SC: महाराष्ट्र के राजनीतिक संकट पर सात जजों की बेंच करेगी सुनवाई? सुप्रीम कोर्ट ने फैसला सुरक्षित रखा
शिवसेना उद्धव-बालासाहेब की तरफ से पेश हुए वकील कपिल सिब्बल और अभिषेक मनु सिंघवी ने मांग की थी कि 2016 के नाबाम रेबिया फैसले की समीक्षा के लिए सात जजों की बेंच का गठन हो।
विस्तार
महाराष्ट्र में शिवसेना के दो टुकड़े होने के बाद आए राजनीतिक संकट को लेकर सुप्रीम कोर्ट में गुरुवार को सुनवाई हुई। कोर्ट ने इस मामले को सात जजों की पीठ के पास भेजने पर फैसला सुरक्षित रख लिया है। नबाम राबिया के फैसले ने अयोग्यता याचिकाओं को तय करने के लिए स्पीकर की शक्ति को प्रतिबंधित कर दिया था क्योंकि उनके निष्कासन की मांग वाला प्रस्ताव लंबित था। भारत के मुख्य न्यायाधीश (सीजेआई) डीवाई चंद्रचूड़, जस्टिस एमआर शाह, जस्टिस कृष्ण मुरारी, जस्टिस हिमा कोहली और जस्टिस पीएस नरसिम्हा की संविधान पीठ ने मामले पर दलीलें सुनीं। पीठ ने कहा, 10वीं अनुसूची (दल-बदल विरोधी कानून) को राजनीतिक प्रतिष्ठानों ने आत्मसात कर लिया है।
दी गईं ये दलीलें
भाजपा विधायकों की ओर से पेश वरिष्ठ वकील महेश जेठमलानी और मनिंदर सिंह ने तर्क दिया कि नबाम राबिया के फैसले की सत्यता पर पुनर्विचार करने की कोई आवश्यकता नहीं है।
खड़े होते रहेंगे सवाल- कपिल सिब्बल
वहीं महाविकास अघाड़ी के वकील कपिल सिब्बल ने कहा, संविधान की 10वीं अनुसूची की इस तरह से व्याख्या की जाए कि सरकारों को गिराने के लिए इसका दुरुपयोग न किया जा सके। यह आज के नहीं, बल्कि कल के बारे में भी है। निर्वाचित सरकारों का गिरना तब तक जारी रहेगा जब तक कि अयोग्यता याचिकाओं का फैसला नहीं किया जाता। शिवसेना के उद्धव ठाकरे धड़े ने गुरुवार को सुप्रीम कोर्ट में कहा कि जून 2022 में उठाये गये महाराष्ट्र राजनीतिक संकट के संवैधानिक मुद्दे केवल अकादमिक नहीं हैं। जब-जब चुनी हुई सरकारें गिरायी जायेंगी तब-तब ये सवाल खड़े होंगे। शिवसेना (उद्धव बालासाहेब ठाकरे) की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने मुख्य न्यायाधीश डी वाई चंद्रचूड़ की अध्यक्षता वाली पांच-न्यायाधीशों की संविधान पीठ से कहा कि मैं आपसे विनती करता हूं। दसवीं अनुसूची को एक चुनी हुई सरकार को गिराने की अनुमति न दें।
वहीं वकील अभिषेक मनु सिंघवी ने कहा कि न्यायालय को नबाम रेबिया के मामले को वर्तमान मामले से अलग नहीं करना चाहिए। यह किसी भी समस्या का हल नहीं, बल्कि भविष्य की मुकदमेबाजी उत्पन्न करेगा।
गौरतलब है कि शिवसेना उद्धव-बालासाहेब की तरफ से पेश हुए वकील कपिल सिब्बल और अभिषेक मनु सिंघवी ने मांग की थी कि 2016 के नाबाम रेबिया फैसले की समीक्षा के लिए सात जजों की बेंच का गठन हो।
अदाणी-हिंडनबर्ग मामले में SC में एक और जनहित याचिका दायर
