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Supreme Court: 'सजा के बाद आरोपी के तौर पर नहीं कर सकते समन'; सुप्रीम कोर्ट ने खारिज किया इलाहाबाद HC का आदेश
Tue, 17 Sep 2024 12:48 AM IST
दीपक कुमार शर्मा
अमर उजाला ब्यूरो, नई दिल्ली
अमर उजाला ब्यूरो, नई दिल्ली
Published by: दीपक कुमार शर्मा
Updated Tue, 17 Sep 2024 12:48 AM IST
सार
सुखपाल सिंह खैरा बनाम पंजाब राज्य (2023) का हवाला देते हुए उनके वकील ने कहा कि मामले में पहले दोषसिद्धि और सजा का आदेश दर्ज किया गया था और उसके बाद ही सीआरपीसी की धारा 319 के तहत आदेश पारित किया गया था, जो कानून में टिकने योग्य नहीं होगा।
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सुप्रीम कोर्ट
- फोटो : संवाद न्यूज एजेंसी
विस्तार
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि किसी आपराधिक मामले में कुछ आरोपियों को सजा सुनाए जाने और कुछ अन्य को बरी किए जाने के बाद किसी व्यक्ति के खिलाफ आरोपी के तौर पर समन जारी नहीं किया जा सकता। जस्टिस बीआर गवई व जस्टिस केवी विश्वनाथन की पीठ ने देवेंद्र कुमार पाल की अपील स्वीकार कर ली और इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले को खारिज कर दिया। साथ ही सीआरपीसी की धारा 319 के तहत अपीलकर्ता को समन जारी करने के आदेश को रद्द कर दिया।
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अपीलकर्ता ने दलील दी कि हत्या के मामले में कार्यवाही के बाद ट्रायल जज ने कुछ आरोपियों को दोषी ठहराया और अन्य को बरी कर दिया। ट्रायल जज ने कहा कि वर्तमान अपीलकर्ता पर भी मुकदमा चलाया जाना चाहिए। 21 मार्च, 2012 के आदेश में ट्रायल जज ने पहले हिस्से में उन आरोपियों के संबंध में दोषसिद्धि का आदेश दिया जिन्हें उसने दोषी पाया था और शेष आरोपियों को दोषमुक्त कर दिया। लंच सत्र के बाद, ट्रायल जज ने सबसे पहले उन अभियुक्तों के लिए सजा का आदेश सुनाया जिन्हें दोषी ठहराया गया था। इसके बाद, ट्रायल जज ने दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 की धारा 319 के तहत शक्तियों का प्रयोग करके वर्तमान अपीलकर्ता पाल को ट्रायल के लिए बुलाने का आदेश दिया।
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सुखपाल सिंह खैरा बनाम पंजाब राज्य (2023) का हवाला देते हुए उनके वकील ने कहा कि मामले में पहले दोषसिद्धि और सजा का आदेश दर्ज किया गया था और उसके बाद ही सीआरपीसी की धारा 319 के तहत आदेश पारित किया गया था, जो कानून में टिकने योग्य नहीं होगा। हालांकि, राज्य सरकार के वकील ने याचिका का विरोध करते हुए कहा था कि सुखपाल सिंह खैरा मामले में संविधान पीठ ने माना है कि यदि दोषसिद्धि और सजा का फैसला और सीआरपीसी की धारा 319 के तहत समन का आदेश एक ही तारीख को पारित किया जाता है, तो अदालत को मामले के तथ्यों और परिस्थितियों की जांच करनी पड़ सकती है। पीठ ने गौर किया कि सुखपाल सिंह खैरा मामले में यह भी कहा गया कि यदि इस तरह का समन आदेश पारित किया जाता है, चाहे दोषसिद्धि के आदेश के बाद या सजा सुनाए जाने के बाद, तो यह स्थायी नहीं हो सकता है। पीठ ने कहा, दो जजों के संयोजन में बैठकर, हम इस अदालत की संविधान पीठ निर्धारित कानून से बंधे हैं।
अदालत ने निर्विवाद रूप से उल्लेख किया कि 21 मार्च, 2012 को मामले में कुछ अभियुक्तों के मामले में दोषसिद्धि का आदेश और अन्य अभियुक्तों के मामले में दोषमुक्ति का आदेश दिन के पहले सत्र में पारित किया गया था। दूसरे भाग में, न्यायालय ने पहले दोषी ठहराए गए व्यक्तियों की सजा के लिए आदेश पारित किया और उसके बाद ही वर्तमान अपीलकर्ता को समन करने के लिए सीआरपीसी की धारा 319 के तहत आदेश पारित किया।