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SC ने कहा- संसद में चर्चा के चलते किसी मुद्दे को नहीं छोड़ सकते हम

Fri, 27 Oct 2017 09:30 AM IST
अमर उजाला ब्यूरो / नई दिल्ली
अमर उजाला ब्यूरो / नई दिल्ली Updated Fri, 27 Oct 2017 09:30 AM IST
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supreme court says can not leave any matter due to pending in parliament
सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने बृहस्पतिवार को स्पष्ट कहा कि संसद में चर्चा जारी होने के कारण हम किसी मुद्दे से दूर नहीं हो सकते बल्कि यह सुनिश्चित करेंगे कि नागरिकों के अधिकार की रक्षा हो सके। चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा की अध्यक्षता वाली पांच सदस्यीय संविधान पीठ ने यह टिप्पणी उन मसले पर सुनवाई के दौरान की जिसमें यह तय किया जाना है कि अदालत को न्यायिक कार्यवाही के तहत संसदीय समिति में भेजी गई रिपोर्ट पर गौर करना चाहिए या नहीं। 

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शीर्ष अदालत ने अटॉर्नी जनरल केके वेणुगोपाल की दलील पर भी कड़ी प्रतिक्रिया जताई जिन्होंने संसदीय समिति की रिपोर्ट को न्यायिक जांच के दायरे में लाने का विरोध किया था। राष्ट्रीय राजमार्ग पर शराबबंदी का फैसला देने वाले न्यायाधीश न्यायमूर्ति डीवाई चंद्रचूड़ ने अटार्नी जनरल से कहा, ‘मुझे खेद है कि आपने मेरा जजमेंट नहीं पढ़ा।
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पढ़ें: 31 मार्च 2018 तक जरूरी नहीं होगा आधार, सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में रखा पक्ष
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हम आपकी (केंद्र की) नीति लागू करते रहे है। केंद्र ने राजमार्गों से शराब की दुकानें हटाने के कई फैसले जारी किए हैं। भारत दुर्घटनाओं की राजधानी बनता जा रहा है। हमने शराब की दुकानें हटाने का आदेश आपकी नीति के मुताबिक ही दिया है। हमारा फैसला इस दिशा में स्पष्ट है। यदि संसदीय समिति की रिपोर्ट गर्भधारण खत्म करने को लेकर हो तो क्या हम अपनी आंखें बंद कर लें।’ 

supreme court says can not leave any matter due to pending in parliament
सु्प्रीम कोर्ट

दरअसल, याचिकाकर्ताओं ने 22 दिसंबर 2014 को संसदीय स्थायी समिति की जारी 81वीं रिपोर्ट का हवाला देते हुए सवाल उठाया था कि क्या न्यायिक कार्यवाही में समिति की रिपोर्ट पर भरोसा किया जा सकता है क्योंकि रिपोर्ट में कुछ फार्मा कंपनियों पर विवादास्पद ह्यूमन पैपिलोमा वायरस (एचपीवी) टीके के परीक्षण का आरोप लगाया गया है।

पीठ ने कहा ‘न्यायिक परीक्षण का अधिकार अप्रभावित रहता है। संसद में किसी मसले पर बहस चल रही है तो ऐसा नहीं है कि हमें उस मसले से दूर रहना चाहिए।’ पीठ ने कहा कि हम संविधान के अनुच्छेद-142 के तहत आयोग का गठन कर सकते हैं। न्याय के लिए रिपोर्ट तलब किया जा सकता है। जांच का आदेश दिया जा सकता है।

सुनवाई के दौरान अटॉर्नी जनरल केके वेणुगोपाल ने संसद और उसकी समितियों के विशेषाधिकार का हवाला देते हुए कहा कि संसदीय कमेटी की रिपोर्ट को न्यायिक परीक्षण के दायरे में नहीं लाया जा सकता। अधिकारों का विभाजन संविधान के मूल ढांचे में हैं। अटॉर्नी जनरल ने यह भी कहा कि भारतीय सुप्रीम कोर्ट विश्व में सबसे मजबूत है। उन्होंने कहा कि अनुच्छेद-21 के तहत करीब 30 मौलिक अधिकार बनाए गए हैं, जिनमें से कई को प्रभावी नहीं बनाया जा सकता।

इस पर न्यायमूर्ति डीवाई चंद्रचूड़ ने कहा कि इसे प्रभावी बनाया जा सकता है। उन्होंने पटाखों की बिक्री पर पाबंदी के आदेश का जिक्र करते हुए कहा कि इस आदेश की वजह से हम दिवाली के बाद सांस ले पा रहे हैं। उन्होंने कहा कि स्वच्छ पर्यावरण का अधिकार भी मौलिक अधिकार है। 

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