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Supreme Court: सीआरपीसी की धारा 437-ए की संवैधानिक वैधता को चुनौती; आय से अधिक संपत्ति केस में पोनमुडी को झटका

Mon, 06 Nov 2023 03:57 PM IST
ज्योति भास्कर न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: ज्योति भास्कर Updated Mon, 06 Nov 2023 03:57 PM IST
सार

सुप्रीम कोर्ट ने आय से अधिक संपत्ति मामले में तमिलनाडु उच्च न्यायालय के आदेश में हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया है। शीर्ष अदालत ने डीएमके नेता और मंत्री पोनमुडी के मामले में पुनरीक्षण को चुनौती देने वाली याचिका पर विचार करने से इनकार कर दिया।

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Supreme Court News Updates Acquittal in assets case TN Minister Ponmudy
सुप्रीम कोर्ट - फोटो : ANI

विस्तार

आय से अधिक संपत्ति मामले में सुप्रीम कोर्ट ने तमिलनाडु के मंत्री के पोनमुडी को राहत देने से इनकार कर दिया। शीर्ष अदालत ने पोनमुडी के खिलाफ पुनरीक्षण मामले को चुनौती देने वाली याचिका पर विचार करने से इनकार कर दिया। बता दें कि मद्रास उच्च न्यायालय ने द्रमुक मंत्री के पोनमुडी और उनकी पत्नी को आय से अधिक संपत्ति के मामले में वेल्लोर ट्रायल कोर्ट ने बरी कर दिया था। इसके बाद शुरू किये गये आपराधिक पुनरीक्षण मामले पर हाईकोर्ट ने नोटिस जारी किया था।
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तमिलनाडु हाईकोर्ट के जस्टिस की तारीफ
मुख्य न्यायाधीश डीवाई चंद्रचूड़ की अध्यक्षता वाली तीन जजों की पीठ ने मामले का स्वत: संज्ञान लेने के लिए तमिलनाडु उच्च न्यायालय के न्यायाधीश न्यायमूर्ति एन आनंद वेंकटेश की प्रशंसा भी की। पीठ में में न्यायमूर्ति जेबी पारदीवाला और न्यायमूर्ति मनोज मिश्रा भी शामिल थे। पीठ ने कहा, "भगवान का शुक्र है, हमारे पास न्यायमूर्ति आनंद जैसे न्यायाधीश हैं। आचरण को देखो। मुख्य न्यायाधीश मुकदमे को एक जिले से दूसरे जिले में स्थानांतरित करते हैं। प्रशासनिक पक्ष में मुकदमे को एक जिला न्यायाधीश से दूसरे जिला न्यायाधीश में स्थानांतरित करने की मुख्य न्यायाधीश की शक्ति कहां है? मुकदमे को दूसरे जज की अदालत में भेजने के लिए न्यायिक आदेश होना चाहिए। उच्च न्यायालय के एकल न्यायाधीश ने इस मामले की जांच का आदेश देकर ठीक किया है।
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पैरवी करने कौन से वकील पेश हुए
शीर्ष अदालत ने कहा कि एकल न्यायाधीश के पास अभी भी मामला है और आय से अधिक संपत्ति मामले में अभी सभी पक्षों को केवल नोटिस जारी किया गया है। इसलिए, वह इस स्तर पर याचिकाओं पर विचार करने के इच्छुक नहीं है। शीर्ष अदालत ने आरोपी की ओर से पेश वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल और सरकार की ओर से पेश वरिष्ठ वकील मुकुल रोहतगी की दलीलों पर विचार करने से इनकार कर दिया। 
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केंद्रीय एजेंसियों के रडार पर हैं डीएमके के मंत्री
सीजेआई की अदालत ने और कहा कि सभी दलीलें हाईकोर्ट में एकल न्यायाधीश के समक्ष दी जा सकती हैं, जिन्होंने मंत्री और उनकी पत्नी को बरी करने पर सरकारी वकील को नोटिस जारी किया है। बता दें कि मद्रास हाई कोर्ट ने 10 अगस्त को पोनमुडी और उनकी पत्नी को नोटिस देने का आदेश दिया था। गौरतलब है कि पोनमुडी को हाल ही में निचली अदालत ने जमीन हड़पने के मामले में बरी कर दिया था। वह कथित अवैध रेत खनन से जुड़े मनी लॉन्ड्रिंग मामले में प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) के रडार पर भी हैं।

