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Supreme Court: सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी- जजों पर आरोप लगाना नया फैशन, जितना मजबूत जज उतने ही बुरे आरोप लगाए जाते हैं

Mon, 23 May 2022 09:57 PM IST
अभिषेक दीक्षित न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: अभिषेक दीक्षित Updated Mon, 23 May 2022 09:57 PM IST
सार

जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ और जस्टिस बेला एम त्रिवेदी की अवकाशकालीन पीठ ने वकील पीआर आदिकेशवन की याचिका को खारिज कर दिया। हाईकोर्ट ने वकील को दो सप्ताह के कारावास की सजा देने के साथ एक वर्ष तक वकालत करने से रोक दिया था।

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Supreme Court rejects plea of lawyer sentenced to 2 weeks jail debarment of practice Said New fashion to accuse judges Latest Update
सुप्रीम कोर्ट (फाइल) - फोटो : सोशल मीडिया

विस्तार

सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को कहा कि न्यायाधीशों के खिलाफ आरोप लगाना नया फैशन बन रहा है। न्यायाधीश जितना मजबूत होता है, उसके खिलाफ उतने ही बुरे आरोप लगाए जाते हैं। यह मुंबई में हो रहा है, उत्तर प्रदेश में बड़े पैमाने पर हो रहा है और अब चेन्नई में भी। शीर्ष अदालत ने यह मौखिक टिप्पणी मद्रास हाईकोर्ट के उस फैसले के खिलाफ एक वकील द्वारा दायर विशेष अनुमति याचिका (एसएलपी) पर सुनवाई के दौरान की, जिसमें वकील को न्यायालय की अवमानना के लिए दंडित किया गया था।

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जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ और जस्टिस बेला एम त्रिवेदी की अवकाशकालीन पीठ ने वकील पीआर आदिकेशवन की याचिका को खारिज कर दिया। हाईकोर्ट ने वकील को दो सप्ताह के कारावास की सजा देने के साथ एक वर्ष तक वकालत करने से रोक दिया था। वकील को हाईकोर्ट द्वारा जारी गैर-जमानती वारंट के निष्पादन में बाधा डालने के कारण अवमानना का दोषी ठहराया गया था।
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बेबुनियाद आरोप नहीं लगा सकते
पीठ ने वकील के आचरण को पूरी तरह से अवमानना करार दिया। पीठ ने मौखिक रूप से कहा, आप जानते हैं, न्यायाधीशों पर हमला किया जाता है। जिला न्यायालयों में न्यायाधीशों की कोई सुरक्षा नहीं है। कभी-कभी लाठी वाले पुलिसकर्मी भी नहीं होते है। यह पूरे देश में हो रहा है। आप बेबुनियाद आरोप नहीं लगा सकते।
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वकील का आचरण अपमानजनक
हाईकोर्ट के आदेश को बरकरार रखते हुए पीठ ने आदेश में कहा, याचिकाकर्ता वकील का व्यवहार और आचरण पूरी तरह अपमानजनक था और जब उसके खिलाफ एनबीडब्ल्यू जारी किया गया था तो उसने न्याय में बाधा डालने का स्पष्ट प्रयास किया। मद्रास हाईकोर्ट के एकल न्यायाधीश के खिलाफ आरोप लगाए गए हैं। एक न्यायाधीश को अनुचित आधार पर मामले से अलग करने की भी मांग की गई। न्याय के प्रशासन के प्रति याचिककर्ता का कोई सम्मान नहीं है। 

दो सप्ताह जेल में रहकर पछतावा कीजिए
पीठ ने कहा, सजा को लागू करने को अतार्किक नहीं माना जा सकता है। इसलिए हस्तक्षेप का कोई मामला नहीं बनता है। जस्टिस चंद्रचूड़ ने कहा, याचिकाकर्ता वकीलों के एक वर्ग से ताल्लुक रखते हैं। उनका ऐसा करना पूरी तरह अक्षम्य और कानूनी पेशे पर धब्बा है। अब बहुत देर हो चुकी है। दो सप्ताह की कैद बहुत उदार सजा है। दो सप्ताह जेल में रहकर पछतावा करने दीजिए।-


हिंसा का वास्तविक उपयोग मकोका के लिए अनिवार्य नहीं: सुप्रीम कोर्ट

  • वहीं, सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि महाराष्ट्र संगठित अपराध नियंत्रण अधिनियम (मकोका) के प्रावधानों को लागू करने के लिए हिंसा का वास्तविक उपयोग एक आवश्यक शर्त नहीं है। जस्टिस दिनेश माहेश्वरी की अध्यक्षता वाली पीठ ने कहा है कि हिंसा का वास्तविक उपयोग हमेशा संगठित अपराध की शरारत के भीतर आने वाली गतिविधि के लिए अनिवार्य नहीं है। हिंसा की धमकी या यहां तक की उकसाने की धमकी शरारत के दायरे में आएगी और इसके अलावा अन्य गैरकानूनी साधनों का इस्तेमाल भी उसी शरारत के दायरे में आएगा। शीर्ष अदालत ने बॉम्बे हाईकोर्ट के उस आदेश को चुनौती देने वाली अपील को खारिज कर दिया, जिसमें अभिषेक नामक एक शख्स के खिलाफ मकोका लगाने के विरुद्ध दायर याचिका पर विचार करने से इनकार कर दिया गया था। 
  • अभिषेक और अन्य पर मई 2020 में नागपुर में एक रेस्तरां मालिक के कथित अपहरण का आरोप था। उन्होंने फिरौती के रूप में 20 लाख रुपये की मांग की थी। अभिषेक ने तर्क दिया कि अथॉरिटी ने विशेष अधिनियम के प्रावधानों की व्याख्या करने में गलती की। पीठ ने कहा कि अपीलकर्ता की ओर से गतिविधि को केवल हिंसा के उपयोग तक सीमित करने का सुझाव स्पष्ट रूप से गलत है क्योंकि मकोका की धारा 2 (1) के खंड (ई) द्वारा व्यापक गतिविधियों पर विचार किया गया है। शीर्ष अदालत ने यह भी कहा है कि नियम को अव्यवहारिक तरीके से लागू नहीं किया जा सकता है जिससे कि कानून ही निरर्थक बन जाए।
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