अदाणी समूह की कंपनियों के खिलाफ धोखाधड़ी के आरोपों की जांच के लिए सुप्रीम कोर्ट में गुरुवार को एक नई जनहित याचिका दायर की गई है। इस नई याचिका में केंद्र सरकार की कई एजेंसियों द्वारा एक पैनल या शीर्ष अदालत के एक पूर्व न्यायाधीश की निगरानी में जांच की मांग की गई है। अमेरिका स्थित हिंडनबर्ग रिसर्च द्वारा शेयर की कीमत में हेर-फेर किया गया।
अदाणी समूह की कंपनियों के खिलाफ दाखिल चौथी जनहित याचिका मुकेश कुमार ने वकील रूपेश सिंह भदौरिया और मारीश प्रवीर सहाय के माध्यम से दायर की है। मुकेश कुमार ने खुद को एक सामाजिक कार्यकर्ता बताते हैं। वहीं, वकील रूपेश सिंह भदौरिया भारतीय युवा कांग्रेस (IYC) के कानूनी प्रकोष्ठ के प्रमुख भी हैं। इस याचिका में शेयर बाजारों सहित सकल कॉर्पोरेट भ्रष्टाचार से संबंधित गंभीर मुद्दे और कानून के प्रश्न शामिल हैं। यह देश की अर्थव्यवस्था पर बड़े प्रभाव के अलावा करोड़ों निर्दोष निवेशकों को प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से प्रभावित करते हैं।
गौरतलब है कि मुख्य न्यायाधीश डी वाई चंद्रचूड़ की अध्यक्षता वाली पीठ ने पहले से ही निवेशकों के शोषण और अदाणी समूह के स्टॉक मूल्य में छेड़छाड़ के आरोपों वाली तीन जनहित याचिकाओं को शुक्रवार को सुनवाई के लिए सूचीबद्ध किया है।
बीबीसी मामले में नई याचिका दाखिल
2002 के गुजरात दंगों पर बीबीसी की एक डॉक्यूमेंट्री को बैन करने के केंद्र के फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में एक नई याचिका दाखिल की गई है। गुरुवार को दाखिल यह याचिका मुकेश कुमार ने वकील रूपेश सिंह भदौरिया और मारीश प्रवीर सहाय के माध्यम से दायर की है। शीर्ष अदालत इस मुद्दे पर अनुभवी पत्रकार एन राम, तृणमूल कांग्रेस सांसद महुआ मोइत्रा, कार्यकर्ता वकील प्रशांत भूषण और वकील एम एल शर्मा द्वारा दायर दो याचिकाओं पर पहले ही विचार कर रही है।
इससे पहले तीन फरवरी को जस्टिस संजीव खन्ना और एम एम सुंदरेश की पीठ ने दो याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए केंद्र सरकार को डॉक्यूमेंट्र बैन करने के फैसले से संबंधित मूल रिकॉर्ड पेश करने का निर्देश दिया था। अब मामला अप्रैल में सुनवाई के लिए सूचीबद्ध हैं।
नई याचिका में सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय (मध्यवर्ती दिशानिर्देश और डिजिटल मीडिया आचार संहिता) नियम, 2021 द्वारा पारित 20 जनवरी, 2023 की अधिसूचना को रद्द करने की मांग की गई है। इसके अलावा इसमें केंद्र सरकार को बिना किसी कानून और व्यवस्था के मुद्दे के डॉक्यूमेंट्री की स्क्रीनिंग सुनिश्चित करने का निर्देश देने की मांग की है।
SC में कॉलेजियम प्रणाली के खिलाफ जल्द सुनवाई की मांग वाली याचिका
जजों की नियुक्ति के लिए अपनाई जाने वाली कॉलेजियम प्रणाली के खिलाफ याचिका की जल्द सुनवाई की मांग वाली याचिका सुप्रीम कोर्ट में दाखिल की गई है। इस याचिका में राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग (एनजेएसी) को पुनर्जीवित करने की मांग भी की गई है।
