सरकारी विज्ञापनों में फोटो पर दिल्ली-तमिलनाडु को सुप्रीम कोर्ट का नोटिस
- शीर्ष अदालत ने दोनों सरकार को छह हफ्ते में जवाब दाखिल करने के लिए कहा है।
- अदालत ने फैसला सुरक्षित रखा।
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शीर्ष अदालत ने कॉमन काउज नामक गैर सरकारी संगठन द्वारा दाखिल अवमानना याचिका पर दोनों सरकार को नोटिस जारी किया है। याचिका में कहा गया था कि सुप्रीम कोर्ट ने सरकारी विज्ञापनों पर राष्ट्रपति, भारत केप्रधान न्यायाधीश और प्रधानमंत्री की फोटो के अलावा किसी अन्य की फोटो प्रकाशित करने पर पाबंदी लगाई है, बावजूद इसके दिल्ली और तमिलनाडु सरकार ने अपने-अपने विज्ञापनों में मुख्यमंत्री की फोटो छापी है।
सरकारी विज्ञापनों में सीएम की फोटो पर रोक संघीय ढांचे पर चोट: केंद्र
केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में कहा कि सरकारी विज्ञापनों में प्रधानमंत्री की फोटो प्रकाशित करने की इजाजत देना लेकिन मुख्यमंत्री समेत अन्य मंत्रियों की फोटो प्रकाशित करने पर पाबंदी संघीय ढांचे पर चोट है। सरकार ने कहा कि प्रधानमंत्री ही नहीं बल्कि मुख्यमंत्री भी महत्वपूर्ण हैं। मुख्यमंत्रियों को भी जनता तक अपना संवाद पहुंचाना होता है। सरकार ने कहा कि सिर्फ प्रधानमंत्री की फोटो छापने का मतलब है किसी एक व्यक्ति की सरकार यानी एक व्यक्ति का महिमामंडन करना।
केंद्र और तमिलनाडु सरकार की ओर से पेश अटॉर्नी जनरल मुकुल रोहतगी ने न्यायमूर्ति रंजन गोगोई की अध्यक्षता वाली पीठ के समक्ष सुप्रीम कोर्ट के उस आदेश को दोषपूर्ण बताया जिसमें सरकारी विज्ञापनों में राष्ट्रपति, भारत के प्रधान न्यायाधीश और प्रधानमंत्री के फोटो के अलावा किसी अन्य की फोटो प्रकाशित करने पर पाबंदी लगाई गई है। अटॉर्नी जनरल ने कहा कि मुख्यमंत्रियों और मंत्रियों को अपने कामों को जनता तक पहुंचाने का उतना ही हक है जितना प्रधानमंत्री को है। ऐसे में मुख्यमंत्रियों और मंत्रियों के फोटो पर पाबंदी लगाने का कोई आधार नहीं है।
अटॉर्नी जनरल ने कहा कि देश में बहुत सारे लोग ऐसे हैं, जो पढ़ नहीं सकते। ऐसे लोगों के फोटो से प्रभाव पड़ता है। साथ ही उन्होंने कहा कि हर कानून का दुरुपयोग होता है। अगर किसी कानून के दुरुपयोग होने की आशंका हो, इसका यह मतलब यह नहीं है कि हर कानून का दुरुपयोग होगा। साथ ही यह भी नहीं कहा जा सकता कि अगर किसी कानून का दुरुपयोग हो रहा है, तो वह कानून ही खराब है।
इलेक्टॉनिक युग में इस तरह की पाबंदी उचित नहीं
अटॉर्नी जनरल ने कहा कि अदालत को इस तरह का प्रतिबंध नहीं लगाना चाहिए। उन्होंने कहा कि इलेक्ट्रॉनिक युग में इस तरह की पाबंदी नहीं होनी चाहिए। रोहतगी ने यह भी कहा कि किस तरह का विज्ञापन होना चाहिए या नहीं, यह न्यायालय के अधिकार क्षेत्र में नहीं है। उन्होंने कहा कि वास्तव में अधिकार नागरिकों में निहित है। नागरिकों को यह जानने का हक है कि उनके मंत्री क्या कर रहे हैं।
अटॉर्नी जनरल ने सुप्रीम कोर्ट को अपने पूर्व आदेश में फेरबदल करने का आग्रह करते हुए कहा कि ऐसा पहले भी कई बार हुआ है जब सुप्रीम कोर्ट ने अपना फैसला बदला है। साथ ही उन्होंने यह स्वीकार किया पहले केंद्र और राज्य सरकारों के वकील अदालत के समक्ष सही तरीके से अपने पक्षों को रखने में नाकाम रहे थे।
इसके अलावा उत्तर प्रदेश, असम और कर्नाटक ने भी सुप्रीम कोर्ट से गुहार की कि मुख्यमंत्रियों की फोटो भी प्रकाशित होनी चाहिए। मालूम हो कि यूपी, तमिलनाडु, कर्नाटक समेत सात राज्यों ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले को चुनौती दी है। सभी पक्षों की दलीलों को सुनने के बाद अदालत ने फैसला सुरक्षित रख लिया है।