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Supreme Court: सुप्रीम कोर्ट से अरुण गवली की जमानत याचिका खारिज, कॉरपोरेटर मर्डर केस में हुई थी उम्रकैद

Thu, 20 Feb 2025 12:56 PM IST
नितिन गौतम न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: नितिन गौतम Updated Thu, 20 Feb 2025 12:56 PM IST
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Supreme court news updates bench denies bail to Arun Gawli in corporator murder case
सुप्रीम कोर्ट - फोटो : अमर उजाला
सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को अपराधी से राजनेता बने अरुण गवली की जमानत याचिका खारिज कर दी। अरुण गवली को साल 2007 में मुंबई शिवसेना के कॉरपोरेटर कमलाकर जमसांदेकर की हत्या के आरोप में उम्रकैद की सजा मिली थी। अरुण गवली ने सुप्रीम कोर्ट में जमानत याचिका दायर कर दावा किया कि वह साल 2006 की माफी नीति की सभी शर्तों को पूरा करता है। हालांकि सुप्रीम कोर्ट की जस्टिस सुधांशु धुलिया और जस्टिस के विनोद चंद्रन की पीठ ने अरुण गवली को राहत देने से इनकार कर दिया और बॉम्बे हाईकोर्ट के फैसले को बरकरार रखा। बॉम्बे उच्च न्यायालय ने भी गवली की जमानत याचिका खारिज कर दी थी। 
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आपके अधिकारी दबाव में हो सकते हैं, लेकिन न्यायपालिका नहीं: न्यायालय ने महाराष्ट्र सरकार से कहा
सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार गुरुवार को कहा कि राज्य के अधिकारी ‘दबाव में’ हो सकते हैं, लेकिन न्यायपालिका नहीं। ‘हिल स्टेशन’ माथेरान में ई-रिक्शा लाइसेंस के आवंटन से जुड़ी न्यायिक अधिकारी की रिपोर्ट की सत्यता पर महाराष्ट्र सरकार के सवाल उठाने पर कोर्ट ने यह टिप्पणी की।

महाराष्ट्र सरकार के वकील ने कहा कि न्यायिक अधिकारी की रिपोर्ट ‘पूरी तरह से तथ्यात्मक रूप से सही नहीं हो सकती’ है। इसके बाद जस्टिस ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह के साथ पीठ में शामिल जस्टिस बी आर गवई ने कहा, ‘आपके अधिकारी दबाव में हो सकते हैं, लेकिन हमारी न्यायपालिका नहीं।’

मुंबई से करीब 83 किलोमीटर दूर स्थित माथेरान में ‘ऑटोमोबाइल’ की अनुमति नहीं है। राज्य के वकील ने कहा कि यह उचित होगा कि अधिकारी लाइसेंस आवंटन की प्रक्रिया को नए सिरे से शुरू करें। पीठ ने राज्य सरकार को ई-रिक्शा आवंटन की प्रक्रिया पर पुनर्विचार करने के लिए प्रस्ताव लाने के वास्ते दो सप्ताह का समय दिया। शीर्ष कोर्ट ने कहा कि रिपोर्ट एक जिम्मेदार वरिष्ठ न्यायिक अधिकारी द्वारा तैयार की गई है। न्यायालय मामले की अगली सुनवाई 19 मार्च को करेगा।
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याचिका दायर करते समय सतर्क और सावधान रहें वकील: सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को कहा कि वकीलों का यह कर्तव्य है कि वह याचिकाएं दायर करते समय सावधान और सतर्क रहें। शीर्ष कोर्ट ने कहा कि अगर वकील केवल नाम देकर याचिकाओं पर हस्ताक्षर करते हैं, तो इससे कोई उद्देश्य पूरा नहीं होगा।  

जस्टिस अभय एस. ओका और जस्टिस ऑगस्टिन  जॉर्ज मसीह की बेंच ने कहा कि वकीलों पर एक उच्च स्तर की पेशेवर आचार संहिता को बनाए रखने का दबाव होता है और अगर वे किसी और के द्वारा तैयार की गई याचिका या अपील पर केवल अपना नाम लिखते हैं, तो वकील के रिकॉर्ड में नाम रखने का उद्देश्य पूरा नहीं होता। 
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वरिष्ठ वकीलों को नियुक्त करने की प्रक्रिया पर गंभीरता से विचार करने की जरूरत: सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को कहा कि वकीलों को वरिष्ठ वकील के रूप में नामित करने की प्रक्रिया पर गंभीरता से विचार-विमर्श किए जाने की आवश्यकता है। शीर्ष कोर्ट ने यह तय करने करने के लिए मामले को चीफ जस्टिस (सीजेआई) संजीव खन्ना के पास भेज दिया है। कोर्ट ने कहा कि यह गंभीर सवाल है कि क्या कुछ मिनटों के इंटरव्यू से वकील के व्यक्तित्व और योग्यता का सही आकलन किया जा सकता है। 

चेन्नई फॉर्मूला रेस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के फैसले को पलटा
सुप्रीम कोर्ट ने पिछले साल चेन्नई में आयोजित हुई फॉर्मूला 4 रेस से जुड़े मामले में मद्रास हाईकोर्ट के आदेश को पलट दिया है। शीर्ष अदालत ने कहा कि सरकार के नीतिगत मामलों में हस्तक्षेप करना गलत है और हाईकोर्ट ने अपने अधिकार क्षेत्र का अतिक्रमण किया। हाईकोर्ट ने फॉर्मूला 4 रेस आयोजित करने वाली कंपनी को तमिलनाडु सरकार को 42 करोड़ रुपये भुगतान करने का आदेश दिया था।

पहले यह रेस 2023 में होनी थी, लेकिन तमिलनाडु में चक्रवाती तूफान को देखते हुए 2024 तक के लिए टाल दी गई थी। बृहस्पतिवार को मामले की सुनवाई करते हुए जस्टिस पीएस नरसिम्हा और जस्टिस मनोज मिश्रा की पीठ ने कहा कि तमिलनाडु सरकार के खेल निकाय और कार्यक्रम आयोजक के बीच अनुबंध की शर्तों में हस्तक्षेप करके मद्रास हाईकोर्ट ने अपने अधिकार क्षेत्र का अतिक्रमण किया है। पीठ ने आगे कहा कि अगर हाईकोर्ट ने यह मान लिया था कि खेल आयोजन का निर्णय नीतिगत मामला है, तो उसे सरकार और खेल का आयोजन करने वाली कंपनी आरपीपीएल के बीच हुए समझौता ज्ञापन (एमओयू) की विशिष्ट शर्तों में हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए था।

माओवादियों के समर्थकों के मामलों में सुनवाई में देरी पर सुप्रीम कोर्ट ने जताई नाराजगी
सुप्रीम कोर्ट ने माओवादियों के समर्थकों के मामलों में सुनवाई में देरी पर नाराजगी जताई। कोर्ट ने कहा कि अगर किसी आरोपी को लंबे समय तक बिना किसी ठोस कारण के जेल में रखा जाता है, तो यह संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत स्वतंत्रतता केअधिकार उल्लंघन होगा।
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