Supreme Court: पूजा स्थल कानून को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती, सुप्रीम कोर्ट ने नई याचिकाओं को लेकर जताई नाराजगी
सीजेआई ने कहा, 'याचिकाएं दायर करने की एक सीमा होती है। इतने सारे आईए (अंतरिम आवेदन) दायर किए गए हैं। हम शायद इस पर सुनवाई न कर पाएं।' उन्होंने कहा कि मार्च में तारीख दी जा सकती है। शीर्ष अदालत ने 12 दिसंबर, 2024 के अपने आदेश के माध्यम से विभिन्न हिंदू पक्षों द्वारा दायर लगभग 18 मुकदमों में कार्यवाही को प्रभावी रूप से रोक दिया, जिसमें वाराणसी में ज्ञानवापी, मथुरा में शाही ईदगाह मस्जिद और संभल में शाही जामा मस्जिद सहित 10 मस्जिदों के मूल धार्मिक चरित्र का पता लगाने के लिए सर्वेक्षण की मांग की गई थी, जहां झड़पों में चार लोग मारे गए थे। इसके बाद इसने सभी याचिकाओं को 17 फरवरी को प्रभावी सुनवाई के लिए सूचीबद्ध किया था।
क्या कहता है पूजा स्थल कानून 1991
साल 1991 में देश में पूजा स्थल कानून (प्लेस ऑफ वर्शिप एक्ट) लागू किया गया था। इस कानून के तहत 15 अगस्त 1947 से पहले मौजूद किसी भी धर्म के पूजा स्थल को किसी दूसरे धर्म के पूजा स्थल में नहीं बदला जा सकता। यदि कोई इस कानून का उल्लंघन करने का प्रयास करता है तो उसे जुर्माना और तीन साल तक की जेल भी हो सकती है। यह कानून तत्कालीन कांग्रेस प्रधानमंत्री पीवी नरसिंह राव की सरकार में लागू किया गया था। जिस वक्त यह कानून लाया गया था, उस वक्त देश में बाबरी मस्जिद और राम मंदिर का मुद्दा गर्म था। ऐसे हालात भविष्य में न हो, इसके लिए ही यह कानून लाया गया था।
सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को दिल्ली के जिला बार संघों के चुनावों में महिला उम्मीदवारों लिए पात्रता मानदंड से जुड़े अपने पहले के आदेश को संशोधित किया। कोर्ट ने कहा कि इसमें अनुभव और युवाओं का मिश्रण होना चाहिए। जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस कोटिस्वर सिंह की बेंच ने कहा कि कोषाध्यक्ष का पद पहले से महिला उम्मीदवारों के लिए आरक्षित किया गया है। इसे भरने के लिए उम्मीदवारों को संबंधित बार संघ के नियमों के अनुसार पात्र होना चाहिए।
शीर्ष कोर्ट ने इस तथ्य पर गौर किया कि जिन महिला उम्मीदवारों ने कड़कड़डूमा जिला बार संघ में कोषाध्यक्ष पद के लिए आवेदन किया है, उनके पास बार में करीब तीन-चार साल का अनुभव है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि कोषाध्यक्ष के पद के लिए 10 साल के अनुभव की कोई शर्त नहीं होगी, जैसे कि पहले कहा गया था। साथ ही, कार्यकारी समिति में 30 फीसदी सीट पर आरक्षण होगा, जिसमें से 15 फीसदी सीट उन महिला उम्मीदवारों के लिए आरक्षित होंगी, जिनके पास कम से कम 10 साल का अनुभव है और बाकी 15 फीसदी सीट उन महिला उम्मीदवारों के लिए होंगी, जिनके पास 10 साल से कम अनुभव है।
जांच और दंडित करने संबंधी एनएफआरए की शक्तियां जांचेगा सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट चार्टर्ड अकाउंटेंट और अकाउंटिंग फर्मों को कारण बताओ नोटिस जारी करने, जांच करने और कदाचार के लिए दंडित करने की शक्ति के बारे में राष्ट्रीय वित्तीय रिपोर्टिंग प्राधिकरण (एनएफआरए) की याचिका पर विचार करने के लिए सहमत हो गया। एनएफआरए ने 7 फरवरी को दिए गए एक फैसले में दिल्ली हाईकोर्ट के कुछ निर्देशों पर आपत्ति जताते हुए शीर्ष अदालत का दरवाजा खटखटाया।
हाईकोर्ट ने कंपनी अधिनियम, 2013 की धारा 132 (4) की वैधता को बरकरार रखा, जो एनएफआरए को किसी भी ऑडिट के संबंध में व्यक्तिगत भागीदारों और सीए के साथ-साथ ऑडिटिंग फर्मों के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्यवाही शुरू करने का अधिकार देता है। हालांकि, इस फैसले में कई ऑडिटिंग फर्मों, जैसे डेलॉइट हास्किन्स एंड सेल्स एलएलपी और फेडरेशन ऑफ चार्टर्ड अकाउंटेंट्स एसोसिएशन को जारी किए गए कारण बताओ नोटिस को इस आधार पर रद्द कर दिया कि एनएफआरए की ओर से अपनाई गई प्रक्रिया में स्पष्ट रूप से तटस्थता और निष्पक्ष मूल्यांकन के गुणों का अभाव था।
बिहार सरकार व आईपीएस अधिकारी को सुप्रीम नोटिस
सुप्रीम कोर्ट ने आईपीएस अधिकारी के खिलाफ दर्ज एफआईआर को रद्द करने वाले पटना हाईकोर्ट के आदेश के खिलाफ बिहार पुलिस की महिला अधिकारी की याचिका पर विचार करने को सहमत हो गया। महिला ने आरोप लगाया है कि उसने शादी का झूठा वादा करके उसके साथ दुष्कर्म किया था। कोर्ट ने मामले की सुनवाई अगले महीने 24 मार्च को तय की है।
जस्टिस केवी विश्वनाथन और जस्टिस एसवीएन भट्टी की पीठ ने मामले में बिहार सरकार और आईपीएस अधिकारी पुष्कर आनंद को नोटिस जारी किया है। महिला वर्तमान में पटना सीआईडी में पुलिस अधीक्षक (एसपी) के पद पर तैनात है। महिला की ओर से पेश वकील अश्विनी कुमार दुबे ने तर्क दिया कि 19 सितंबर, 2024 को पारित हाईकोर्ट का आदेश विकृत, किसी भी कानूनी योग्यता से रहित, मामले के तथ्यों से परे होने के अलावा स्थापित कानून के विपरीत था। महिला अधिकारी की शिकायत पर 29 दिसंबर 2014 को बिहार के कैमूर में महिला पुलिस स्टेशन में आईपीएस अधिकारी और उनके माता-पिता के खिलाफ एफआईआर दर्ज की गई थी। आनंद पर दुष्कर्म व आपराधिक धमकी के अलावा अन्य मामलों में मामला दर्ज किया गया था, जबकि उनके माता-पिता पर अपराध को बढ़ावा देने का मामला दर्ज किया गया था। महिला ने आरोप लगाया कि भभुआ में डिप्टी एसपी के पद पर ज्वाइन करने के दो दिन बाद, उस समय एसपी रहे आनंद ने सोशल मीडिया के जरिये उससे प्रेम-प्रसंग करना शुरू कर दिया। महिला ने बताया कि आनंद ने उससे शादी करने की इच्छा जताई, उसने भी ऐसा ही किया और दोनों के बीच शारीरिक संबंध बन गए। हालांकि, महिला ने बताया कि उनकी कुंडली मेल नहीं खाने के कारण शादी नहीं हो सकी।