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आदेश का उल्लंघन: गृह सचिव अजय कुमार भल्ला पड़ सकते हैं अवमानना के फेरे में

Tue, 06 Jul 2021 07:01 AM IST
देव कश्यप राजीव सिन्हा, नई दिल्ली
राजीव सिन्हा, नई दिल्ली Published by: देव कश्यप Updated Tue, 06 Jul 2021 07:01 AM IST
सार

  • पदोन्नति पर यथास्थिति बनाए रखने के आदेश का कथित तौर पर उल्लंघन का आरोप

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Supreme Court refuses to quash contempt proceedings against Home Secretary Ajay Kumar Bhalla
गृह सचिव अजय कुमार भल्ला - फोटो : सोशल मीडिया

विस्तार

सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार के कर्मचारियों की पदोन्नति पर यथास्थिति बनाए रखने के आदेश का कथित उल्लंघन के मामले में कार्मिक एवं प्रशिक्षण विभाग (डीओपीटी) के पूर्व सचिव व फिलहाल गृह सचिव अजय कुमार भल्ला के खिलाफ अवमानना की कार्यवाही को समाप्त करने से इनकार कर दिया है। एक अक्तूबर 2020 से 24 जनवरी 2021 के बीच भल्ला के पास डीओपीटी के सचिव का अतिरिक्त प्रभार था।

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अटॉर्नी जनरल केके वेणुगोपाल ने जस्टिस एल नागेश्वर राव और जस्टिस अनिरुद्ध बोस की पीठ से कहा कि अवमानना याचिका में तथ्यों का छुपाने के प्रयास किया गया है। जबकि सच्चाई यह है कि केवल अस्थायी और तदर्थ पदोन्नति की गई थी। लिहाजा अवमानना के आरोपी वरिष्ठ आईएएस अधिकारी अजय कुमार भल्ला को ऐसे तथ्यों के आलोक में आरोपमुक्त किया जाना चाहिए।
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वेणुगोपाल ने यह भी कहा कि भल्ला फिलहाल गृह सचिव हैं। अटॉर्नी जनरल ने कहा कि मेरे सुझाव पर अस्थायी और तदर्थ पदोन्नति देने का निर्णय लिया गया था। लेकिन शीर्ष अदालत ने उनकी दलीलों को अस्वीकार कर दिया। पीठ ने कहा कि इस मामले पर अगस्त के दूसरे सप्ताह में विस्तार से सुनवाई होगी।
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गत अप्रैल महीने में शीर्ष अदालत ने देवेंद्र साहू द्वारा दायर अवमानना याचिका पर अजय कुमार भल्ला को नोटिस जारी करते हुए पूछा था कि केंद्र सरकार के अधिकारियों (आईएएस-आईपीएस को छोड़) के प्रमोशन पर यथास्थिति बनाए रखने के आदेश का उल्लंघन करने पर क्यों नहीं उनके खिलाफ अवमानना की कार्यवाही शुरू की जानी चाहिए? साथ ही कोर्ट ने संघ लोक सेवा आयोग के सचिव को नोटिस जारी किया था। तब याचिकाकर्ता की ओर से पेश वकील कुमार परिमल ने पीठ से कहा था कि 15 अप्रैल 2019 को सुप्रीम कोर्ट ने अधिकारियों की पदोन्नति पर यथास्थिति बनाए रखने का आदेश दिया था।

उसके बाद 22 जुलाई 2020 को डीओपीटी ने अटॉर्नी जनरल केके वेणुगोपाल के माध्यम से सुप्रीम कोर्ट में आवेदन दाखिल कर अस्थायी रूप से पदोन्नति करने की इजाजत मांगी थी, लेकिन कोर्ट ने इजाजत देने से इनकार कर दिया था। बावजूद इसके डीओपीटी में 11 दिसंबर 2020 को उप सचिव से लेकर निदेशक स्तर के 149 अधिकारियों का अस्थायी रूप से पदोन्नति का आदेश निकाला। इनमें से 55 आरक्षित वर्ग से थे, जो पूर्व में प्रमोशन में आरक्षण का फायदा ले चुके थे।

देवेंद्र साहू द्वारा दायर अवमानना याचिका में कहा गया था कि पदोन्नति करने का सरकार का वह आदेश एम नागराज और जरनैल सिंह मामले में संविधान पीठ द्वारा दिए गए फैसलों के विपरीत है। सरकार ने पदोन्नति करने में इन दोनों फैसलों में तय की गई प्रक्त्रिस्या का पालन नहीं किया गया। ऐसे में यह साफ है कि जानबूझकर न्यायालय के आदेश की अवमानना की गई है, लिहाजा इसके लिए जिम्मेदार लोगों के खिलाफ अवमानना की कार्यवाही शुरू करनी चाहिए और उन्हें दोषी ठहराया जाना चाहिए।


मालूम हो कि वर्ष 2006 में नागराज मामले में और 2018 में जरनैल सिंह मामले में संविधान पीठ ने साफ तौर पर कहा था कि प्रमोशन में आरक्षण देने के मामले में आपर्याप्त प्रतिनिधित्व को लेकर आंकड़ा जुटाया जाना चाहिए।

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