Supreme Court: CJI चंद्रचूड़ की तबीयत खराब, आज सुनवाई नहीं करेंगे; भीमा कोरेगांव मामले के दो आरोपियों को जमानत
जस्टिस चंद्रचूड़ की अगुवाई वाली पीठ को आज कई महत्वपूर्ण मामलों पर सुनवाई करनी थी। इसमें मणिपुर में दो महिलाओं को निर्वस्त्र करके घुमाए जाने का मामला भी शामिल है।
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विस्तार
सुप्रीम कोर्ट ने अगस्त 2018 से जेल में बंद भीमा कोरेगांव मामले के आरोपी वर्नोन गोंसाल्वेस और अरुण फरेरा को जमानत दे दी है। कोर्ट ने कहा कि उसने गोंसाल्वेस और फरेरा को जमानत देने का फैसला किया है, क्योंकि उन्हें हिरासत में लिए हुए लगभग पांच साल बीत चुके हैं। ऐसे में यह जमानत के लिए जायज आधार है।
जस्टिस अनिरुद्ध बोस तथा न्यायमूर्ति सुधांशु धूलिया की पीठ ने निर्देश दिया कि गोंजाल्विस तथा फरेरा महाराष्ट्र से बाहर नहीं जाएंगे। उन्हें पुलिस के पास अपना पासपोर्ट जमा कराना होगा। कोर्ट ने कहा कि दोनों एक-एक मोबाइल का इस्तेमाल करेंगे और मामले की जांच कर रहे राष्ट्रीय अन्वेषण अभिकरण (एनआईए) को अपना पता बताएंगे।
दोनों कार्यकर्ता जमानत याचिका बॉम्बे हाईकोर्ट से खारिज होने के बाद सुप्रीम कोर्ट पहुंचे थे। मामला पुणे में 31 दिसंबर 2017 को एल्गार परिषद के एक कार्यक्रम से जुड़ा है। पुणे पुलिस का कहना है कि इसके लिए धन माओवादियों ने दिया था। कार्यक्रम के दौरान दिए गए भड़काऊ भाषणों के कारण अगले दिन कोरेगांव-भीमा युद्ध स्मारक में हिंसा भड़की थी।
CJI नहीं करेंगे सुनवाई
सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को एक आधिकारिक नोटिस जारी कर बताया है कि मुख्य न्यायाधीश डीवाई चंद्रचूड़ की तबीयत खराब है, जिस वजह से वह आज निर्धारित मामलों पर सुनवाई नहीं करेंगे। नोटिस में कहा गया है कि देश के मुख्य न्यायाधीश 28 जुलाई 2023 को सुनवाई नहीं करेंगे। इसके चलते कोर्ट नंबर एक में जस्टिस मनोज मिश्रा और मुख्य न्यायाधीश की पीठ की बैठक रद्द की जाती है। इस पीठ के समक्ष सूचीबद्ध मामलों की सुनवाई नहीं की जाएगी। नोटिस में कहा गया है कि जस्टिस मनोज मिश्रा ती एकल पीठ ही चैंबर के मामलों को संभालेगी।
मणिपुर में दो महिलाओं को निर्वस्त्र करने के मामले भी सुनवाई आज नहीं
जस्टिस चंद्रचूड़ की अगुवाई वाली पीठ को आज कई महत्वपूर्ण मामलों पर सुनवाई करनी थी। इसमें मणिपुर में दो महिलाओं को निर्वस्त्र करके घुमाए जाने का मामला भी शामिल है। प्रधान न्यायाधीश गुरुवार को भी सुनवाई के लिए उपलब्ध नहीं थे। उनकी अगुवाई वाली पीठ को केंद्रीय गृह मंत्रालय के जवाब पर गौर करना था, जिसने शीर्ष कोर्ट को बताया था कि मणिपुर में दो महिलाओं के साथ हुए जघन्य कृत्य की जांच केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (सीबीआई) को सौंपी गई है।
कोर्ट ने लिया था स्वत: संज्ञान
शीर्ष कोर्ट ने 20 जुलाई को घटना का संज्ञान लिया था। कोर्ट ने कहा था कि वह वीडियो से बहुत व्यथित है और हिंसा को अंजाम देने के हथियार के रूप में महिलाओं का इस्तेमाल किसी भी संवैधानिक लोकतंत्र में पूरी तरह से अस्वीकार्य है।
