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Supreme Court: ऑनलाइन अपराधों पर सुप्रीम कोर्ट सख्त; केंद्र को दिए जरूरी कदम उठाने के निर्देश

Tue, 11 Aug 2026 10:56 PM IST
प्रशांत तिवारी आईएएनएस, नई दिल्ली
आईएएनएस, नई दिल्ली Published by: प्रशांत तिवारी Updated Tue, 11 Aug 2026 10:56 PM IST
सार

सुप्रीम कोर्ट ने डिजिटल खतरों से निपटने के लिए दायर PIL का निपटारा कर दिया। अदालत ने केंद्र सरकार और अन्य संबंधित हितधारकों से याचिकाकर्ता के 22 जून, 2026 के सुझाव पत्र में उठाए गए मुद्दों पर विचार कर आवश्यक सुधारात्मक कदम उठाने को कहा। 
 

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Supreme Court tough on online crimes directs Centre to take necessary steps
सुप्रीम कोर्ट - फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स

विस्तार

सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को एक जनहित याचिका (PIL) का निपटारा करते हुए केंद्र सरकार से ऑनलाइन होने वाले गंभीर नुकसान से निपटने के लिए याचिकाकर्ता की ओर से दिए गए सुझावों पर विचार करने और जरूरी सुधारात्मक कदम उठाने को कहा। याचिका में रेप और जान से मारने की धमकी, डॉक्सिंग (निजी जानकारी को सार्वजनिक करना), बच्चों की निजी जानकारी उजागर करना और बिना सहमति के निजी या डीपफेक कंटेंट के प्रसार जैसी घटनाओं से निपटने के लिए समय-सीमा वाली, URL-विशिष्ट और कानूनी या न्यायिक निगरानी के अधीन व्यवस्था बनाने की मांग की गई थी।

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सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र को दिए जरूरी कदम उठाने के निर्देश
भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्य कांत और जस्टिस जॉयमाल्य बागची तथा वी. मोहना की पीठ ने केंद्र सरकार को निर्देश दिया कि वह याचिकाकर्ता की ओर से अपने सुझाव पत्र में उठाए गए मुद्दों पर विचार करे और आवश्यक सुधारात्मक कदम उठाए। सुनवाई के दौरान वकील नरेंद्र कुमार गोस्वामी ने ऑनलाइन खतरों से निपटने की तत्काल जरूरत पर जोर दिया। उन्होंने अदालत के सामने सवाल रखा, 'मान लीजिए कि आज रात 9 बजे किसी महिला के घर का पता दुष्कर्म की धमकी के साथ पोस्ट किया जाता है। क्या इसे इस स्तर पर ऑनलाइन रहने दिया जाएगा?
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साइबर अपराध से जुड़े उपायों पर अदालत की टिप्पणी
CJI सूर्य कांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने कहा कि याचिकाकर्ता ने साइबर अपराध के विभिन्न तरीकों, प्रकारों और पहलुओं को 'बहुत अच्छे से उजागर किया है'। हालांकि, अदालत ने यह भी कहा कि इन खतरों का पता लगाने और उनसे बचाव के उपायों से जुड़े तकनीकी एवं व्यावहारिक मुद्दे डोमेन विशेषज्ञों यानी संबंधित विषय के विशेषज्ञों के विचार का विषय हैं।
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केंद्र के कई मंत्रालयों को भेजा गया था सुझाव पत्र
इसके बाद याचिकाकर्ता की ओर से कहा गया कि वह इस मुद्दे को पहले ही एक सुझाव पत्र (रिप्रेजेंटेशन) के माध्यम से केंद्र सरकार के सामने उठा चुके हैं। जब शीर्ष अदालत ने पूछा कि यह सुझाव पत्र किसे भेजा गया था, तो गोस्वामी ने बताया कि इसे केंद्र सरकार के इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय, गृह मंत्रालय तथा कानून और न्याय मंत्रालय को भेजा गया था।

गंभीर डिजिटल नुकसान से निपटने के लिए निगरानी व्यवस्था की मांग
अपने आदेश में CJI सूर्य कांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने कहा कि याचिका में गंभीर और गैर-कानूनी डिजिटल नुकसान से निपटने के लिए एक प्रभावी निगरानी व्यवस्था बनाने के निर्देश मांगे गए थे। इसमें शारीरिक हिंसा की घटनाएं या धमकियां, बच्चों के स्कूल के स्थान जैसी निजी जानकारी का खुलासा, बिना सहमति के निजी कंटेंट का प्रसार और हानिकारक डिजिटल प्रतिरूपण यानी किसी दूसरे व्यक्ति का रूप धारण कर गलत काम करना शामिल था।

