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Supreme Court: राजद्रोह पर IPC प्रावधानों के खिलाफ अर्जी पर जनवरी में 'सुप्रीम' सुनवाई, PMLA केस पर कही यह बात

Wed, 22 Nov 2023 08:27 PM IST
आदर्श शर्मा न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: आदर्श शर्मा Updated Wed, 22 Nov 2023 08:27 PM IST
सार

Supreme Court News Updates: राजद्रोह पर आईपीसी प्रावधानों की संवैधानिक वैधता के खिलाफ दायर याचिकाओं पर सुप्रीम कोर्ट जनवरी माह में सुनवाई करेगा। यहां पढ़ें... 
 

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Supreme Court News Updates hear in January pleas challenging constitutional validity provision on sedition
सुप्रीम कोर्ट - फोटो : ANI

विस्तार

सुप्रीम कोर्ट राजद्रोह पर आईपीसी प्रावधान की संवैधानिक वैधता के खिलाफ दायर याचिकाओं पर जनवरी में सुनवाई होगी। बता दें कुछ माह पहले केंद्र द्वारा दंडात्मक कानूनों में बदलाव करने के लिए संसद में एक विधेयक पेश किया था, जिसमें राजद्रोह कानून को निरस्त करने का जिक्र था। 
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मुख्य न्यायाधीश चंद्रचूड़ ने कहा, मामले की सुनवाई के लिए पीठ का गठन किया जाएगा। पूर्व में सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र के आग्रह को अस्वीकार कर दिया था, जिसमें कहा था कि याचिकाओं को बड़ी संवैधानिक पीठ के पास न भेजा जाए।
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बता दें 11 अगस्त को आपराधिक कानूनों में बदलाव के लिए केंद्र ने लोकसभा में तीन विधेयक पेश किए थे। जिसमें राजद्रोह कानून को निरस्त करने और कानून पेश करने का प्रस्ताव था। सुप्रीम कोर्ट ने पिछले वर्ष 11 मई को राजद्रोह पर तब तक रोक लगा दी थी जब तक इसकी उचित जांच नहीं कर लें। साथ ही केंद्र और राज्यों को इस प्रावधान के इस्तेमाल करने के लिए नई प्राथमिकी दर्ज नहीं करने के आदेश दिए थे।
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PMLA मामले पर सुप्रीम कोर्ट ने कहा, 2022 के फैसले पर पुनर्विचार की आवश्यकता

पीएमएलए मामले पर सुप्रीम कोर्ट ने कहा सीमित दायरा यह कि क्या 2022 के फैसले पर बड़ी पीठ द्वारा पुनर्विचार की आवश्यकता है। बता दें 2022 के फैसले में प्रवर्तन निदेशालय की धन शोधन में शामिल संपत्ति में गिरफ्तारी करने और कुर्क करने की शक्तियों को बरकरार रखा था। मामले पर केंद्र ने सुप्रीम कोर्ट को बताया कि पीएमएलए देश के लिए एक महत्वपूर्ण कानून था। याचिकाकार्ता ने दावा किया था कि ईडी 'बेकाबू घोड़ा' बन गया है, जहां चाहे वहां जा सकता है।

न्यायमूर्ति संजय किशन कौल की अध्यक्षता वाली पीठ कुछ मापदंडों पर तीन न्यायाधीशों की पीठ द्वारा 27 जुलाई, 2022 के फैसले पर पुनर्विचार की मांग करने वाली याचिकाओं पर सुनवाई कर रही थी। सुप्रीम कोर्ट ने कहा, समीक्षा करने की आवश्यकता है या नहीं, यह सीमित दायरा है। पीठ ने कहा, हमें यह भी देखना होगा कि क्या मामले को पांच जजों के पास भेजने की जरूरत हैं। 

याचिकाकर्ताओं के वकील कपिल सिब्बल ने कहा, यह मुद्दा 'कानून के शासन' के लिए मौलिक है। इस पर पुनर्विचार किया जाना चाहिए।  हालांकि मामले में दलीलें बेनतीजा रही। गुरुवार को भी मामले की सुनवाई जारी रहेगी। 

सुप्रीम कोर्ट ने कहा, परिसीमन आयोग का पुनर्गठन होना चाहिए

लिम्बु और तमांग आदिवासियों के लिए परिसीमन आयोग के पुनर्गठन पर सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को विचार करने को कहा है। मुख्य न्यायाधीश चंद्रचूड़ की अध्यक्षता वाली पीठ ने कहा, आनुपातिक प्रतिनिधित्व देने के लिए लिम्बु और तमांग समुदायों की मांग का एक संवैधानिक आधार है।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा, जिन समुदायों को 2012 में अनुसूचित जनजाति में नामित शामिल किया गया, उनका कोई राजनीतिक प्रतिनिधित्व नहीं है। कोर्ट ने हालांकि हम संसद को कानून बनाने का आदेश नहीं दे सकते हैं। हमारा विचार है कि इन समुदायों को न्याय सुनिश्चित करने के लिए परिसीमन आयोग का पुनर्गठन किया जाना चाहिए। केंद्र द्वारा इस पर विचार किया जाना चाहिए।

 साथ ही कोर्ट ने केंद्र से इस मुद्दे पर मुख्य चुनाव आयुक्त के साथ चर्चा करने और गुरुवार तक जवाब दाखिल करने को कहा है। कोर्ट ने केंद्र के तर्क को भी अस्वीकार करते हुए कहा, 2026 की जनगणना होने तक परिसीमन आयोग का गठन नहीं किया जा सकता है।

कोर्ट ने सख्त लहजे में कहा, यह कब किया जाएगा? 2031 में? इन समुदायों को आरक्षण पाने के लिए अगले आठ वर्षों तक इंतजार करना होगा। आप दो दशक पीछे हैं। आप संवैधानिक जनादेश से इनकार कर रहे हैं।
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