सेना जैसे अनुशासित बल में वरिष्ठता का बहुत महत्व है
सुप्रीम कोर्ट ने वरिष्ठता को लेकर हुए झगड़े के दौरान अपने सहकर्मी की हत्या के लिए दोषी ठहराए गए एक गैर-कमीशन अधिकारी की आजीवन कारावास की सजा को कम करते हुए कहा कि भारतीय सेना जैसे अनुशासित बल में वरिष्ठता का पूरा महत्व है।
चार दिसंबर 2004 को, लांस नायक और मृतक, जो एक ही रैंक के थे, पंजाब के फिरोजपुर छावनी में ड्यूटी पर थे, जहां वरिष्ठता को लेकर उनके बीच झगड़ा हो गया। दोषी ने मृतक से राइफल छीन ली और उसे गोली मार दी। मृतक को लगी एक ही गोली जानलेवा साबित हुई। उन्हें अस्पताल ले जाया गया जहां उन्हें मृत घोषित कर दिया गया।
दोषी सेना कर्मी को कोर्ट मार्शल द्वारा सेना अधिनियम, 1950 की धारा 69 के साथ आईपीसी की धारा 302 (हत्या) के तहत दंडनीय अपराध के लिए दोषी ठहराया गया था और आजीवन कारावास की सजा सुनाई गई थी। सशस्त्र बल न्यायाधिकरण, चंडीगढ़ ने उनकी दोषसिद्धि और सजा की पुष्टि की जिसे पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालय ने बरकरार रखा।
दोषसिद्धि को संशोधित करते हुए और उस व्यक्ति द्वारा पहले ही काटी जा चुकी सजा को घटाकर नौ साल और तीन महीने कर दिया गया, शीर्ष अदालत ने कहा कि ऐसा प्रतीत होता है कि अपीलकर्ता ने क्षण भर के गुस्से में मृतक के पास मौजूद राइफल छीन ली और एक गोली चला दी।
अपीलकर्ता और मृतक दोनों ने शराब पी रखी थी। वरिष्ठता के मुद्दे पर उसके और मृतक के बीच झगड़ा हुआ था। वास्तव में, जब अपीलकर्ता ने मृतक से उसके लिए पानी लाने के लिए कहा, तो मृतक ने ऐसा करने से इनकार कर दिया था।
सुप्रीम कोर्ट मुसलमानों को लेकर याचिका पर करोगी सुनवाई
सुप्रीम कोर्ट शुक्रवार को एक महिला संगठन द्वारा दायर याचिका पर सुनवाई करने के लिए सहमत हो गया, जिसमें गोरक्षकों द्वारा मुसलमानों के खिलाफ भीड़ द्वारा हत्या और हिंसा की घटनाओं से प्रभावी ढंग से निपटने के लिए शीर्ष अदालत के 2018 के फैसले के अनुरूप राज्यों को तत्काल कार्रवाई करने का निर्देश देने की मांग की गई थी।
न्यायमूर्ति बीआर गवई और न्यायमूर्ति जेबी पारदीवाला की पीठ ने केंद्र और महाराष्ट्र, उड़ीसा, राजस्थान, बिहार, मध्य प्रदेश और हरियाणा के पुलिस महानिदेशकों को नोटिस जारी कर याचिका पर उनका जवाब मांगा। भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी से जुड़े संगठन नेशनल फेडरेशन ऑफ इंडियन वुमेन (एनएफआईडब्ल्यू) की ओर से पेश वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल ने मामले को फैसले के लिए उच्च न्यायालयों में भेजने के खिलाफ अनुरोध किया।
सिब्बल ने कहा कि अगर ऐसा होता है, तो मुझे विभिन्न उच्च न्यायालयों में जाना होगा। लेकिन पीड़ितों को क्या मिलेगा? दस साल बाद दो लाख का मुआवजा। यह भीड़ हिंसा के संबंध में तहसीन पूनावाला मामले में 2018 के फैसले के बावजूद है। मेरे पास क्या उपाय है , मैं कहाँ जाऊँगा?