इस याचिका पर सुनवाई को लेकर सीजेआई डी वाई चंद्रचूड़ की अगुवाई वाली पीठ ने कहा कि वह पहले याचिका की जांच करेगी और फिर उस पर विचार करेगी। गौरतलब है कि अधिवक्ता मैथ्यूज जे नेदुमपारा और सात अन्य ने उच्च न्यायालयों और शीर्ष अदालत में न्यायाधीशों की नियुक्ति और स्थानांतरण की कॉलेजियम प्रणाली को चुनौती देते हुए याचिका दायर की थी।
2017 के फैसले पर गौर करने की जरूरत है या नहीं, इस पर होगा विचार- सुप्रीम कोर्ट
वरिष्ठ अधिवक्ता का दर्जा संबंधी 2017 के फैसले पर फिर से गौर करने की जरूरत है या नहीं, सुप्रीम कोर्ट इस पर विचार करेगी। सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को वकीलों को वरिष्ठ अधिवक्ताओं का दर्जा देने के संबंध में मुद्दों को उठाने वाली अर्जियों पर सुनवाई करते हुए यह टिप्पणी की। न्यायमूर्ति एस. के. कौल, न्यायमूर्ति मनोज मिश्रा और न्यायमूर्ति अरविंद कुमार की पीठ ने कहा कि वह इस पर विचार करेगी कि वकीलों को वरिष्ठ अधिवक्ता का दर्जा देने की कवायद के संबंध में उसके लिए और उच्च न्यायालयों के वास्ते दिशा-निर्देश वाले उसके 2017 के फैसले पर क्या फिर से गौर करने की जरूरत है। साथ ही अगर जरूरत है भी तो इसकी सीमा क्या है।
क्या था 2017 का फैसला
गौरतलब है कि साल 2017 में सुप्रीम कोर्ट द्वारा दिया गया फैसला वरिष्ठ अधिवक्ता इंदिरा जयसिंह की याचिका पर दिया गया था। अक्टूबर 2017 के फैसले में कहा गया था कि इसमें शामिल दिशानिर्देश ‘मामले के बारे में संपूर्ण नहीं हो सकते हैं और समय के साथ होने वाले अनुभव के आलोक में इसमें चीजें जोड़ने या हटाने के संबंध में उपयुक्त पुनर्विचार की आवश्यकता हो सकती है।'
केंद्र दाखिल करेगी अर्जी
मामले में केंद्र सरकार की ओर से पेश सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने पीठ को बताया कि सरकार इस मामले में अर्जी दाखिल करेगी। उन्होंने पीठ को बताया कि प्रत्येक हाई कोर्ट एक अलग प्रक्रिया अपना रहा है और उनका यह कहना है कि प्रक्रिया में कुछ एकरूपता होनी चाहिए। फिलहाल पीठ ने इस मामले को अगली सुनवाई के लिए 22 फरवरी को सूचीबद्ध किया है।
मध्यस्थता में ऑनलाइन सुनवाई के लिए प्रोटोकॉल अपनाएं- सीजेआई चंद्रचूड़
सीजेआई डी वाई चंद्रचूड़ ने मध्यस्थता की कार्यवाही में तकनीक के इस्तेमाल की वकालत की है। राजधानी में दिल्ली अंतरराष्ट्रीय मध्यस्थता केंद्र (डीआईएसी) द्वारा आयोजित ‘दिल्ली आर्बिट्रेशन वीकेंड’ में अपने संबोधन के दौरान सीजेआई ने कहा कि देश में मध्यस्थता केंद्रों को ऑनलाइन सुनवाई करने के लिए प्रोटोकॉल अपनाना चाहिए। इसके साथ ही देश के मध्यस्थता क्षेत्र में लैंगिक विविधता मजबूत दिखाई देनी चाहिए।
