Supreme Court : शीर्ष अदालत ने कहा- असाधारण परिस्थितियों में दी जा सकती है पर्यावरणीय मंजूरी
Supreme Court: सुप्रीम कोर्ट ने बृहस्पतिवार को एक अन्य मामले में भी कहा कि अगर दो इकाइयां कंपनी कर्जदारों की श्रेणी में आती हैं, उन दोनों के खिलाफ आईबीसी के तहत ऋण शोधन कार्रवाई शुरू की जा सकती है।
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Supreme Court: सुप्रीम कोर्ट ने बृहस्पतिवार अपने एक फैसले में कहा कि असाधारण परिस्थितियों में पर्यावरणीय मंजूरी दी जा सकती है। कोर्ट ने कहा कि पर्यावरण संरक्षण अधिनियम पर्यावरणीय मंजूरी को प्रतिबंधित नहीं करता है। न्यायमूर्ति इंदिरा बनर्जी और न्यायमूर्ति जे के माहेश्वरी की पीठ ने कहा कि यह अदालत इस तथ्य पर ध्यान नहीं दे सकती कि जैव-चिकित्सा अपशिष्ट उपचार सुविधा का संचालन पर्यावरण प्रदूषण की रोकथाम के हित में है। केवल पूर्व पर्यावरण मंजूरी के अभाव में सुविधा को बंद करना जनहित के खिलाफ होगा।
पीठ ने नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) द्वारा पारित अंतिम आदेश 10 मई, 2017 के खिलाफ अपील पर विचार करने से इन्कार कर दिया, जिसमें एनजीटी एक्ट 2010 के तहत एक आवेदन को खारिज कर दिया गया था। अपीलकर्ता ने 17 अप्रैल, 2015 को संशोधित पर्यावरणीय प्रभाव आकलन अधिसूचना 2006 के प्रावधानों के कथित गैर-अनुपालन के आधार पर एक निजी फर्म द्वारा संचालित कॉमन बायो-मेडिकल वेस्ट ट्रीटमेंट फैसिलिटी को बंद करने का निर्देश देने की मांग की थी।
दो इकाइयां कंपनी देनदारों के दायरे में आती हैं तो दोनों पर चलेगा दिवालिया कानून
सुप्रीम कोर्ट ने बृहस्पतिवार को कहा कि अगर दो इकाइयां कंपनी कर्जदारों की श्रेणी में आती हैं, उन दोनों के खिलाफ आईबीसी के तहत ऋण शोधन कार्रवाई शुरू की जा सकती है। ऋण शोधन अक्षमता और दिवाला संहिता (आईबीसी) की धारा सात वित्तीय कर्जदारों के खिलाफ ऋण शोधन कार्रवाई शुरू करने से संबंधित है। शीर्ष अदालत ने यह भी कहा कि एक कर्जदार के संदर्भ में अगर ऋण शोधन कार्रवाई शुरू करने की मंजूरी है तो इससे उसके साथ मिलकर कर्ज लेने वाली इकाई बरी नहीं हो सकती। एजेंसी
- न्यायाधीश इंदिरा बनर्जी और न्यायाधीश जेके माहेश्वरी की पीठ ने कहा, अगर दो कर्जदार हैं या दो कंपनियां कर्जदार की श्रेणी में आती हैं, इसका का कोई कारण नहीं है कि आईबीसी की धारा सात के तहत दोनों के खिलाफ कार्रवाई क्यों नहीं शुरू की जा सकती है। शीर्ष अदालत ने यह भी कहा कि दोनों कंपनी कर्जदारों से एक ही राशि नहीं वसूली जा सकती।
- अपील खारिज करते हुए पीठ ने कहा, अगर बकाया का कुछ हिस्सा एक से प्राप्त किया जाता है, शेष राशि दूसरे कर्जदार से बतौर सह-कर्जदार लिया जा सकता है।
हालांकि, अगर वित्तीय कर्जदाता के दावे का निपटान हो जाता है, दो बार दावा राशि की वसूली का कोई सवाल नहीं है। न्यायालय ने अपने फैसले में कहा कि वित्तीय कर्जदाता ने आईबीसी की धारा सात के तहत दोनों कंपनियों के खिलाफ सीआईआरपी शुरू करने को लेकर अलग-अलग याचिकाएं दायर की हैं और एनसीएलटी ने उसे स्वीकार किया है।