किडनी घोटाले पर याचिका पर सुनवाई से सुप्रीम कोर्ट का इनकार
सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को 2019 में कई राज्यों में कॉर्पोरेट अस्पतालों से जुड़े बड़े पैमाने पर और सुव्यवस्थित किडनी प्रत्यारोपण घोटाले की शिकायतों की सीबीआई या एसआईटी जांच की मांग वाली दो साल पुरानी याचिका पर विचार करने से इनकार कर दिया। और कहा कि अदालतें सभी गलत चीजों के लिए रामबाण नहीं हो सकतीं।
न्यायमूर्ति एस के कौल और न्यायमूर्ति सुधांशु धूलिया की पीठ ने कहा कि अदालत हर चीज करने की कोशिश करने वाली एक सर्वव्यापी प्रणाली की तरह नहीं हो सकती। इसमें कहा गया है कि ये पुलिस और कार्यकारी तंत्र के लिए प्रशासनिक मुद्दे हैं।
अगस्त 2019 में, शीर्ष अदालत ने 23 महीने के एक शिशु की याचिका पर केंद्र और अन्य से जवाब मांगा था, जिसने अपनी मां के माध्यम से अदालत का दरवाजा खटखटाया था। बच्चा वेस्ट सिंड्रोम से पीड़ित था, एक ऐसी स्थिति जिसमें बच्चों को दौरे पड़ते हैं और संज्ञानात्मक और विकासात्मक हानि होती है। एक निजी अस्पताल में उसके जन्म के समय इसने उसे मानसिक रूप से विकलांग बना दिया था।
शुक्रवार को सुनवाई के दौरान, याचिकाकर्ता की ओर से पेश वकील सचिन जैन ने पीठ को 2023 में कथित किडनी रैकेट के पांच हालिया मामलों के बारे में बताया और न्यायमूर्ति (सेवानिवृत्त) जेएस वर्मा समिति की जनवरी 2013 की रिपोर्ट का हवाला दिया, जिसने इस मुद्दे को उठाया था। बच्चों को जबरन श्रम, यौन शोषण और अवैध मानव अंग व्यापार का शिकार बनाया जा रहा है।
सुनवाई के दौरान पीठ ने पूछा कि क्या सुप्रीम कोर्ट के पास हर चीज, हर विभाग, हर सिस्टम के लिए कोई संचालन तंत्र है? साथ ही कहा कि ऐसे घोटालों के तार अंतरराज्यीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर जुड़े होते हैं और एक केंद्रीय एजेंसी को इनकी जांच का जिम्मा सौंपा जाना चाहिए। पीठ ने कहा कि ये प्रशासनिक मुद्दे हैं। एक पुलिस तंत्र है। इसे संभालने के लिए एक कार्यकारी तंत्र है। हम हर चीज का बोझ अपने ऊपर नहीं ले सकते और इसे यहीं करना शुरू नहीं कर सकते।
कैमरे कहां लगें, इसकी निगरानी अदालत नहीं कर सकती
सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को सड़क सुरक्षा से जुड़ी एक याचिका पर यह कहते हुए सुनवाई करने से इन्कार कर दिया कि अदालत इस बात की निगरानी नहीं कर सकती कि यातायात को कैसे नियमित किया जाए और निगरानी के लिए कैमरे कहां लगाए जाने चाहिए। जस्टिस संजय किशन कौल और जस्टिस सुधांशु धूलिया की पीठ के समक्ष आई याचिका में दावा किया गया है कि राज्य, मोटर वाहन अधिनियम के प्रावधानों को उचित तरीके से लागू नहीं कर रहे हैं। पीठ ने कहा, ये सब ‘प्रशासनिक मामले’ हैं। क्या आप चाहते हैं कि हम मोटर वाहन प्रणाली चलाएं? क्या आप चाहते हैं कि हर किसी की निगरानी की जाए? क्या सुप्रीम कोर्ट यहां एक परिवहन विभाग खोले और निगरानी करे कि यातायात को कैसे नियंत्रित किया जाना है, कैमरे कैसे लगाए जाएं। याचिकाकर्ता अदालत में हर राज्य को बुलाना चाहता है। याचिकाकर्ता के वकील ने इसके बाद याचिका वापस लेने की अनुमति मांगी। जिसे पीठ ने स्वीकार कर लिया।
विकास और पर्यावरण के बीच संतुलन बनाए रखने की जरूरत: कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने विकास और पर्यावरण के बीच संतुलन बनाए रखने की आवश्यकता पर जोर दिया है। कोर्ट ने कहा कि वह शिमला विकास योजना से संबंधित मामले पर 11 अगस्त को सुनवाई करेगा। हिमाचल प्रदेश सरकार ने वहां निर्माण गतिविधियों को विनियमित करने के लिए पिछले महीने शिमला विकास योजना के मसौदे को अधिसूचित किया था। इस मुद्दे से संबंधित एक याचिका शुक्रवार को न्यायमूर्ति बीआर गवई और जेबी पारदीवाला की पीठ के समक्ष सुनवाई के लिए आई। पीठ ने कहा कि वह इस बात को ध्यान में रखते हुए योजना की जांच करेगी कि विकास और पर्यावरण के बीच संतुलन बनाए रखने की जरूरत है।
शीर्ष कोर्ट नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) के नवंबर 2017 के आदेश के बाद दाखिल याचिका पर सुनवाई कर रही थी, जिसमें मुख्य, गैर-प्रमुख, हरित और ग्रामीण क्षेत्रों में अनियोजित और अंधाधुंध विकास को ध्यान में रखते हुए कई निर्देश पारित किए थे। दरअसल, शिमला योजना क्षेत्र की वजह से गंभीर पर्यावरणीय और पारिस्थितिक चिंताएं उत्पन्न हो गई थीं। इस योजना को पिछली राज्य सरकार ने फरवरी 2022 में मंजूरी दे दी थी, लेकिन यह अमल में नहीं आई क्योंकि एनजीटी ने इसे अवैध बताते हुए स्थगन आदेश पारित कर दिया था।