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एनडीपीएस कानून के तहत पुलिस के सामने दिया इकबालिया बयान सुबूत नहीं : सुप्रीम कोर्ट
Fri, 30 Oct 2020 01:51 AM IST
Jeet Kumar
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
Published by: Jeet Kumar
Updated Fri, 30 Oct 2020 01:51 AM IST
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सुप्रीम कोर्ट
- फोटो : ANI
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सुप्रीम कोर्ट ने ड्रग्स से जुड़े एक मामले में अहम फैसला सुनाया है। कोर्ट ने कहा कि एनडीपीएस एक्ट के तहत किसी पुलिस अधिकारी के सामने आरोपी के बयान को सुबूत नहीं माना जा सकता है। इसे आरोपी को दोषी ठहराने के लिए आधार नहीं बनाया जा सकता है।
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सुप्रीम कोर्ट के तीन जजों की पीठ ने बहुमत से दिए अपने निर्णय में यह राय दी। जस्टिस रोहिंटन नरीमन और जस्टिस नवीन सिन्हा ने अपने फैसले में कहा कि इस तरह का बयान एविडेंस एक्ट की धारा-25 के विपरीत है और पुलिस अधिकारी के सामने दिया बयान मान्य साक्ष्य के तौर पर इस्तेमाल नहीं हो सकता है जबकि जस्टिस इंदिरा बनर्जी ने अल्पमत में इनके विपरीत मत व्यक्त किया।
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पीठ ने कहा कि नारकोटिक्स ड्रग्स एवं साइकोट्रॉपिक पदार्थ अधिनियम (एनडीपीएस कानून) की धारा 53 के तहत एक पुलिस अधिकारी को दिया गया इकबालिया बयान एक सुबूत के रूप में स्वीकार्य बयान नहीं माना जाएगा।
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इस कानून के तहत अपराध के लिए एक आरोपी को दोषी ठहराने के लिए ध्यान में नहीं लिया जा सकता। यह फैसला ऐसे समय आया है, जब नशीले पदार्थों के सेवन और तस्करी को लेकर नारकोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो (एनसीबी) मुंबई, बंगलूरू और अन्य शहरों में लगातार ड्रग पेडलरों पर शिकंजा कस रही है।
सुप्रीम कोर्ट के पहले के फैसले इससे अलग थे। 2013 में दो जजों की पीठ ने मामले को रेफर किया था। उस वक्त सवाल भेजा गया था कि क्या एनडीपीएस एक्ट के तहत जो अधिकारी हैं, वह पुलिस अधिकारी माने जाएंगे। और दूसरा सवाल था कि क्या एनडीपीएस की धारा-67 के तहत लिए गए बयान को इकबालिया बयान माना जाए या नहीं।
सुप्रीम कोर्ट ने कन्हैया लाल बनाम यूनियन ऑफ इंडिया के मामले में पहले कहा था कि एनडीपीएस के तहत अधिकारी पुलिस अधिकारी नहीं हैं और ऐसे में एविडेंस एक्ट लागू नहीं होता। सवाल ये उठा था कि एनडीपीएस एक्ट के तहत अधिकारी जो छानबीन करते हैं और आरोपी का बयान दर्ज करते हैं ये अधिकारी पुलिस अधिकारी माने जाएं या नहीं।
जस्टिस नरीमन की अगुवाई वाली पीठ ने कहा कि इकबालिया बयान अधिकृत अधिकारी के सामने एनडीपीएस के तहत होता है। इस आधार पर एनडीपीएस के तहत आरोपी को दोषी करार दिया जाता है। इस मामले में एविडेंस एक्ट की धारा-25 के अलावा और कोई सेफगार्ड नहीं है।
ये सीधे तौर पर अनुच्छेद-14 (समानता का अधिकार) अनुच्छेद-20 (3) यानी खुद के खिलाफ गवाही के लिए बाध्य न करने का अधिकार यानी चुप रहने का अधिकार और अनुच्छेद-21 (जीवन का अधिकार) का उल्लंघन है।