22 जून को केंद्र के संबंधित मंत्रालयों को भेजा गया था पत्र
सुप्रीम कोर्ट ने दर्ज किया कि याचिकाकर्ता ने 22 जून, 2026 को केंद्र सरकार के संबंधित मंत्रालयों को भेजे गए एक सुझाव पत्र के माध्यम से इन मुद्दों को पहले ही उठाया था। CJI सूर्य कांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने याचिका का निपटारा करते हुए कहा, 'इस स्तर पर, हम प्रतिवादी अधिकारियों और अन्य सभी हितधारकों को निर्देश देते हैं कि वे याचिकाकर्ता के सुझाव पत्र में उठाए गए मुद्दों पर गौर करें और जरूरी सुधारात्मक कदम उठाएं।' 

डिजिटल नुकसान की रफ्तार और कानूनी कार्रवाई के बीच अंतर
PIL में कहा गया था कि डिजिटल नुकसान कुछ ही मिनटों में बड़े पैमाने पर फैल सकता है, जबकि पारंपरिक कानूनी उपायों में काफी समय लग सकता है। इससे ऑनलाइन नुकसान की रफ्तार और कानूनी कार्रवाई की गति के बीच एक गंभीर अंतर पैदा हो जाता है। याचिकाकर्ता का कहना था कि ऐसे मामलों में तेज और प्रभावी कार्रवाई के लिए एक विशेष व्यवस्था की जरूरत है।

शारीरिक और यौन हिंसा की धमकियों के लिए इमरजेंसी सिस्टम की मांग
याचिकाकर्ता ने खास तौर पर ऐसे मामलों के लिए एक इमरजेंसी सिस्टम बनाने की मांग की थी, जिनमें शारीरिक हिंसा, यौन हिंसा या मौत की स्पष्ट धमकियां शामिल हों। इसके अलावा डॉक्सिंग के जरिए घर का पता, संपर्क विवरण या लोकेशन की जानकारी बिना अनुमति सार्वजनिक करने के मामलों को भी इस व्यवस्था के दायरे में लाने की मांग की गई थी।

बच्चों की निजी जानकारी और पहचान उजागर करने पर भी चिंता
प्रस्तावित व्यवस्था में नाबालिग बच्चों की निजी जानकारी या उनकी पहचान उजागर करने वाली चीजों के अनधिकृत प्रसार को भी शामिल करने की मांग की गई थी। याचिकाकर्ता ने बच्चों से जुड़ी ऐसी संवेदनशील जानकारी के ऑनलाइन प्रसार को गंभीर डिजिटल नुकसान की श्रेणी में रखते हुए तत्काल कार्रवाई की जरूरत बताई।

AI और डीपफेक कंटेंट को लेकर भी विशेष व्यवस्था की मांग
याचिका में बिना सहमति के अंतरंग, मॉर्फ्ड, सिंथेटिक या AI से तैयार किए गए कंटेंट के प्रसार पर भी तत्काल कार्रवाई की मांग की गई थी। इसके साथ ही नुकसानदेह डीपफेक और डिजिटल रूप से हेरफेर किए गए ऐसे कंटेंट से निपटने की जरूरत बताई गई, जिसमें किसी व्यक्ति का रूप धारण करके उसे नुकसान पहुंचाया जाता है या उसके नाम और पहचान का गलत इस्तेमाल किया जाता है।


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सेंसरशिप नहीं, गंभीर गैर-कानूनी कंटेंट पर लक्षित कार्रवाई
याचिका में स्पष्ट किया गया था कि प्रस्तावित व्यवस्था का उद्देश्य सेंसरशिप लागू करना या हर तरह के कंटेंट को एक साथ हटाना नहीं है। इसका मकसद यह सुनिश्चित करना है कि गंभीर और गैर-कानूनी कंटेंट के खिलाफ URL-विशिष्ट और कंटेंट-विशिष्ट आधार पर कार्रवाई हो। याचिकाकर्ता ने ऐसी कार्रवाई को तर्कसंगत, समय-सीमा के भीतर और कानूनी या न्यायिक निगरानी एवं समीक्षा के अधीन रखने का प्रस्ताव दिया था।

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