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तलाक-ए-हसन: सुप्रीम कोर्ट ने कहा- पीड़िताओं को राहत देना प्राथमिकता, कहर बरपा रही यह प्रथा
Tue, 30 Aug 2022 04:09 AM IST
Jeet Kumar
अमर उजाला ब्यूरो, नई दिल्ली
अमर उजाला ब्यूरो, नई दिल्ली
Published by: Jeet Kumar
Updated Tue, 30 Aug 2022 04:09 AM IST
सार
पीठ ने कहा, हमारे सामने दो लोग हैं, जिन्हें राहत की जरूरत है और हमारी चिंता इसी को लेकर है। हम बाद में देखेंगे कि कौन से मुद्दे बच जाते हैं।
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सुप्रीम कोर्ट
- फोटो : Social media
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विस्तार
सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को कहा कि तलाक-ए-हसन की सांविधानिक वैधता को तय करने से पहले उसका प्राथमिक उद्देश्य इससे पीड़ित दो महिलाओं को राहत प्रदान करना है।
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तलाक-ए-हसन मुसलमानों में तलाक का एक रूप है, जिसके द्वारा एक आदमी तीन महीने की अवधि के दौरान हर महीने एक बार तलाक बोलकर पत्नी को तलाक दे सकता है। जस्टिस संजय किशन कौल और जस्टिस अभय एस ओका की पीठ ने याचिकाकर्ताओं के पतियों को पक्षकार बनाते हुए उन्हें याचिका पर जवाब दाखिल करने के लिए कहा है।
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पीठ ने कहा, कभी-कभी हम बड़ा मुद्दा उठाने के प्रयास करते हैं। इस प्रयास में पक्षकारों को किस राहत की जरूरत है, वह खो जाता है। पीठ ने कहा, हमारे सामने दो लोग हैं, जिन्हें राहत की जरूरत है और हमारी चिंता इसी को लेकर है। हम बाद में देखेंगे कि कौन से मुद्दे बच जाते हैं।
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शीर्ष अदालत बेनजीर हीना और नाजरीन निशा की अलग-अलग याचिकाओं पर सुनवाई कर रही थी। याचिकाओं में तलाक-ए-हसन की सांविधानिक वैधता को चुनौती दी गई है। पीठ ने कहा, वह 11 अक्टूबर को मामले की सुनवाई करेगी।
कहर बरपा रही यह प्रथा
गाजियाबाद निवासी हीना ने अपनी याचिका में कहा, यह प्रथा कई महिलाओं और उनके बच्चों, खासकर आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों के लोगों के जीवन पर कहर बरपा रही है। उसके मामले में पुलिस व अन्य अथॉरिटी ने यह कहते हुए शिकायत दर्ज करने से इन्कार कर दिया कि शरीयत के तहत तलाक-ए-हसन की अनुमति है।