरात पुलिस के पास दर्ज धोखाधड़ी का मामला बहाल
- फोटो : SELF
सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद भगोड़े कारोबारी मेहुल चोकसी और उसकी पत्नी को झटका लगा है। उच्चतम न्यायालय ने गुजरात पुलिस के पास दर्ज धोखाधड़ी का एक मामला बहाल करने का फैसला सुनाया है। सुप्रीम कोर्ट में न्यायमूर्ति संजीव खन्ना और जस्टिस एसवीएन भट्टी की पीठ ने 29 नवंबर को आदेश पारित किया। अदालत ने अपने फैसले में उच्च न्यायालय के साढ़े छह साल पुराने आदेश को निरस्त कर दिया। 5 मई, 2017 के हाईकोर्ट ऑर्डर को रद्द करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने गुजरात पुलिस को अपनी जांच आगे बढ़ाने को कहा।
मेहुल चोकसी अपने भतीजे नीरव मोदी के साथ पंजाब नेशनल बैंक (पीएनबी) घोटाला मामले में भी आरोपी हैं। कथित तौर पर बैंक से 14,000 करोड़ रुपये से अधिक की धोखाधड़ी मामले में आरोपी चोकसी के खिलाफ दिग्विजयसिंह हिम्मतसिंह जाडेजा ने 2015 में गुजरात में प्राथमिकी दर्ज कराई थी। शिकायतकर्ता का आरोप है कि चोकसी और उनकी पत्नी ने 30 करोड़ रुपये के 24 कैरेट शुद्ध सोने की छड़ों से जुड़े व्यापारिक लेनदेन के संबंध में जालसाजी और धोखाधड़ी की है। अदालत ने साफ किया, मामला बहाल करने के आदेश में शीर्ष अदालत की टिप्पणियों को मुकदमे की योग्यता पर टिप्पणी नहीं माना जाएगा। मामले की जांच किसी भी निष्कर्ष या टिप्पणी से प्रभावित हुए बिना जारी रहेगी।
मेहुल चोकसी अपने भतीजे नीरव मोदी के साथ पंजाब नेशनल बैंक (पीएनबी) घोटाला मामले में भी आरोपी हैं। कथित तौर पर बैंक से 14,000 करोड़ रुपये से अधिक की धोखाधड़ी मामले में आरोपी चोकसी के खिलाफ दिग्विजयसिंह हिम्मतसिंह जाडेजा ने 2015 में गुजरात में प्राथमिकी दर्ज कराई थी। शिकायतकर्ता का आरोप है कि चोकसी और उनकी पत्नी ने 30 करोड़ रुपये के 24 कैरेट शुद्ध सोने की छड़ों से जुड़े व्यापारिक लेनदेन के संबंध में जालसाजी और धोखाधड़ी की है। अदालत ने साफ किया, मामला बहाल करने के आदेश में शीर्ष अदालत की टिप्पणियों को मुकदमे की योग्यता पर टिप्पणी नहीं माना जाएगा। मामले की जांच किसी भी निष्कर्ष या टिप्पणी से प्रभावित हुए बिना जारी रहेगी।