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Hindi News ›   India News ›   Supreme Court on Hooch Tragedies: New Strategy to Curb Spurious Liquor, Tighten Methanol Regulation

सुप्रीम कोर्ट अपडेट्स: जहरीली शराब की त्रासदी रोकने के लिए अदालत ने क्या कहा, राज्यों में कौन सी रणनीति बनेगी?

Fri, 18 Sep 2026 06:00 PM IST
हिमांशु सिंह चंदेल न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: हिमांशु सिंह चंदेल Updated Fri, 18 Sep 2026 06:00 PM IST
सार

सुप्रीम कोर्ट ने जहरीली शराब की घटनाओं को रोकने के लिए राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों को कई सुझाव दिए। अदालत ने पुलिस, आबकारी, निषेध, परिवहन और उद्योग विभाग के बीच तालमेल बढ़ाने पर जोर दिया। आइए, विस्तार से जानते आज सुप्रीम कोर्ट में कई मामलों की सुनवाई में क्या-क्या हुआ?

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Supreme Court on Hooch Tragedies: New Strategy to Curb Spurious Liquor, Tighten Methanol Regulation
सुप्रीम कोर्ट अपडेट - फोटो : @अमर उजाला ग्राफिक्स

विस्तार

जहरीली और नकली शराब से होने वाली मौतों को रोकने के लिए सुप्रीम कोर्ट ने राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों के लिए कई सुझाव दिए हैं। अदालत ने अवैध शराब के निर्माण, परिवहन और बिक्री पर रोक लगाने के लिए अलग-अलग विभागों के बीच तालमेल वाली रणनीति अपनाने की जरूरत बताई। जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस के विनोद चंद्रन की पीठ ने महाराष्ट्र पॉइजन रूल्स के नियम 18ए और 18बी को रद्द करते हुए ये सुझाव दिए। ये नियम 2011 की अधिसूचना के जरिए मुंबई में हुई बड़ी जहरीली शराब त्रासदी के बाद जोड़े गए थे।
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सुप्रीम कोर्ट ने अवैध शराब रोकने के लिए क्या रणनीति सुझाई?
अदालत ने कहा कि अवैध शराब की मांग और आपूर्ति, दोनों पर एक साथ रोक लगाना जरूरी है। राज्यों को अपनी सीमाओं पर निगरानी बढ़ाने की सलाह दी गई है, क्योंकि शराब राज्य के भीतर भी बनती है और बाहर से भी लाई जाती है। परिवहन विभाग की सीमा पर सतर्कता अवैध शराब की आवाजाही रोकने में मदद कर सकती है। पुलिस को निषेध और आबकारी विभाग के साथ मिलकर स्थानीय शराब बनाने वाली जगहों की पहचान कर कार्रवाई करनी चाहिए। अदालत ने यह भी कहा कि शराब की खरीद, निर्माण, परिवहन, बिक्री और सेवन से जुड़े मौजूदा कानूनों को प्रभावी तरीके से लागू करना जरूरी है।
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मेथनॉल की निगरानी कैसे होगी?
सुप्रीम कोर्ट ने मेथनॉल के इस्तेमाल और उसकी आवाजाही पर कड़ी निगरानी की जरूरत बताई। अदालत के मुताबिक नकली शराब बनाने में इस्तेमाल होने वाले रासायनिक सॉल्वेंट आम तौर पर औद्योगिक इकाइयों से अवैध तरीके से हासिल किए जाते हैं। इसलिए उद्योग विभाग को ऐसी इकाइयों पर निगरानी रखनी चाहिए जो रासायनिक सॉल्वेंट बनाती और बेचती हैं। मेथनॉल से जुड़े लाइसेंस और परमिट देने के नियमों की व्यापक समीक्षा की जानी चाहिए। लाइसेंस लेने वाले हर व्यक्ति को मेथनॉल की खपत और बचा हुआ स्टॉक दर्ज करना चाहिए। दोनों का समय-समय पर मिलान कर किसी भी कमी की तुरंत जांच होनी चाहिए। नियम तोड़ने पर लाइसेंस या परमिट निलंबित या रद्द किया जा सके और आगे नया लाइसेंस देने पर भी रोक हो। मेथनॉल को केवल उसके लिए तय विशेष टैंकरों से ले जाने का सुझाव भी दिया गया है।
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सुप्रीम कोर्ट ने महाराष्ट्र के मेथनॉल नियम क्यों किए रद्द?

सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को महाराष्ट्र में मेथनॉल की बिक्री से जुड़े उन नियमों को रद्द कर दिया, जिनके तहत गैर-दवा बनाने वाली कंपनियों को मेथनॉल बेचने से पहले उसमें तय रंग और कड़वा पदार्थ मिलाना जरूरी था। अदालत ने कहा कि ये पाबंदियां संविधान के तहत मिले अधिकारों का उल्लंघन करती हैं और रोकथाम के मकसद के मुकाबले अनुपातहीन हैं। हालांकि, अदालत ने साफ किया कि जहरीले और खतरनाक पदार्थ मेथनॉल की बिक्री और इस्तेमाल पर प्रभावी नियंत्रण जरूरी है।

महाराष्ट्र ने मेथनॉल पर ये नियम क्यों लगाए थे?
न्यायमूर्ति जेबी पारदीवाला और न्यायमूर्ति के विनोद चंद्रन की पीठ ने महाराष्ट्र पॉइजन नियमों के नियम 18ए और 18बी को रद्द किया। ये नियम 2011 की अधिसूचना के जरिए 1991 की मुंबई जहरीली शराब त्रासदी के बाद जोड़े गए थे। नियम 18ए के तहत मेथनॉल बेचने वाले को खरीदार के फॉर्म ए लाइसेंस की जांच कर उसके इस्तेमाल का उद्देश्य पता करना होता था। नियम 18बी के तहत वैध फॉर्म ए लाइसेंस के बिना किसी के पास मिले मेथनॉल को जब्त करने का प्रावधान था।

अदालत ने इन नियमों को अनुपातहीन क्यों माना?
अदालत ने कहा कि मेथनॉल जहरीला और खतरनाक पदार्थ है, इसलिए इसकी बिक्री और कब्जे पर प्रभावी नियमन जरूरी है। लेकिन महाराष्ट्र की ओर से अपनाए गए उपाय संविधान के तहत उचित और अनुपातिक कसौटी पर खरे नहीं उतरते। पीठ ने कहा कि राज्य यह साबित नहीं कर सका कि इन नियमों का मेथनॉल से होने वाली जहरीली शराब की त्रासदियों को रोकने के लक्ष्य से सीधा और उचित संबंध है। अदालत ने कहा कि मेथनॉल में रंग और कड़वा पदार्थ मिलाने से शराब की मांग खत्म नहीं होगी, जबकि इससे एक उद्योग पर गंभीर असर पड़ सकता है।

जहरीली शराब रोकने के लिए सुप्रीम कोर्ट ने क्या रास्ता सुझाया?
अदालत ने कहा कि जहरीली शराब की समस्या से निपटने के लिए राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों को कई विभागों के बीच समन्वय के साथ काम करना चाहिए। अवैध शराब के निर्माण, परिवहन और बिक्री पर सख्त निगरानी जरूरी है। मेथनॉल के परिवहन और भंडारण को लेकर कड़े नियम लागू किए जा सकते हैं। अदालत ने यह भी कहा कि अवैध शराब रोकने के लिए केवल शराबबंदी पर निर्भर रहना समाधान नहीं है। उसके अनुसार पूरी शराबबंदी कई बार शराब के कारोबार को भूमिगत कर सकती है और बिना नियमन वाली जहरीली शराब का खतरा बढ़ सकता है।

अदालत ने 1991 की मुंबई की छाया बार त्रासदी का भी उल्लेख किया, जिसमें करीब 250 लोगों ने मिलावटी शराब पी थी और करीब 93 लोगों की मौत हुई थी। उस घटना के बाद बनी पार्थसारथी समिति ने मेथनॉल की अवैध बिक्री और चोरी, मिथाइल और एथाइल अल्कोहल के बीच भ्रम, प्रवर्तन एजेंसियों में भ्रष्टाचार और एथाइल अल्कोहल के मुकाबले मेथनॉल की कम कीमत जैसे कारणों की पहचान की थी। पीठ ने कहा कि जहरीली शराब रोकने के लिए इन कारणों पर सीधे कार्रवाई करना ज्यादा जरूरी है।
 
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