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PAS: 'ठोस आधार के बिना माता-पिता पर नहीं लगा सकते बच्चों को भड़काने का आरोप' सुप्रीम कोर्ट ने बताया जटिल मसला

Fri, 10 May 2024 06:02 AM IST
शिव शरण शुक्ला राजीव सिन्हा
राजीव सिन्हा Published by: शिव शरण शुक्ला Updated Fri, 10 May 2024 06:02 AM IST
सार

जस्टिस विक्रमनाथ और जस्टिस सतीश शर्मा की पीठ ने कहा, किसी भी माता-पिता को बच्चों की कस्टडी के मामले में एक-दूसरे पर बस यूं ही अलगाव सिंड्रोम को बढ़ावा देने का आरोप नहीं लगा देना चाहिए। इस पेचीदा पहलू पर गंभीर विचार-विमर्श की आवश्यकता है।

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Supreme Court termed Parental Alienation Syndrome as a complex issue
सुप्रीम कोर्ट - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

सुप्रीम कोर्ट ने बच्चों की कस्टडी मामले में सुनवाई के दौरान माता-पिता के व्यवहार में हावी होने वाले अभिभावक अलगाव सिंड्रोम (पीएएस) को एक जटिल मसला करार दिया। कोर्ट ने कहा कि बिना ठोस आधार के माता-पिता का एक-दूसरे पर यह आरोप लगाना उचित नहीं कि दूसरा पक्ष बच्चे को दूर रहने के लिए भड़का रहा है। दरअसल, अलगाव सिंड्रोम उस स्थिति को कहते हैं जिसमें अलग हो चुके मां-बाप में से जिसे भी बच्चे की कस्टडी मिलती है वह पूर्व पत्नी या पति से दूर रहने के लिए बच्चे में असंतोष का भाव भड़काने लगते हैं। 

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जस्टिस विक्रमनाथ और जस्टिस सतीश शर्मा की पीठ ने कहा, किसी भी माता-पिता को बच्चों की कस्टडी के मामले में एक-दूसरे पर बस यूं ही अलगाव सिंड्रोम को बढ़ावा देने का आरोप नहीं लगा देना चाहिए। इस पेचीदा पहलू पर गंभीर विचार-विमर्श की आवश्यकता है। पीठ ने कहा, हमारी सुविचारित राय है कि अदालतों को माता-पिता के अलगाव के सिद्धांत को लागू करने के लिए अलगावपूर्ण व्यवहार के उदाहरणों की पहचान करने का प्रयास करना चाहिए, ताकि नाबालिग बच्चों की तरफ से बताई गई प्राथमिकता पर विवेकपूर्ण तरीके से फैसला किया जा सके। इसके साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली हाईकोर्ट के उस आदेश को रद्द कर दिया, जिसमें दो नाबालिग बच्चों की स्थायी कस्टडी सेवारत सैन्य अधिकारी पिता को देने के पारिवारिक अदालत के आदेश को पलटा गया था। इस मामले में बच्चों की मां ने आरोप लगाया था कि पिता ने दोनों बच्चों को उससे दूर रहने के लिए भड़काया है। 
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पीठ ने पाया कि हाईकोर्ट दोनों पक्षों के बीच संबंधों की पेचीदगियों को समझने में विफल रहा है। उक्त मामले में दो नाबालिग बच्चों 15 वर्षीय बेटी और 12 वर्षीय बेटे ने शीर्ष अदालत सहित सभी अदालतों के समक्ष यही कहा था कि उन्हें पिता के साथ रहना है। वे 2015 से अलग-अलग जगहों पर पोस्टिंग के दौरान पिता के साथ ही रह रहे थे।
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हाईकोर्ट का फैसला गैर-प्रमाणित धारणा पर आधारित
शीर्ष अदालत ने पाया कि हाईकोर्ट एक गैर-प्रमाणित धारणा पर आगे बढ़ा। मामले में अलगाव सिंड्रोम के किसी ठोस सबूत के अभाव के बावजूद हाईकोर्ट ने माना था कि मां के लगाए इन आरोपों को खारिज नहीं किया जा सकता कि पिता बच्चों को अपने साथ रखने के दौरान उन्हें मां से दूर रहने के लिए उकसाते हैं। शीर्ष कोर्ट ने कहा कि ये बच्चे बुद्धिमान, आत्मविश्वासी और अपना नफा-नुकसान समझने वाले हैं। वे अपने माता-पिता के बीच आरोप-प्रत्यारोप को लेकर सचेत हैं। पिता ने उनमें मां के प्रति पूर्वाग्रहपूर्ण भावनाओं को बढ़ावा नहीं दिया है।


पीएएस के नतीजों को पहचानना जरूरी
उक्त मामले में शिक्षिका मां का दावा था कि अलगाव की लंबी अवधि ने बच्चों की भावनाओं को प्रभावित किया है। उनके वकील ने इस मामले को अभिभावक अलगाव सिंड्रोम (पीएएस) का उदाहरण बताया था। हालांकि पीठ ने कहा, हमारी राय में पीएएस के नतीजों को पहचानना लंबे समय से तलाक और कस्टजी के मामलों में मुकदमेबाजी की वास्तविकताओं को रेखांकित करता है।  

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