उड़ीसा हाईकोर्ट के पूर्व चीफ जस्टिस ने की सुप्रीम कोर्ट में पैरवी

उड़ीसा उच्च न्यायालय के पूर्व मुख्य न्यायाधीश एस मुरलीधर एक सेवानिवृत्त न्यायिक अधिकारी का बचाव करने के लिए सोमवार को उच्चतम न्यायालय में वरिष्ठ वकील के रूप में पेश हुए। शीर्ष अदालत ने 16 अक्तूबर को न्यायाधीशों की पूर्ण अदालत के फैसले के बाद न्यायमूर्ति मुरलीधर को वरिष्ठ वकील के रूप में नामित किया है। जस्टिस मुरलीधर मुख्य न्यायाधीश डीवाई चंद्रचूड़ की अदालत में पेश हुए। सीजेआई ने मजाकिया अंदाज में कहा, ''मैं भाई मुरलीधर नहीं कह सकता, लेकिन अब मैं मिस्टर मुरलीधर कहूंगा।'' मामला मद्रास उच्च न्यायालय की प्रतिकूल टिप्पणियों से संबंधित है, जिसमें अदालत ने रिटायर्ड न्यायिक अधिकारी पर सख्त टिप्पणी की थी। मुरलीधर ने कहा कि उनके मुवक्किल का रिकॉर्ड बेदाग रहा है।

सुप्रीम कोर्ट ने न्यायपालिका की संपत्ति बताया

समाचार एजेंसी पीटीआई के अनुसार, संविधान के अनुच्छेद 220 के तहत, उच्च न्यायालय का एक पूर्व न्यायाधीश केवल उच्चतम न्यायालय या उच्च न्यायालयों में ही वकील के रूप में पैरवी कर सकता है जहां उन्होंने न्यायाधीश के रूप में कार्य नहीं किया हो। बता दें कि न्यायमूर्ति मुरलीधर 7 अगस्त को उड़ीसा उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश के रूप में सेवानिवृत्त हुए। उन्होंने दिल्ली, पंजाब और हरियाणा के उच्च न्यायालयों के न्यायाधीश के रूप में भी कार्य किया। कार्यवाही के बाद जस्टिस मुरलीधर की वरिष्ठता के सम्मान में शीर्ष अदालत ने कहा, वह चाहे किसी भी पक्ष के लिए पेश हों, न्यायपालिका के लिए वह एक संपत्ति हैं।

DERC के लिए सुप्रीम कोर्ट ने तीन सदस्यों का पैनल बनाया

उच्चतम न्यायालय ने दिल्ली विद्युत नियामक आयोग (डीईआरसी) के दो अस्थायी सदस्यों की सूची बनाने और उनकी नियुक्ति के लिए सोमवार को तीन सदस्यीय चयन पैनल का गठन किया। मुख्य न्यायाधीश डीवाई चंद्रचूड़ और न्यायमूर्ति जे बी पारदीवाला और न्यायमूर्ति मनोज मिश्रा की पीठ ने कहा कि चयन समिति में दिल्ली उच्च न्यायालय के पूर्व न्यायाधीश और वर्तमान प्रोटेम डीईआरसी प्रमुख- न्यायमूर्ति जयंत नाथ, एपीटीईएल (बिजली के लिए अपीलीय न्यायाधिकरण) के अध्यक्ष न्यायमूर्ति रमेश रंगनाथन और दिल्ली उच्च न्यायालय की पूर्व न्यायाधीश जस्टिस आशा मेनन शामिल होंगे।

सुप्रीम कोर्ट पैनल तय करेगा चयन का तरीका

पीठ ने साफ किया कि चयन पैनल प्रत्येक पद के लिए अधिकारियों की क्षमता, निष्ठा और डोमेन ज्ञान के संबंध में जानकारी के साथ दो नामों की सिफारिश करेगा। सिफारिश एक महीने के भीतर की जाएगी। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि शॉर्टलिस्ट किए गए उम्मीदवारों के नाम नियुक्ति के लिए दिल्ली के उपराज्यपाल और मुख्यमंत्री के कार्यालय को भेजे जाएंगे। पैनल राष्ट्रीय राजधानी के बिजली नियामक प्राधिकरण के सदस्यों के चयन के लिए तरीके तैयार करने के लिए स्वतंत्र होगा।

जमानत से जुड़े कानून पर सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र को नोटिस भेजा

उच्चतम न्यायालय में एक आपराधिक कानून की संवैधानिक वैधता को चुनौती दी गई है। देश की सबसे बड़ी अदालत ने कानूनी प्रावधानों के खिलाफ दायर याचिका पर केंद्र को नोटिस दिया है। दरअसल, इस कानून के तहत अदालत से बरी हो चुके लोगों को भी जमानत बॉन्ड भरने और रिहाई के लिए जमानत राशि जमा करने की जरूरत पड़ती है। बता दें कि आपराधिक प्रक्रिया संहिता (सीआरपीसी) की धारा 437ए - के तहत किसी मामले में अदालत से बरी किए गए आरोपी या दोषी को हिरासत से रिहा होने के लिए छह महीने की अवधि तक वैध जमानत बांड और जमानत राशि जमा करना जरूरी होता है।

