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सुप्रीम कोर्ट ने सामुदायिक से जुड़ी याचिका पर राज्यों को लगाया पांच लाख रुपये का जुर्माना

Mon, 10 Feb 2020 12:33 PM IST
देव कश्यप न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: देव कश्यप Updated Mon, 10 Feb 2020 12:33 PM IST
सार

  • सुप्रीम कोर्ट ने सरकारों को लगाई फटकार, कहा-जवाब न देना दुर्भाग्यपूर्ण
  • कहा, पांच माह से अटकी पड़ी है सुनवाई, अब अगली सुनवाई 17 को

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Supreme Court imposes a fine of Rs 5 lakhs on Central and state governments over community kitchens
सुप्रीम कोर्ट - फोटो : social media

विस्तार

सुप्रीम कोर्ट ने भूखमरी और कुपोषण से निपटने के लिए देश में सामुदायिक रसोई (कम्युनिटी किचन) बनाने की मांग वाली याचिका पर जवाब नहीं देने पर केंद्र और राज्यों को जमकर लताड़ लगाई है। जस्टिस एनवी रमना की पीठ ने कहा कि अगले 24 घंटे में हलफनामा दायर करने वाले राज्यों को एक लाख रुपये जमा करने होंगे जबकि इस समय में भी हलफनामा दायर नहीं करने वालों को पांच लाख रुपये बतौर जुर्माना देने होंगे। याचिका पर अगली सुनवाई 17 फरवरी को होगी।

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सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि गरीब और बेघर लोगों के लिए खाद्य सुरक्षा और सामुदायिक रसोई बनाने की मांग को लेकर दायर याचिका की सुनवाई के लिए पांच महीने से अटकी पड़ी है। इसके लिए केंद्र और राज्य सरकारों की ओर से हलफनामे के जरिए जवाब का इंतजार है। कोर्ट ने कहा कि केंद्र और राज्य सरकारों से जवाब नहीं आना दुर्भाग्यपूर्ण है। याचिका में कहा गया है कि देश की बड़ी आबादी को खाना उपलब्ध नहीं है।  ऐसे लोगों को भूख और कुपोषण से लड़ने में रियायती दर पर भोजन मिलने से मदद मिलेगी। 
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सिर्फ सात ने दिया है जवाब
इस जनहित याचिका पर सिर्फ पांच राज्यों पंजाब, नगालैंड, कर्नाटक, उत्तराखंड और झारखंड व दो केंद्रशासित प्रदेशों जम्मू-कश्मीर एव अंडमान निकोबार ने हलफनामा देकर अपना जवाब दिया है। कोर्ट ने सामुदायिक रसोई बनाने का बीते 18 अक्तूबर को समर्थन करते हुए कहा था कि देश को भुखमरी की समस्या से निपटने के लिए इस प्रकार की प्रणाली की आवश्यकता है। उसने सामुदायिक रसोइयों को बनाने के प्रस्ताव पर केंद्र एवं अन्य राज्यों के जवाब मांगने के लिए उन्हें नोटिस जारी किया था। 
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भूख से हर साल तीन लाख बच्चों की मौत
याचिका में दावा किया गया है कि पांच साल की उम्र तक के बहुत से बच्चे हर साल भूख और कुपोषण के चलते दम तोड़ देते हैं। कई वैश्विक एजेंसियों की रिपोर्ट के हवाले से दावा किया गया है कि भारत में भूख के चलते हर साल तीन लाख बच्चे दम तोड़ देते हैं। इनमें से 38 फीसदी की उम्र पांच साल से कम होती है। यह हालात एक तरह से खाने और जीवन के अधिकार समेत कई मौलिक अधिकारों का उल्लंघन है। याचिका में केंद्र सरकार से जनता के लिए नेशनल फूड ग्रिड बनाने की बात कही है। इसमें राष्ट्रीय विधिक सेवा प्राधिकरण (नालसा) को भूख से होने वाली मौतों को लेकर एक योजना तैयार करने का आदेश देने की भी मांग की गई है।


इन राज्यों में लागू है सामुदायिक किचन
याचिका में उन राज्यों का हवाला भी दिया गया है, जहां सामुदायिक किचन की व्यवस्था पहले से ही और अच्छी तरह से लागू है। ये राज्य हैं तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश, उत्तराखंड, ओडिशा, झारखंड और दिल्ली, जहां पर सस्ती दरों पर अच्छा खाना मुहैया कराया जाता है। याचिका में सूप किचन, भोजन केंद्र, भोजन रसोई की भी मांग की गई है। याचिका सामाजिक कार्यकर्ता अरुण धवन, इशांत धवन और कुंजना सिंह ने वकील आशिमा मंडला और फजल अहमद अयूबी के जरिये दी है। 

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