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यूपी सरकारी कर्मचारी नियम: 'बड़ी सजा पर मौखिक साक्ष्य दर्ज करना अनिवार्य', SC ने HC के फैसले को किया रद्द

Mon, 18 Nov 2024 10:33 PM IST
राहुल कुमार न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: राहुल कुमार Updated Mon, 18 Nov 2024 10:33 PM IST
सार

Supreme Court: शीर्ष अदालत ने इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ के उस फैसले को खारिज कर दिया, जिसमें लोक सेवक के खिलाफ अनुशासनात्मक प्राधिकारी के आदेश की पुष्टि की गई थी।

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Supreme Court says UP Govt Servant Rules mandate recording of oral evidence in major penalty case
Supreme Court - फोटो : ANI

विस्तार

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि उत्तर प्रदेश सरकारी कर्मचारी (अनुशासन और अपील) नियम, 1999 के तहत जब जांच में बड़ी सजा देने का प्रस्ताव हो तो किसी लोक सेवक के खिलाफ आरोपों के समर्थन में मौखिक साक्ष्य दर्ज करना अनिवार्य है। 
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शीर्ष अदालत ने इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ के उस फैसले को खारिज कर दिया, जिसमें लोक सेवक के खिलाफ अनुशासनात्मक प्राधिकारी के आदेश की पुष्टि की गई थी। जस्टिस पीएस नरसिम्हा व जस्टिस संदीप मेहता की पीठ ने कहा कि पक्षकारों के बीच इस बात पर कोई विवाद नहीं है कि अधिकारी पर लगाया गया जुर्माना 1999 के नियमों के अनुसार बड़ा जुर्माना था। 
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कोर्ट ने कहा कि, हमारा मत है कि अपीलकर्ता (अधिकारी) के खिलाफ बड़े जुर्माने से दंडनीय आरोपों से संबंधित जांच कार्यवाही पूरी तरह से दोषपूर्ण और कानून की नजर में गैर-कानूनी थी। क्योंकि आरोपों के समर्थन में विभाग की ओर से कोई भी मौखिक साक्ष्य दर्ज नहीं किया गया था।
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पीठ ने कहा, 1999 के नियमों के नियम 7 (vii) में स्पष्ट रूप से प्रावधान है कि जहां कोई सरकारी कर्मचारी आरोप से इन्कार करता है, तो जांच अधिकारी आरोप पत्र में प्रस्तावित गवाह को बुलाएगा और आरोपित लोक सेवक की उपस्थिति में उनके मौखिक साक्ष्य को रिकॉर्ड करेगा। उसे ऐसे गवाह से जिरह करने का अवसर भी दिया जाएगा।

क्या है मामला
इस मामले में वाणिज्यिक कर के सहायक आयुक्त के पद पर तैनात अधिकारी को अनुशासनात्मक कार्यवाही का सामना करना पड़ा था। अनुशासनात्मक प्राधिकारी ने नवंबर 2014 में निंदा प्रविष्टि की सजा के साथ-साथ संचयी प्रभाव से दो ग्रेड वेतन वृद्धि रोकने का आदेश दिया था। 


अधिकारी ने जुर्माना लगाने के आदेश को राज्य लोक सेवा न्यायाधिकरण, लखनऊ में चुनौती दी थी, जिसने आदेश को रद्द कर दिया और निर्देश दिया कि वह सभी परिणामी लाभों का हकदार होगा। बाद में, अनुशासनात्मक प्राधिकारी ने न्यायाधिकरण के आदेश को हाईकोर्ट में चुनौती दी, जिसने 30 जुलाई, 2018 को इसे रद्द कर दिया।
 
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