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SC: सुप्रीम कोर्ट ने कहा- शक्तियों के इस्तेमाल में संयम दिखाएं हाईकोर्ट, न्याय के उद्देश्यों का रखें ध्यान

Mon, 19 Dec 2022 09:29 PM IST
निर्मल कांत न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: निर्मल कांत Updated Mon, 19 Dec 2022 09:29 PM IST
सार

पीठ ने कहा, सिविल लेन-देन का खुलासा करने वाली शिकायत की भी आपराधिक बनावट हो सकती है। लेकिन हाईकोर्ट को यह देखना चाहिए कि क्या वह विवाद जो नागरिक प्रकृति का है, उसे आपराधिक मामले का रूप दिया जा सकता है या नहीं।

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Supreme Court said High Courts should show restraint in the use of powers
सुप्रीम कोर्ट - फोटो : एएनआई

विस्तार

सुप्रीम कोर्ट ने सभी हाईकोर्ट को उनकी निहित शक्तियों का संयम से उपयोग करने की सलाह दी। शीर्ष अदालत ने कहा, सीआरपीसी की धारा 482 के तहत अपने अधिकार क्षेत्र का प्रयोग करते हुए सिर्फ न्याय के उद्देश्यों का ध्यान रखा जाना चाहिए। 

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कोर्ट ने कहा, यह प्रावधान हाईकोर्ट को ऐसे आदेश पारित करने में सक्षम बनाता है जो दंड प्रक्रिया संहिता के तहत किसी भी आदेश को प्रभावी करने के लिए या किसी भी अदालत की प्रक्रिया के दुरुपयोग को रोकने के लिए या अन्यथा न्याय के उद्देश्यों को सुरक्षित करने के लिए आवश्यक हो सकते हैं। 
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जस्टिस एसए नजीर और जस्टिस जेबी पारदीवाला की पीठ ने तेलंगाना हाईकोर्ट के आदेश को दरकिनार करते हुए कहा, यदि दीवानी उपचार उपलब्ध है और उसे अपनाया गया है तो हाईकोर्ट अदालत की प्रक्रिया के दुरुपयोग को रोकने के लिए आपराधिक कार्यवाही को रद्द कर सकता है। तेलंगाना हाईकोर्ट ने शिकायतकर्ता पोटेल बाबू यादव के कहने पर आर नागेंद्र यादव के खिलाफ शुरू की गई आपराधिक कार्यवाही को रद्द करने से इनकार कर दिया था।
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पीठ ने पाया कि पोटेल बाबू यादव ने रंगा रेड्डी जिले के नल्लागंडला गांव में स्थित अपने 321 वर्ग गज भूखंड के 29 दिसंबर, 2010 के बिक्री विलेख को रद्द करने की मांग करते हुए एक अलग दीवानी मामला भी दायर किया है। पीठ न कहा, शिकायत एक आपराधिक कृत्य का खुलासा करती है या नहीं, यह इस बात पर निर्भर करता है कि उसके तहत कथित अधिनियम की प्रकृति क्या है और क्या एक आपराधिक कृत्य के आवश्यक तत्व मौजूद हैं या नहीं। हाईकोर्ट को ही इसका फैसला करना है। 


पीठ ने कहा, सिविल लेन-देन का खुलासा करने वाली शिकायत की भी आपराधिक बनावट हो सकती है। लेकिन हाईकोर्ट को यह देखना चाहिए कि क्या वह विवाद जो नागरिक प्रकृति का है, उसे आपराधिक मामले का रूप दिया जा सकता है या नहीं।

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