सुप्रीम कोर्ट ने खारिज की 26 सप्ताह के गर्भ को गिराने की याचिका
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मंगलवार को सुप्रीम कोर्ट ने 26 सप्ताह के गर्भ को गिराने की इजाजत वाली याचिका खारिज कर दी। कोर्ट ने कहा कि 20 सप्ताह से ज्यादा के गर्भ को गिराने की इजाजत उसी स्थिति में दी जा सकती है जब मां की जान या भ्रूण को खतरा हो।
मेडिकल रिपोर्ट के मुताबिक पैदा होने वाला बच्चा शारीरिक और मानसिक समस्याओं से ग्रसित या कम बुद्धिक्षमता वाला हो सकता है, लेकिन इससे मां के स्वास्थ्य को कोई खतरा नहीं है।
कोर्ट ने कहा कि ये दु:खद है कि जन्म लेने वाला बच्चा शारीरिक और मानसिक चुनौतियों का सामना करेगा और यह मां के लिए यह दुर्भाग्यपूर्ण है, लेकिन हम गर्भपात की इजाजत नहीं दे सकते। हमारे हाथों में एक जिंदगी है।
डाउन सिंड्रोम एक जन्मजात विकार है
डाउन सिंड्रोम एक जन्मजात विकार है, जिससे बौद्धिक हानि और शारीरिक असामान्यताएं पैदा हो सकती हैं। शीर्ष अदालत के न्यायाधीश एस ए बोबडे और न्यायाधीश एल नागेश्वर राव की पीठ ने इसके लिए अन्तरिम आदेश जारी कर दिया है।
केंद्र ने कोर्ट को जानकारी देते हुए कहा कि हम 24 सप्ताह के भ्रूण के लिए मेडिकल टर्मिनेशन पर विचार कर रहे हैं। फरवरी में 22 साल की एक महिला को कोर्ट ने 24 सप्ताह के भ्रूण के गर्भपात की इजाजत दी थी, क्योंकि गर्भ को ज्यादा समय तक जारी रखने पर महिला की जान को खतरा था।
वहीं जनवरी में अपेक्स कोर्ट ने मुंबई की रहने वाली एक महिला को 24 सप्तात के गर्भ के गर्भपात की इजाजत मेटिकल टर्मिनेशन ऑफ प्रेग्नेंसी एक्ट के तहत दे दी। जिसमें कोर्ट ने उस मेडिकल रिपोर्ट को आधार बनाया था जिसमें कहा गया कि भ्रूण बिना खोपड़ी के जिंदा नहीं रह सकता।