इस दौरान सीजेआई चंद्रचूड़ ने कहा कि मैं डीआईएसी को ऑनलाइन सुनवाई पर एक प्रोटोकॉल का मसौदा तैयार करने और अपनाने के लिए प्रोत्साहित करता हूं, जो भारतीय संदर्भ के अनुरूप है। भारत में प्रत्येक मध्यस्थता केंद्र इस संबंध में प्रोटोकॉल अपना सकता है। उन्होंने आगे कहा कि कोरोना महामारी के कारण कानूनी प्रक्रियाओं में तकनीकों को अपनाया गया और मध्यस्थ संस्थान ऑनलाइन सुनवाई की दिशा में आगे बढ़े।
पंजाब के कांग्रेस विधायक सुखपाल सिंह खैरा को सुप्रीम कोर्ट से बड़ी राहत मिली है। शीर्ष अदालत ने 2015 के सीमा पार मादक पदार्थों की तस्करी के एक मामले में ट्रायल कोर्ट द्वारा जारी किए गए समन को रद्द कर दिया है।
सीजेआई चंद्रचूड़ के पहले 100 दिन में हुए कई बड़े सुधार
भारत के मुख्य न्यायाधीश (सीजेआई) डीवाई चंद्रचूड़ के पहले 100 दिनों के कार्यकाल के दौरान सुप्रीम कोर्ट में कई बड़े सुधार किए गए। इन सुधारों में अदालतों को प्रौद्योगिकी के अधिक अनुकूल बनाने और सुप्रीम कोर्ट में आठ जजों समेत अपेक्षाकृत तेज न्यायिक नियुक्तियों को सुनिश्चित करने के मामले में सुधार प्रमुख हैं।
इन 100 दिनों के दौरान मामलों के निपटान में तेजी देखी गई है। साथ ही दर्ज होने वाले मामलों की तुलना में निपटारे वालों की संख्या अधिक रही है। 9 नवंबर, 2022 से 15 फरवरी, 2023 तक कुल 13,764 मामले सुप्रीम कोर्ट में दायर हुए और 14,209 मामलों का निपटारा किया गया। सुप्रीम कोर्ट के सूत्रों के मुताबिक, पहले सौ दिन में रिकॉर्ड के डिजिटलीकरण से लेकर वकीलों को ऑनलाइन पेशी पर्ची मुहैया कराना, ऑनलाइन आरटीआई पोर्टल, डिजिटल कोर्ट का डेस्कटॉप वर्जन आदि कुछ जरूरी कदम उठाए गए हैं। पूर्व सीजेआई वाईवी चंद्रचूड़ के बेटे जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ ने देश के 50वें सीजेआई के रूप में पिछले साल 9 नवंबर को कार्यभार संभाला था। अगले साल 10 नवंबर को उनका कार्यकाल पूरा होगा।
जस्टिस सोनिया गोकानी ने गुजरात हाईकोर्ट की मुख्य न्यायाधीश के रूप में शपथ ली
जस्टिस सोनिया गोकानी ने बृहस्पतिवार को गुजरात हाईकोर्ट की मुख्य न्यायाधीश के रूप में शपथ ली। वह 25 फरवरी को अपनी सेवानिवृत्ति से कुछ ही दिन पहले हाईकोर्ट में इस पद पर पदोन्नत होने वाली वर्तमान में अकेली महिला मुख्य न्यायाधीश बन गई हैं। राज्यपाल आचार्य देवव्रत ने गांधीनगर में राजभवन में जस्टिस गोकानी को पद की शपथ दिलाई। जस्टिस गोकानी की नियुक्ति को केंद्र ने 12 फरवरी को मंजूरी दी थी। वह 13 फरवरी से मुख्य न्यायाधीश (नामित) के रूप में सेवा दे रही थीं। उनकी नियुक्ति जस्टिस अरविंद कुमार को सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश के रूप में पदोन्नत किए जाने के बाद हुई है। गोकानी को 2011 को गुजरात हाईकोर्ट की अतिरिक्त न्यायाधीश के रूप में पदोन्नत किया गया और 28 जनवरी, 2013 को वह स्थायी न्यायाधीश के रूप में नियुक्त हुईं