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सुप्रीम कोर्ट: जब तक कोई संदेह न हो आंखों देखा साक्ष्य सर्वश्रेष्ठ प्रमाण
Tue, 27 Jul 2021 02:29 AM IST
Jeet Kumar
अमर उजाला ब्यूरो, नई दिल्ली।
अमर उजाला ब्यूरो, नई दिल्ली।
Published by: Jeet Kumar
Updated Tue, 27 Jul 2021 02:29 AM IST
सार
शीर्ष अदालत ने गुजरात हाईकोर्ट के एक फैसले को पलटते हुए दोषियों की उम्रकैद की सजा बहाल करते हुए यह अहम टिप्पणी की
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Supreme Court
- फोटो : ANI
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विस्तार
सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि जब तक कोई संदेह का कारण न हो आंखों देखा (चश्मदीद) साक्ष्य को सबसे अच्छा प्रमाण माना जाता है। शीर्ष अदालत ने हत्या के दोषी चार लोगों की उमकैद की सजा को बहाल करते हुए ये टिप्पणी की है।
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जस्टिस नवीन सिन्हा और जस्टिस आर सुभाष रेड्डी की पीठ ने कहा है कि जब कभी किसी मामले में चिकित्सा साक्ष्य और मौखिक साक्ष्य के बीच घोर विरोधाभास होता है तो आंखों देखे साक्ष्य का सहारा लिया जाता है।
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यह कहते हुए सुप्रीम कोर्ट ने गुजरात हाईकोर्ट द्वारा चार हत्यारोपियों को बरी करने के फैसले को पलट दिया और निचली अदालत द्वारा दोषियों को दी गई उम्रकैद की सजा को बहाल कर दिया।
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शीर्ष अदालत ने कहा कि गवाह के पास सच्चाई बताने के अलावा आरोपियों के नाम पर विचार करने और विचार करने का समय नहीं होता। पीठ ने कहा, रात में जाने-पहचाने लोगों के बीच पहचान आवाज, परछाई और चाल से ही की जा सकती है।
कोर्ट ने कहा, हमें प्रतिवादियों के हलफनामे में ऐसा कोई भी तत्व नहीं मिला, जिससे कि संदेह का लाभ देने के लिए कहा जाए कि रात में पहचान संभव नहीं थी।
शहरी के मुकाबले गांववालों की देखने की क्षमता बेहतर
शीर्ष अदालत ने कहा कि इस देश में विकसित आपराधिक न्यायशास्त्र यह मानता है कि ग्रामीण इलाकों में रहने वालों की आंखों की दृष्टि क्षमता शहर के लोगों की तुलना में कहीं बेहतर होती है।
यह था मामला
यह मामला 2003 का है। एक शख्स मोटर साइकिल से जा रहा था। रास्ते में उस पर लोहे की रॉड से हमला किया गया, जिससे उसकी मौत हो गई थी। उस शख्स के साथ मोटरसाइकिल पर एक और व्यक्ति था जो बाद में अभियोजन पक्ष का गवाह बना।
हालांकि, मोटरसाइकिल पर पीछे बैठे चश्मदीद गवाह और अभियोजन पक्ष के एक गवाह के बयानों में विरोधाभास होने के कारण दोषियों को बरी कर दिया गया था।