सीआरपीसी की धारा 437-ए की संवैधानिक वैधता को चुनौती

इस मामले में पीटीआई कि खबर के मुताबिक पैसा जमा करने का प्रावधान यह सुनिश्चित करने के लिए किया जाता है कि यदि सरकार किसी आरोपी को अदालत से बरी किए जाने के खिलाफ अपील करना चाहता है तो वह (आरोपी) कानूनी कार्रवाई का सामना करने के लिए उपलब्ध रहेगा। मुख्य न्यायाधीश डीवाई चंद्रचूड़ और न्यायमूर्ति जेबी पारदीवाला और न्यायमूर्ति मनोज मिश्रा की पीठ ने याचिका पर केंद्र और राज्यों को नोटिस जारी किया। अदालत ने इस मामले में अटॉर्नी जनरल आर वेंकटरमणी से भी सहायता मांगी। गौरतलब है कि शीर्ष अदालत सीआरपीसी की धारा 437ए की संवैधानिक वैधता को चुनौती देने वाले अजय वर्मा नाम के शख्स की तरफ से दायर याचिका पर सुनवाई कर रही थी।

मध्य प्रदेश में जिला न्यायाधीशों की भर्ती में देरी, सुप्रीम कोर्ट के तीखे सवाल

उच्चतम न्यायालय ने सोमवार को एक अन्य मामले में मध्य प्रदेश के ढुलमुल रवैये पर सवाल खड़े किए। जिला न्यायाधीशों की भर्ती प्रक्रिया पूरी करने में देरी से नाराज सुप्रीम कोर्ट ने उच्च न्यायालय को कई अहम निर्देश दिए। कोर्ट ने पूछा कि यदि 21 अतिरिक्त जिला न्यायाधीशों के पद के लिए रिक्तियों का विज्ञापन अगस्त में किया गया था तो प्रारंभिक परीक्षा की तारीख 3 दिसंबर 2023 क्यों तय की गई है? मुख्य न्यायाधीश डी वाई चंद्रचूड़ और न्यायमूर्ति जे बी पारदीवाला और न्यायमूर्ति मनोज मिश्रा की तीन जजों की पीठ ने हाईकोर्ट से प्रारंभिक परीक्षा से लेकर चयन के अंतिम परिणाम घोषित करने तक का कार्यक्रम तैयार कर इसे प्रकाशित करने को कहा। 

पीठ ने देश भर में निचली न्यायपालिका में रिक्तियों को भरने सहित न्यायिक बुनियादी ढांचे में सुधार से संबंधित 2006 की याचिका पर सुनवाई करते हुए कई निर्देश पारित किए। शीर्ष अदालत ने मध्य प्रदेश, पंजाब और हरियाणा में न्यायिक बुनियादी ढांचे और निचली न्यायपालिका में रिक्तियों के मुद्दों का निपटारा किया। अदालत ने वरिष्ठ अधिवक्ता विजय हंसारिया की एक रिपोर्ट का भी अवलोकन किया, जो वकील स्नेहा कलिता के साथ न्यायमित्र के रूप में पीठ की सहायता कर रहे हैं।

हरियाणा के गुरुग्राम के स्कूल में हत्या मामला, सुप्रीम कोर्ट में याचिका खारिज

दिन के एक अन्य बड़े मामले में उच्चतम न्यायालय ने 2017 में गुरुग्राम के एक निजी स्कूल में एक बच्चे की हत्या के आरोपी एक किशोर की याचिका सोमवार को खारिज कर दी। याचिकाकर्ता ने पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालय के फैसले को चुनौती दी थी। हाईकोर्ट ने उसके खिलाफ एक वयस्क के रूप में मुकदमा चलाने के आदेश को बरकरार रखा था। उच्च न्यायालय ने इस साल मई में किशोर न्याय बोर्ड (जेजेबी) की तरफ से पारित आदेश को बरकरार रखा था। जुवेनाइल जस्टिस बोर्ड ने कहा था कि कानून का उल्लंघन करने वाले बच्चे के साथ वयस्क जैसा व्यवहार किया जाएगा।



उच्च न्यायालय के आदेश को चुनौती देने वाली याचिका पर सुप्रीम कोर्ट में न्यायमूर्ति विक्रम नाथ और राजेश बिंदल की पीठ ने सुनवाई की। वकील सुशील टेकरीवाल ने शीर्ष अदालत में पीड़ित परिवार का प्रतिनिधित्व किया। शीर्ष अदालत में दायर याचिका में, किशोर ने दावा किया था कि उच्च न्यायालय ने जेजेबी और बाल न्यायालय के आदेशों को "यांत्रिक रूप से बरकरार रखा।" याचिकाकर्ता के अनुसार अपील को खारिज करते समय आदेशों में अंतर्निहित विरोधाभासों को नजरअंदाज किया गया।

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